संदर्भ:
हाल ही में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने तेलंगाना विधानसभा के अध्यक्ष को अंतिम रूप से तीन सप्ताह की समय-सीमा निर्धारित की है, ताकि वे सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी में कथित रूप से शामिल हुए भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) के शेष दो विधायकों के विरुद्ध लंबित अयोग्यता याचिकाओं पर निर्णय दे सकें। न्यायालय ने स्पष्ट रूप से चेतावनी दी है कि यदि निर्धारित अवधि के भीतर निर्णय नहीं लिया गया, तो इसे न्यायालय की अवमानना माना जाएगा। यह निर्देश संविधान की दसवीं अनुसूची (दल-बदल विरोधी कानून) के समयबद्ध और प्रभावी क्रियान्वयन को सुनिश्चित करने के लिए न्यायपालिका की सख़्त भूमिका को दर्शाता है।
पृष्ठभूमि:
-
-
- वर्ष 2023–24 के दौरान बीआरएस के कुल दस विधायकों ने कथित रूप से कांग्रेस पार्टी में शामिल होने का निर्णय लिया। इसके पश्चात उनके विरुद्ध संविधान की दसवीं अनुसूची के अंतर्गत अयोग्यता याचिकाएँ दायर की गईं। हालांकि, विधानसभा अध्यक्ष द्वारा इन याचिकाओं पर निर्णय लेने में लगातार विलंब किया जाता रहा। दिसंबर 2025 में दस में से सात याचिकाओं को खारिज कर दिया गया तथा बाद में एक अन्य याचिका पर निर्णय हुआ, जिससे अब केवल दो याचिकाएँ लंबित रह गई हैं।
- सर्वोच्च न्यायालय ने बार-बार यह स्पष्ट किया है कि विधानसभा अध्यक्ष अयोग्यता याचिकाओं को जानबूझकर लंबित रखकर उन्हें विधानसभा कार्यकाल की समाप्ति के साथ निष्प्रभावी नहीं बना सकते।
- न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया है कि यद्यपि विधानसभा अध्यक्ष को एक अर्ध-न्यायिक प्राधिकरण के रूप में संवैधानिक अधिकार प्राप्त हैं, फिर भी उनके निर्णय न्यायिक समीक्षा के अधीन होते हैं, विशेषकर तब जब दुर्भावना, मनमानी, विकृत निर्णय या अनुचित देरी के आरोप सामने आते हैं।
- वर्ष 2023–24 के दौरान बीआरएस के कुल दस विधायकों ने कथित रूप से कांग्रेस पार्टी में शामिल होने का निर्णय लिया। इसके पश्चात उनके विरुद्ध संविधान की दसवीं अनुसूची के अंतर्गत अयोग्यता याचिकाएँ दायर की गईं। हालांकि, विधानसभा अध्यक्ष द्वारा इन याचिकाओं पर निर्णय लेने में लगातार विलंब किया जाता रहा। दिसंबर 2025 में दस में से सात याचिकाओं को खारिज कर दिया गया तथा बाद में एक अन्य याचिका पर निर्णय हुआ, जिससे अब केवल दो याचिकाएँ लंबित रह गई हैं।
-
दल-बदल विरोधी कानून के बारे में:
-
-
- संविधान की दसवीं अनुसूची को वर्ष 1985 में लागू किया गया था, जिसका मुख्य उद्देश्य राजनीतिक स्थिरता बनाए रखना और अवसरवादी दल-बदल पर अंकुश लगाना है। अयोग्यता के प्रमुख आधार निम्नलिखित हैं:
- स्वेच्छा से दल छोड़ना: यदि कोई विधायक स्वेच्छा से अपनी राजनीतिक पार्टी छोड़ देता है। यह केवल औपचारिक इस्तीफे से ही नहीं, बल्कि उसके आचरण और व्यवहार से भी सिद्ध हो सकता है।
- दल का व्हिप न मानना: पार्टी के निर्देशों के विरुद्ध मतदान करना या बिना अनुमति के मतदान से अनुपस्थित रहना।
- निर्दलीय सदस्य: चुनाव जीतने के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल होना।
