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Blog / 28 Oct 2026

दवा मूल्य नियंत्रण पर सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी

संदर्भ:

27 अक्टूबर, 2026 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने आवश्यक दवाओं की कीमतों के नियमन की समीक्षा करते हुए टिप्पणी की कि आर्थिक नीति नागरिकों के जीवन से अधिक महत्त्वपूर्ण नहीं हो सकती। न्यायालय ने अत्यधिक व्यापारिक मार्जिन और दवाओं की कीमतों पर नियंत्रण लागू करने में कमजोर प्रवर्तन को लेकर केंद्र सरकार तथा राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) से सवाल किए।

प्रमुख घटनाक्रम:

      • राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) ने कैंसर-रोधी 137 गैर-अनुसूचित दवाओं पर व्यापारिक मार्जिन को उनके अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) के 30% तक सीमित कर दिया है। संशोधित कीमतें 9 नवंबर, 2026 से लागू होने वाली हैं। न्यायालय ने सवाल किया कि औषधि (मूल्य नियंत्रण) आदेश, 2013 (DPCO) के तहत निर्धारित 16% खुदरा विक्रेता मार्जिन को आवश्यक दवाओं पर अधिक व्यापक रूप से क्यों लागू नहीं किया जाना चाहिए।
      • केंद्र सरकार ने संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की वकालत करते हुए तर्क दिया कि दवाओं की कीमतों पर सरकार का पूर्ण नियंत्रण निवेश, नवाचार और प्रतिस्पर्धा पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है। अस्पतालों ने भी तर्क दिया कि दवाओं पर मार्जिन कम करने से उनकी वित्तीय व्यवहार्यता प्रभावित हो सकती है और अन्य सेवाओं के शुल्क में वृद्धि हो सकती है। सर्वोच्च न्यायालय ने अपना आदेश सुरक्षित रख लिया और संबंधित पक्षों को लिखित तर्क प्रस्तुत करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया।

भारत में दवा मूल्य विनियमन:

      • आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 के तहत जारी औषधि (मूल्य नियंत्रण) आदेश, 2013, निर्धारित दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए एक रूपरेखा प्रदान करता है। औषधि विभाग के अंतर्गत कार्यरत NPPA दवाओं की कीमतों की निगरानी करता है और लागू मूल्य नियंत्रण उपायों को प्रभावी बनाता है।
      • अनुसूचित दवाओं के मूल्य सामान्यतः सरकार द्वारा निर्धारित अधिकतम सीमा के अधीन होते हैं, जबकि गैर-अनुसूचित दवाओं पर मूल्य वृद्धि संबंधी प्रतिबंधों सहित अन्य लागू प्रावधानों के तहत नियंत्रण रखा जाता है।
      • राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण भारत सरकार की एक स्वतंत्र नियामक एजेंसी है, जिसकी स्थापना 29 अगस्त, 1997 को हुई थी। यह रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के औषधि विभाग के अंतर्गत कार्य करता है और इसका मुख्यालय नई दिल्ली में स्थित है।
      • इसका कानूनी अधिकार आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 की धारा 3 के तहत जारी औषधि (मूल्य नियंत्रण) आदेश से प्राप्त होता है।

प्रमुख मुद्दे:

      • दवाओं की ऊँची कीमतें लोगों के जेब से होने वाले स्वास्थ्य व्यय को बढ़ाती हैं और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को कर्ज लेने के लिए मजबूर कर सकती हैं। कमजोर प्रवर्तन और अधिक कीमत वसूलने पर प्राप्त अतिरिक्त राशि की वसूली में देरी से नियामक व्यवस्था की प्रभावशीलता कम हो जाती है।
      • दूसरी ओर, अत्यधिक कठोर मूल्य नियंत्रण से औषधि क्षेत्र में निवेश और नवाचार प्रभावित हो सकते हैं। अत्यधिक मूल्य वृद्धि और अनुचित लागत को अन्य सेवाओं पर डालने से रोकने के लिए आवश्यक दवाओं के वर्गीकरण तथा अस्पतालों के बिलों में पारदर्शिता सुनिश्चित करने हेतु साक्ष्य-आधारित मानकों की भी आवश्यकता है।

आगे की राह:

सरकार को NPPA की निगरानी, प्रवर्तन और अतिरिक्त वसूली गई राशि की वापसी से संबंधित व्यवस्थाओं को मजबूत करना चाहिए। साथ ही, पारदर्शी मानदंडों के आधार पर आवश्यक दवाओं की सूची की समय-समय पर समीक्षा की जानी चाहिए। साक्ष्य-आधारित मूल्य सीमाएँ निर्धारित करते समय दवाओं की सामर्थ्यपूर्ण कीमतों और उद्योग को उचित प्रतिफल मिलने के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। जेनेरिक दवाओं, सार्वजनिक खरीद और जन औषधि केंद्रों का विस्तार दवाओं तक पहुँच बेहतर बना सकता है। अस्पतालों के बिलों में पारदर्शिता, सेवा शुल्क की निगरानी और औषधि अनुसंधान को समर्थन देना भी आवश्यक है।

निष्कर्ष:

किफायती दवाएँ जीवन के अधिकार को वास्तविक अर्थ प्रदान करने के लिए आवश्यक हैं। भारत को औषधि नवाचार के लिए प्रोत्साहन बनाए रखते हुए प्रभावी मूल्य विनियमन, मजबूत प्रवर्तन और स्वास्थ्य सेवाओं की बिलिंग में पारदर्शिता सुनिश्चित करनी होगी। अंतिम उद्देश्य यह होना चाहिए कि जीवनरक्षक उपचार तक पहुँच व्यक्ति की आर्थिक स्थिति पर कम और उसकी चिकित्सकीय आवश्यकता पर अधिक निर्भर करे।

 

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