सन्दर्भ:
हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया कि यदि दो वयस्कों के बीच संबंध "विवाह-सदृश संबंध" (Relationship in the Nature of Marriage) की श्रेणी में आता है तथा उसमें विवाह का स्पष्ट उद्देश्य निहित है, तो महिला को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A (अब भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 85) के तहत क्रूरता से संरक्षण प्राप्त होगा।
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- इस प्रकार केवल विधिक विवाह ही नहीं, बल्कि कुछ परिस्थितियों में लिव-इन संबंधों में रहने वाली महिलाओं को भी घरेलू हिंसा और उत्पीड़न के विरुद्ध आपराधिक संरक्षण उपलब्ध होगा। अदालत ने 'अर्नश कुमार बनाम बिहार राज्य' मामले के दिशानिर्देशों को सख्ती से लागू करने का आदेश दिया ताकि इस धारा के तहत बिना प्रारंभिक जांच के मनमानी गिरफ्तारियां न हों।
- इस प्रकार केवल विधिक विवाह ही नहीं, बल्कि कुछ परिस्थितियों में लिव-इन संबंधों में रहने वाली महिलाओं को भी घरेलू हिंसा और उत्पीड़न के विरुद्ध आपराधिक संरक्षण उपलब्ध होगा। अदालत ने 'अर्नश कुमार बनाम बिहार राज्य' मामले के दिशानिर्देशों को सख्ती से लागू करने का आदेश दिया ताकि इस धारा के तहत बिना प्रारंभिक जांच के मनमानी गिरफ्तारियां न हों।
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मामले की पृष्ठभूमि:
वर्तमान मामले में आरोपी ने यह तर्क दिया कि वह पहले से विवाहित था, इसलिए शिकायतकर्ता के साथ उसका विवाह वैध नहीं था और धारा 498A उसके विरुद्ध लागू नहीं हो सकती। न्यायालय ने इस तर्क को अस्वीकार करते हुए कहा कि यदि कोई पुरुष किसी महिला को वैवाहिक संबंध का विश्वास दिलाकर उसके साथ रहता है और बाद में उसके साथ क्रूरता करता है, तो वह केवल विवाह की वैधता का हवाला देकर दायित्व से नहीं बच सकता। न्यायालय ने यह भी कहा कि क्रूरता का प्रभाव इस बात पर निर्भर नहीं करता कि पीड़िता विवाहित है या लिव-इन संबंध में।
सार्थक व्याख्या और कानूनी दृष्टिकोण:
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- सुप्रीम कोर्ट ने धारा 498A में प्रयुक्त "पति" शब्द की व्यापक और उद्देश्यपूर्ण व्याख्या की है। अदालत के अनुसार, इस कानून का मूल उद्देश्य महिलाओं को घरेलू हिंसा और क्रूरता से बचाना तथा समाज में सुधार लाना है। यदि कोई पुरुष किसी महिला को धोखा देकर या शादी के इरादे से साथ रखता है और फिर क्रूरता करता है, तो उसे केवल इसलिए सुरक्षा नहीं मिलनी चाहिए क्योंकि उनके पास विवाह का कोई पारंपरिक प्रमाण पत्र नहीं है।
- यह फैसला भारत में लिव-इन रिलेशनशिप के कानूनी दर्जे को और मजबूत करता है। इससे पहले भी न्यायपालिका ने 'घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम, 2005' के तहत लिव-इन पार्टनर्स को भरण-पोषण का अधिकार दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने समय-समय पर संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) के तहत सहमति से साथ रहने के अधिकार को मान्यता दी है।
- सुप्रीम कोर्ट ने धारा 498A में प्रयुक्त "पति" शब्द की व्यापक और उद्देश्यपूर्ण व्याख्या की है। अदालत के अनुसार, इस कानून का मूल उद्देश्य महिलाओं को घरेलू हिंसा और क्रूरता से बचाना तथा समाज में सुधार लाना है। यदि कोई पुरुष किसी महिला को धोखा देकर या शादी के इरादे से साथ रखता है और फिर क्रूरता करता है, तो उसे केवल इसलिए सुरक्षा नहीं मिलनी चाहिए क्योंकि उनके पास विवाह का कोई पारंपरिक प्रमाण पत्र नहीं है।
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महिलाओं के अधिकारों की दिशा में महत्वपूर्ण कदम:
यह निर्णय महिलाओं के अधिकारों की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे उन महिलाओं को कानूनी सुरक्षा मिलेगी जो लंबे समय तक विवाह-सदृश संबंधों में रहकर आर्थिक, सामाजिक और भावनात्मक रूप से अपने साथी पर निर्भर हो जाती हैं। यह निर्णय महिलाओं के सशक्तिकरण, लैंगिक न्याय तथा गरिमापूर्ण जीवन के संवैधानिक मूल्यों को भी सुदृढ़ करता है।
चुनौतियाँ:
लिव-इन संबंधों को व्यापक कानूनी संरक्षण देने से ऐसे संबंधों की परिभाषा और दायरा विवाद का विषय बन सकता है तथा झूठे मामलों की आशंका भी बढ़ सकती है। इसी कारण सर्वोच्च न्यायालय ने अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य मामले में निर्धारित दिशा-निर्देशों का कड़ाई से पालन करने का निर्देश दिया है, ताकि बिना प्रारंभिक जाँच के किसी आरोपी या उसके परिजनों की मनमानी गिरफ्तारी न हो।
निष्कर्ष:
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक प्रगतिशील कदम है। यह स्पष्ट करता है कि कानून किसी भी महिला को केवल उसके विवाह के पारंपरिक मान्यता के अभाव में न्याय से वंचित नहीं कर सकता। अधिकार और सुरक्षा के मामले में कानूनी बारीकियों से ऊपर मानवीय गरिमा और सामाजिक न्याय को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
