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Blog / 25 Aug 2026

सर्वोच्च न्यायालय ने ‘उद्योग’ की अवधारणा को पुनः परिभाषित किया

संदर्भ:

हाल ही में, भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली सर्वोच्च न्यायालय की नौ-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने श्रम कानून के तहतउद्योग’ (Industry) शब्द के अर्थ पर 5:4 के बहुमत से फैसला सुनाया। न्यायालय ने कहा कि बैंगलोर जल आपूर्ति एवं सीवरेज बोर्ड बनाम आर. राजप्पा (1978) मामले में दी गई उद्योगकी व्यापक व्याख्या भविष्य में औद्योगिक संबंध संहिता (Industrial Relations Code-IRC), 2020 के तहत उत्पन्न होने वाले विवादों को नियंत्रित नहीं करेगी।

बेंगलुरु जल आपूर्ति मामला, 1978:

      • वर्ष 1978 में सात-न्यायाधीशों की पीठ ने औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 2(j) के तहत उद्योगशब्द की व्यापक व्याख्या की थी। इस मामले में न्यायालय नेट्रिपल टेस्ट’ (Triple Test) विकसित किया, जिसके अनुसार किसी गतिविधि को उद्योग माने जाने के लिए तीन प्रमुख तत्व आवश्यक थे-
        • व्यवस्थित गतिविधि
        • नियोक्ता और कर्मचारी के बीच सहयोग
        • मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए वस्तुओं या सेवाओं का उत्पादन अथवा वितरण।
      • न्यायालय ने स्पष्ट किया कि लाभ कमाना (Profit Motive) किसी गतिविधि को उद्योगमानने के लिए आवश्यक नहीं है। इसके परिणामस्वरूप अस्पताल, शैक्षणिक संस्थान, नगरपालिकाएँ और क्लब जैसी संस्थाएँ भी श्रम कानून के दायरे में आ सकती थीं। न्यायालय ने ऐसी संस्थाओं के लिएप्रमुख प्रकृति परीक्षण’ (Dominant Nature Test) भी विकसित किया, जो एक से अधिक प्रकार की गतिविधियाँ संचालित करती थीं।

उद्योगकी परिभाषा महत्वपूर्ण क्यों है?

      • किसी प्रतिष्ठान या संस्था को उद्योगके रूप में वर्गीकृत किया जाना यह निर्धारित करता है कि उस पर श्रमिक संरक्षण और औद्योगिक विवादों के समाधान से संबंधित प्रावधान लागू होंगे या नहीं।
      • 1978 की व्यापक व्याख्या ने श्रमिकों को वेतन, कार्य परिस्थितियों, ट्रेड यूनियन बनाने, हड़ताल, सामूहिक सौदेबाजी तथा बर्खास्तगी जैसे मामलों में कानूनी उपचार प्राप्त करने का अवसर दिया।
      • हालाँकि, इस व्यापक व्याख्या के कारण व्यापक स्तर पर मुकदमेबाजी भी हुई। विशेष रूप से उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण (LPG) के बाद निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ने से उन गतिविधियों को लेकर विवाद बढ़े, जिन्हें पहले मुख्यतः राज्य द्वारा संचालित किया जाता था।

सर्वोच्च न्यायालय का बहुमत:

      • सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 की धारा 2(p) की व्याख्यास्वतंत्र आधार’ (Clean Slate) पर की जानी चाहिए। अर्थात, इसे निरस्त किए जा चुके औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 2(j) की पूर्ववर्ती न्यायिक व्याख्याओं से बाध्य नहीं किया जा सकता।
      • इस प्रकार, 1978 का निर्णय 1947 के अधिनियम के तहत उत्पन्न पुराने या लंबित विवादों पर लागू रहेगा, लेकिन यह भविष्य में औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 के तहत उत्पन्न होने वाले विवादों का निर्धारण नहीं करेगा।
      • न्यायालय ने यह भी संकेत दिया कि पूर्व में विकसितट्रिपल टेस्टको नए वैधानिक ढाँचे के अनुरूप पुनर्गठित करने की आवश्यकता हो सकती है।

औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 की धारा 2(p):

      • औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 की धारा 2(p) में उद्योगको ऐसी व्यवस्थित गतिविधि के रूप में परिभाषित किया गया है, जो नियोक्ता और श्रमिकों के बीच सहयोग के माध्यम से वस्तुओं या सेवाओं के उत्पादन, आपूर्ति अथवा वितरण के लिए संचालित की जाती है। यह परिभाषा पूंजी निवेश या लाभ के उद्देश्य की परवाह किए बिना लागू होती है।
      • हालाँकि, संहिता में कुछ गतिविधियों को स्पष्ट रूप से इसके दायरे से बाहर रखा गया है। इनमें कुछ धार्मिक, धर्मार्थ, सामाजिक और परोपकारी गतिविधियाँ, तथा सरकार की रक्षा अनुसंधान, परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष अन्वेषण से संबंधित कुछ गतिविधियाँ शामिल हैं। इसके अतिरिक्त, केंद्र सरकार को कुछ अन्य श्रेणियों को भी बाहर रखने का अधिकार दिया गया है।
      • इस प्रकार, धारा 2(p) एक नया वैधानिक ढाँचा प्रस्तुत करती है और इसकी व्याख्या करते समय धारा 2(j) के तहत विकसित पुराने न्यायशास्त्र को यांत्रिक रूप से लागू नहीं किया जा सकता।

महत्व:

      • यह निर्णय कानूनी स्पष्टता बढ़ाने, मुकदमेबाजी कम करने तथा पुराने और नए श्रम कानूनों के बीच स्पष्ट अंतर स्थापित करने का प्रयास करता है। हालाँकि, इसका वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि न्यायालय भविष्य में उद्योगकी अवधारणा के लिए नया और स्पष्ट परीक्षण किस प्रकार विकसित करता है।
      • भारत के लिए आवश्यकता ऐसे संतुलित श्रम ढाँचे की है, जो श्रमिकों की गरिमा, सामाजिक सुरक्षा और सामूहिक सौदेबाजी के अधिकारों की रक्षा करे, साथ ही उद्यमों और सार्वजनिक संस्थानों को आवश्यक प्रशासनिक एवं परिचालनिक लचीलापन भी प्रदान करे।
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