संदर्भ:
हाल ही में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार के 2021 के कार्यालय ज्ञापन (Office Memorandum-OM) को रद्द कर दिया, जिसने पूर्व पर्यावरणीय स्वीकृति के बिना निर्मित परियोजनाओं को पूर्वव्यापी (Ex Post Facto) पर्यावरणीय स्वीकृति प्राप्त करने की अनुमति दी थी। न्यायालय ने कहा कि कार्यपालिका के निर्देश वैधानिक पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों को कमजोर नहीं कर सकते तथा यह पुनः स्पष्ट किया कि पूर्व पर्यावरणीय स्वीकृति (Environmental Clearance-EC) ही नियम है।
पूर्वव्यापी पर्यावरणीय स्वीकृति क्या है?
पूर्वव्यापी पर्यावरणीय स्वीकृति (Ex-Post Facto Clearance) से आशय उस प्रक्रिया से है, जिसमें किसी परियोजना को पूर्व पर्यावरणीय स्वीकृति (EC) प्राप्त किए बिना निर्माण या संचालन प्रारंभ करने के बाद पर्यावरणीय स्वीकृति प्रदान की जाती है। सामान्यतः, परियोजनाओं को प्रारंभ होने से पहले संभावित पर्यावरणीय प्रभावों का आकलन करने तथा उन्हें कम करने के लिए आवश्यक स्वीकृति प्राप्त करनी होती है।
पृष्ठभूमि:
पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के अंतर्गत जारी पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) अधिसूचना, 2006 के अनुसार, निर्दिष्ट परियोजनाओं के लिए निर्माण प्रारंभ करने से पहले पूर्व पर्यावरणीय स्वीकृति (EC) अनिवार्य है। हालांकि, 2017 की आम माफी (Amnesty) अधिसूचना तथा 2021 के कार्यालय ज्ञापन (OM) ने उन परियोजनाओं को, जिन्होंने बिना स्वीकृति के निर्माण प्रारंभ कर दिया था या पूरा कर लिया था, पश्चात् (Post-Facto) पर्यावरणीय स्वीकृति प्राप्त करने की अनुमति दी, जिससे पर्यावरणीय अनुपालन को लेकर चिंताएँ उत्पन्न हुईं।
निर्णय की प्रमुख विशेषताएँ:
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- व्यापक नियमितीकरण अमान्य: न्यायालय ने 2021 के OM को रद्द करते हुए इसे एक स्थायी आम माफी योजना बताया, जिसने अवैध परियोजनाओं को वैधता प्रदान की।
- कार्यपालिका के आदेश कानून से ऊपर नहीं हो सकते: न्यायालय ने कहा कि कोई भी प्रशासनिक निर्देश वैधानिक EIA अधिसूचना, 2006 का स्थान नहीं ले सकता।
- संवैधानिक उल्लंघन: OM ने मनमाना व्यवहार करने की अनुमति देकर अनुच्छेद 14 का तथा पर्यावरण संरक्षण को कमजोर करके, जो जीवन के अधिकार का अभिन्न अंग है, अनुच्छेद 21 का उल्लंघन किया।
- सीमित अपवाद: न्यायालय ने कहा कि सामान्यतः पूर्वव्यापी (Ex-Post Facto) पर्यावरणीय स्वीकृति स्वीकार्य नहीं है। हालांकि, असाधारण परिस्थितियों में सरकार पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 की धारा 3 के अंतर्गत किसी परियोजना का नियमितीकरण केवल तभी कर सकती है, जब इसके लिए कानून द्वारा स्पष्ट अनुमति हो तथा यह अत्यावश्यक सार्वजनिक हित में उचित हो।
- व्यापक नियमितीकरण अमान्य: न्यायालय ने 2021 के OM को रद्द करते हुए इसे एक स्थायी आम माफी योजना बताया, जिसने अवैध परियोजनाओं को वैधता प्रदान की।
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निर्णय का प्रभाव:
इस निर्णय का प्रभाव भावी (Prospective) होगा, जिससे यह सुनिश्चित होगा कि-
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- 2017 की अधिसूचना और 2021 के OM के तहत पहले से प्रदान की गई स्वीकृतियाँ तब तक वैध रहेंगी, जब तक उन्हें व्यक्तिगत रूप से चुनौती नहीं दी जाती।
- ओडिशा एम्स (AIIMS Odisha), विजयपुरा ग्रीनफील्ड हवाई अड्डा (कर्नाटक) तथा सामूहिक अपशिष्ट जल शोधन संयंत्रों सहित प्रमुख सार्वजनिक अवसंरचना परियोजनाओं को ध्वस्त नहीं किया जाएगा।
- भविष्य में परियोजनाएँ पर्यावरणीय कानूनों का उल्लंघन करने के बाद नियमित रूप से पूर्वव्यापी स्वीकृति प्राप्त नहीं कर सकेंगी।
- 2017 की अधिसूचना और 2021 के OM के तहत पहले से प्रदान की गई स्वीकृतियाँ तब तक वैध रहेंगी, जब तक उन्हें व्यक्तिगत रूप से चुनौती नहीं दी जाती।
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महत्त्व:
यह निर्णय विधि के शासन (Rule of Law) को सुदृढ़ करता है तथा पुनः स्पष्ट करता है कि कार्यपालिका की सुविधा वैधानिक सुरक्षा उपायों को निष्प्रभावी नहीं कर सकती। यह निवारक पर्यावरणीय शासन को मजबूत करता है, जानबूझकर किए गए उल्लंघनों को हतोत्साहित करता है तथा समानता (अनुच्छेद 14) और अनुच्छेद 21 के अंतर्गत स्वच्छ पर्यावरण के अधिकार जैसे संवैधानिक सिद्धांतों की रक्षा करता है। साथ ही, यह मौजूदा सार्वजनिक निवेशों की सुरक्षा करके पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक स्थिरता के बीच संतुलन भी स्थापित करता है।
आगे की राह:
सरकार को पर्यावरणीय स्वीकृति की प्रक्रियाओं को सरल और प्रभावी बनाना चाहिए, निगरानी तंत्र को मजबूत करना चाहिए, EIA प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित करनी चाहिए तथा नियमों के उल्लंघन पर कठोर दंड लागू करना चाहिए। पर्यावरणीय विनियमन को सतत विकास को बढ़ावा देना जारी रखना चाहिए, ताकि आर्थिक विकास पारिस्थितिक सुरक्षा की कीमत पर न हो।