- नामित सदस्य: पद ग्रहण करने के छह महीने के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल होना।
- स्वेच्छा से दल छोड़ना: यदि कोई विधायक स्वेच्छा से अपनी राजनीतिक पार्टी छोड़ देता है। यह केवल औपचारिक इस्तीफे से ही नहीं, बल्कि उसके आचरण और व्यवहार से भी सिद्ध हो सकता है।
- इन मामलों में निर्णय लेने का अधिकार केवल विधानसभा अध्यक्ष या सभापति को होता है, जो एक अर्ध-न्यायिक प्राधिकरण के रूप में कार्य करते हैं। किहोतो होलोहन बनाम ज़ाचिल्हू एवं अन्य (1992) के निर्णय के बाद से ऐसे मामलों में न्यायिक समीक्षा की व्यवस्था स्थापित हुई, जिससे संवैधानिक पदाधिकारियों की जवाबदेही सुनिश्चित होती है।
- संविधान की दसवीं अनुसूची को वर्ष 1985 में लागू किया गया था, जिसका मुख्य उद्देश्य राजनीतिक स्थिरता बनाए रखना और अवसरवादी दल-बदल पर अंकुश लगाना है। अयोग्यता के प्रमुख आधार निम्नलिखित हैं:
-
चुनौतियाँ और न्यायिक टिप्पणियाँ:
-
-
- पक्षपात की आशंका: विधानसभा अध्यक्ष प्रायः सत्तारूढ़ दल से संबंधित होते हैं, जिससे निर्णयों में देरी या पक्षपात की संभावना बनी रहती है।
- समय-सीमा का अभाव: दल-बदल विरोधी कानून में निर्णय के लिए कोई स्पष्ट और अनिवार्य समय-सीमा निर्धारित नहीं है, जिसके कारण मामलों को लंबे समय तक लंबित रखा जाता है।
- न्यायालय की हालिया राय: केशम मेघाचंद्र सिंह मामले (2020) में सर्वोच्च न्यायालय ने यह सुझाव दिया था कि विधानसभा अध्यक्ष को सामान्यतः तीन महीने के भीतर अयोग्यता याचिकाओं पर निर्णय लेना चाहिए तथा भविष्य में ऐसे मामलों के लिए किसी स्वतंत्र अधिकरण की स्थापना पर भी विचार किया जा सकता है।
- विलय से संबंधित प्रावधान: यदि किसी राजनीतिक दल के कम-से-कम दो-तिहाई विधायक किसी अन्य दल में विलय के पक्ष में हों, तो उन्हें अयोग्य नहीं ठहराया जाता (91वां संविधान संशोधन अधिनियम, 2003)।
- पक्षपात की आशंका: विधानसभा अध्यक्ष प्रायः सत्तारूढ़ दल से संबंधित होते हैं, जिससे निर्णयों में देरी या पक्षपात की संभावना बनी रहती है।
-
महत्त्व:
सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्देश स्पष्ट रूप से यह संदेश देता है कि संवैधानिक पदों का उपयोग कानून के क्रियान्वयन में देरी करने के लिए नहीं किया जा सकता। यह आदेश दल-बदल विरोधी कानून की विश्वसनीयता और प्रभावशीलता को बनाए रखने में सहायक है तथा यह दर्शाता है कि न्यायपालिका, विधानसभा अध्यक्ष के संवैधानिक अधिकारों का सम्मान करते हुए भी लोकतांत्रिक जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है।
निष्कर्ष:
तेलंगाना विधानसभा अध्यक्ष को दी गई तीन सप्ताह की अंतिम समय-सीमा यह दर्शाती है कि सर्वोच्च न्यायालय संविधान की दसवीं अनुसूची के प्रभावी और निष्पक्ष क्रियान्वयन को लेकर गंभीर है। इससे यह सुनिश्चित होता है कि दल-बदल से संबंधित मामलों का समयबद्ध और निष्पक्ष निपटारा हो सके। यह कदम न केवल राजनीतिक स्थिरता को सुदृढ़ करता है, बल्कि यह भी स्पष्ट करता है कि संवैधानिक अधिकारों का प्रयोग सदैव कानूनी और नैतिक सीमाओं के भीतर ही किया जाना चाहिए।
