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Blog / 03 Jun 2026

क्या गोपनीयता (Privacy) माता-पिता के अधिकार से ऊपर हो सकती है? पितृत्व मामलों में DNA टेस्ट पर सुप्रीम कोर्ट

संदर्भ:

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने एक मामले में डीएनए परीक्षण का आदेश बरकरार रखते हुए कहा कि कुछ परिस्थितियों में बच्चे की अपनी जैविक पहचान (Biological Identity) जानने की इच्छा कथित पिता के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत निजता के अधिकार (Right to Privacy) से अधिक महत्वपूर्ण हो सकती है।

पृष्ठभूमि: भारतीय कानून में पितृत्व का प्रश्न

भारत में लंबे समय तक पितृत्व विवादों का समाधान मुख्यतः भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 112 (अब भारतीय साक्ष्य अधिनियम/भारतीय साक्ष्य अधिनियम 2023 की धारा 116) के आधार पर किया जाता रहा है। इस प्रावधान के अनुसार विवाह के दौरान जन्मे बच्चे को वैध (Legitimate) माना जाता है, जब तक कि पति-पत्नी के बीच अनधिगमन (non-access) अर्थात् सहवास न होने का प्रमाण न दिया जाए।

इसका मूल उद्देश्य था:

    • बच्चे को सामाजिक कलंक (Stigma) से बचाना,
    • परिवार की स्थिरता बनाए रखना,
    • बच्चे को "अवैध संतान" घोषित होने से संरक्षण देना।

कोर्ट का निर्णय:

      • कोर्ट ने माना कि वर्तमान मामले में पितृत्व का प्रश्न सीधे और महत्वपूर्ण रूप से विवाद का विषय है। साथ ही यह भी कहा गया कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई अन्य ठोस सबूत उपलब्ध नहीं है, जिससे पितृत्व का निर्णायक रूप से निर्धारण किया जा सके। ऐसी परिस्थितियों में न्यायसंगत और प्रभावी समाधान के लिए डीएनए परीक्षण आवश्यक है।
      • कोर्ट ने कहा कि डीएनए परीक्षण की अनुमति न देने से यह स्थिति उत्पन्न हो सकती है कि दावेदार को अपने कानूनी अधिकारों, जैसे पहचान और उत्तराधिकार (inheritance) के अधिकारों को हमेशा के लिए खोना पड़ जाए।
      • इसी आधार पर कोर्ट ने कहा कि उचित मामलों में बच्चे या दावेदार के जैविक मूल को जानने का हित, कथित माता-पिता की गोपनीयता संबंधी चिंताओं से अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है, विशेषकर तब जब विवाद को सुलझाने के लिए कोई वैकल्पिक साक्ष्य उपलब्ध न हो।

कानूनी ढांचा (Legal Framework):

      • भारतीय कानून में वैधता (legitimacy) की मजबूत धारणा होती है, जो भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 112 में स्थापित थी, जिसे अब भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA), 2023 की धारा 116 में शामिल किया गया है।
      • इस प्रावधान के अनुसार, यदि कोई बच्चा वैध विवाह के दौरान जन्म लेता है या विवाह के विघटन के 280 दिनों के भीतर जन्म लेता है, तो उसे वैध (legitimate) माना जाता है-जब तक यह साबित न हो जाए कि संबंधित अवधि में पति-पत्नी के बीच “non-access” (संपर्क न होना) था।
      • यह धारणा परिवार की स्थिरता और बच्चे की गरिमा की रक्षा के उद्देश्य से बनाई गई है।

भारत में DNA परीक्षण का विकास:

      • जब 1872 में धारा 112 बनाई गई थी, तब पितृत्व (paternity) जांच के लिए कोई वैज्ञानिक तकनीक उपलब्ध नहीं थी। DNA परीक्षण 1980 के दशक के बाद वैश्विक स्तर पर व्यावसायिक रूप से उपलब्ध हुआ और 1990 के दशक में धीरे-धीरे भारतीय न्यायिक प्रक्रियाओं में शामिल हुआ।
      • प्रारंभिक न्यायिक मान्यता कुन्हीरामन बनाम मनोज (1991, केरल हाई कोर्ट) में मिली, जिसमें गैर-विवाहिक विवाद में DNA साक्ष्य को स्वीकार किया गया, जिससे पारिवारिक कानून में वैज्ञानिक साक्ष्य की ओर बदलाव का संकेत मिला।

सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख निर्णय:

      • गौतम कुंडु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (1993) में न्यायालय ने नियमित रूप से रक्त अथवा डीएनए परीक्षण को अस्वीकार कर दिया और कहा कि पहले असंपर्क (non-access)” का सशक्त प्रथमदृष्टया (prima facie) प्रमाण प्रस्तुत किया जाना आवश्यक है।
      • बनारसी दास बनाम टीकू दत्ता (2005) में न्यायालय ने स्पष्ट किया कि डीएनए परीक्षण का आदेश सामान्य रूप से नहीं दिया जाना चाहिए और यह भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 112 के अंतर्गत स्थापित वैधता की धारणा को सरलता से समाप्त नहीं कर सकता।
      • तथापि नंदलाल वासुदेव बडवाइक बनाम लता (2014) में न्यायालय ने डीएनए साक्ष्य को स्वीकार करते हुए कहा कि जब विधिक धारणा और वैज्ञानिक सत्य में टकराव उत्पन्न हो, तो वैज्ञानिक सत्य को प्राथमिकता दी जा सकती है।
      • इससे एक दो-स्तरीय सिद्धांत विकसित हुआ:
        • पहले कानूनी धारणा लागू होती है, लेकिन यदि डीएनए परीक्षण आदेशित हो जाए, तो उसके परिणाम को निर्णायक माना जाता है।

निष्कर्ष:

यह निर्णय केवल वैधता (legitimacy) की रक्षा से आगे बढ़कर एक संतुलित अधिकार-आधारित दृष्टिकोण की ओर बदलाव को दर्शाता है। पुट्टस्वामी (Puttaswamy) फैसले के बाद गोपनीयता एक महत्वपूर्ण संवैधानिक अधिकार है, लेकिन यह पूर्ण (absolute) नहीं है। पितृत्व विवादों में अब अदालतें यह मानती हैं कि जहाँ कोई अन्य साक्ष्य उपलब्ध नहीं है, वहाँ कुछ असाधारण मामलों में जैविक पहचान जानने का अधिकार, गोपनीयता के अधिकार से अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है।

 

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