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Blog / 13 Mar 2026

डीपीडीपी कानूनों में ‘व्यक्तिगत डेटा’ की परिभाषा का अध्ययन करेगा सुप्रीम कोर्ट

डीपीडीपी कानूनों में व्यक्तिगत डेटाकी परिभाषा का अध्ययन करेगा सुप्रीम कोर्ट

संदर्भ:

हाल ही में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने उन याचिकाओं पर सुनवाई करने के लिए सहमति जताई है, जिनमें डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 और उससे जुड़े नियमों के कुछ प्रावधानों को चुनौती दी गई है। यह मामला एक महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न उठाता है कि भारत के डेटा संरक्षण ढाँचे में वास्तव में व्यक्तिगत डेटाया व्यक्तिगत जानकारीकिसे कहा जाएगा। न्यायालय ने कहा कि इस मुद्दे में दो प्रतिस्पर्धी मौलिक अधिकारों “गोपनीयता का अधिकार और सूचना का अधिकार” के बीच संतुलन बनाने का प्रश्न शामिल है। इसलिए अदालत को व्यक्तिगत जानकारीकी सीमा को स्पष्ट करना पड़ सकता है।

पृष्ठभूमि:

      • डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023:
        • यह अधिनियम भारत में व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा और उसके उपयोग के लिए पहला व्यापक कानूनी ढाँचा प्रदान करता है।
        • यह निर्धारित करता है कि डिजिटल व्यक्तिगत डेटा किस प्रकार एकत्र किया जाएगा, संग्रहित किया जाएगा और उसका प्रसंस्करण (प्रोसेसिंग) कैसे किया जाएगा।
        • यह डेटा फिड्युशियरी (Data Fiduciaries) अर्थात उन संस्थाओं के लिए दायित्व तय करता है जो डेटा का प्रसंस्करण करती हैं।
        • यह कानून इसके क्रियान्वयन के लिए डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड ऑफ इंडिया की स्थापना का प्रावधान करता है।
        • यह व्यक्तियों (डेटा प्रिंसिपल) को उनके व्यक्तिगत डेटा पर कई अधिकार प्रदान करता है।
        • इस कानून के अनुसार, व्यक्तिगत डेटा वह कोई भी जानकारी है जो किसी पहचान योग्य व्यक्ति से संबंधित हो।
      • उदाहरण के रूप में इसमें शामिल हो सकते हैं:
        • नाम
        • मोबाइल नंबर
        • पता
        • आधार नंबर
        • लोकेशन डेटा
        • ऑनलाइन पहचान से जुड़ी जानकारी

मामला सुप्रीम कोर्ट के समक्ष क्यों आया?

      • सूचना का अधिकार अधिनियम में संशोधन:
        • सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 8(1)(j) में डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 के माध्यम से संशोधन किया गया, जिससे व्यक्तिगत जानकारी से जुड़े अपवादों (exemptions) का दायरा बढ़ गया। आलोचकों का कहना है कि:
          • सरकारी प्राधिकरण किसी भी जानकारी को व्यक्तिगत डेटाबताकर आरटीआई के तहत सूचना देने से इंकार कर सकते हैं।
          • इससे शासन में पारदर्शिता और जवाबदेही कमजोर हो सकती है।
        • इन याचिकाओं को पत्रकारों, नागरिक समाज संगठनों और पारदर्शिता के पक्ष में काम करने वाले कार्यकर्ताओं ने दायर किया है। उनका तर्क है कि यह संशोधन आरटीआई व्यवस्था को कमजोर कर सकता है।
      • दो मौलिक अधिकारों के बीच टकराव:
        • यह मामला दो महत्वपूर्ण मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन के प्रश्न को सामने लाता है:
          • गोपनीयता का अधिकार: जिसे के. एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (2017) के ऐतिहासिक निर्णय में मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी गई।
          • सूचना का अधिकार: यह अधिकार संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) अर्थात अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से उत्पन्न माना जाता है।
        • सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि इन दोनों अधिकारों के बीच संतुलन बनाना और व्यक्तिगत डेटाकी परिभाषा को स्पष्ट करना आवश्यक है।

अदालत के सामने मुख्य कानूनी प्रश्न:

      • व्यक्तिगत डेटाक्या है? अदालत यह स्पष्ट कर सकती है कि:
        • क्या सार्वजनिक पद पर कार्य कर रहे अधिकारियों से जुड़ी जानकारी भी व्यक्तिगत डेटा मानी जाएगी?
        • क्या ऐसी जानकारी को गोपनीयता के आधार पर सार्वजनिक करने से रोका जा सकता है?
      • सार्वजनिक हित अपवाद की सीमा:
        • पहले आरटीआई कानून में यह प्रावधान था कि यदि बड़े सार्वजनिक हित में हो तो व्यक्तिगत जानकारी भी उजागर की जा सकती है।
        • आलोचकों का कहना है कि डीपीडीपी संशोधन इस संतुलन को कमजोर कर सकता है।

संवैधानिक सिद्धांत:

      • अनुपातिकता परीक्षण:
        • मौलिक अधिकारों पर लगाए गए प्रतिबंधों को कुछ शर्तों को पूरा करना आवश्यक होता है, जैसे:
          • वैध उद्देश्य
          • आवश्यकता
          • अनुपातिकता
          • प्रक्रिया संबंधी सुरक्षा
        • संभावना है कि अदालत डीपीडीपी कानून के प्रावधानों की जांच के लिए इस सिद्धांत को लागू करे।

गोपनीयता संबंधी न्यायशास्त्र:

      • इस क्षेत्र में कुछ महत्वपूर्ण निर्णय पहले भी दिए जा चुके हैं, जैसे:
        • के. एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (2017): इस फैसले में गोपनीयता को मौलिक अधिकार घोषित किया गया।
        • सीपीआईओ बनाम सुभाष चंद्र अग्रवाल (2019) : इसमें गोपनीयता और आरटीआई के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास किया गया।
      • वर्तमान मामला डिजिटल युग में इस संतुलन को और स्पष्ट कर सकता है।

निष्कर्ष:

डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 कानून के तहत व्यक्तिगत डेटाकी परिभाषा पर सर्वोच्च न्यायालय की व्याख्या भारत में गोपनीयता और पारदर्शिता के बीच संतुलन तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। संभावना है कि यह निर्णय भारत के डेटा संरक्षण और सूचना शासन तंत्र के लिए एक ऐतिहासिक निर्णय साबित हो सकता है।