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Blog / 05 Feb 2026

सुप्रीम कोर्ट और मृत्युदंड

संदर्भ:

राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय, दिल्ली की शोध एवं वाद-विवाद इकाई प्रोजेक्ट 39 की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने पिछले तीन वर्षों (2023–2025) के दौरान एक भी मृत्युदंड की सज़ा को बरकरार नहीं रखा है। यद्यपि निचली अदालतों द्वारा मृत्युदंड दिए जाने के मामलों में वृद्धि देखी गई है, फिर भी यह प्रवृत्ति सर्वोच्च न्यायालय के सतर्क, अधिकार-आधारित और मानवीय दृष्टिकोण को स्पष्ट रूप से दर्शाती है।

रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष:

      • सुप्रीम कोर्ट द्वारा किसी भी मृत्युदंड की पुष्टि नहीं (2023–2025): पिछले तीन वर्षों में सर्वोच्च न्यायालय ने या तो मृत्युदंड की सज़ा को आजीवन कारावास में परिवर्तित किया है अथवा अभियुक्त को पूर्ण रूप से बरी किया है। यह इस बात को रेखांकित करता है कि अपीलीय स्तर पर मामलों की अत्यंत कठोर, सूक्ष्म और गहन जाँच की जाती है।
      • बरी किए जाने और सज़ा में कमी की उच्च दर: वर्ष 2025 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निस्तारित मृत्युदंड मामलों में से आधे से अधिक मामलों में अभियुक्तों को बरी किया गया। यह अनुपात 2016 के बाद अब तक का सबसे अधिक है।
      • मृत्युदंड की प्रतीक्षा में कैदियों की बढ़ती संख्या: यद्यपि अपीलीय न्यायालय मृत्युदंड के मामलों में संयमित रुख अपना रहे हैं, फिर भी 2025 के अंत तक 574 व्यक्ति मृत्युदंड की प्रतीक्षा में थे। यह संख्या 2016 के बाद सबसे अधिक दर्ज की गई है।

मृत्युदंड के प्रति न्यायिक दृष्टिकोण:

सर्वोच्च न्यायालय ने निरंतर रूप से प्रक्रियात्मक निष्पक्षता, न्यायसंगत सुनवाई और व्यक्ति-विशेष की परिस्थितियों के अनुरूप सज़ा निर्धारण पर विशेष बल दिया है। इस न्यायिक दृष्टिकोण के प्रमुख तत्व निम्नलिखित हैं:

      • प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपाय: मनोज बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2022) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने यह अनिवार्य किया कि निचली अदालतें अभियुक्त के मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन, परिवीक्षा अधिकारी की रिपोर्ट तथा जेल में उसके आचरण से संबंधित अभिलेखों पर अवश्य विचार करें। इन निर्देशों का पालन न किया जाना संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन माना गया है।
      • अनुच्छेद 32 के अंतर्गत अधिकार: यदि यह पाया जाता है कि मृत्युदंड से संबंधित मामलों में प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों का उल्लंघन हुआ है, तो सर्वोच्च न्यायालय के पास रिट याचिकाओं के माध्यम से ऐसे मामलों पर पुनर्विचार करने का अधिकार सुरक्षित है।
      • शमनकारी परिस्थितियों पर विशेष बल: घोर और जघन्य अपराधों के मामलों में भी अब अभियुक्त की आयु, उसकी सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि तथा उसके सुधार की संभावना जैसे पहलुओं पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है, ताकि यह निर्धारित किया जा सके कि मामला वास्तव में दुर्लभ से दुर्लभतमकी श्रेणी में आता है या नहीं।

न्याय व्यवस्था के भीतर विरोधाभास:

      • निचली अदालतें बनाम अपीलीय जाँच: निचली अदालतें अपेक्षाकृत अधिक संख्या में मृत्युदंड की सज़ा सुनाती हैं, किंतु इनमें से अधिकांश सजाएँ उच्च न्यायालयों अथवा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा या तो रद्द कर दी जाती हैं या आजीवन कारावास में परिवर्तित कर दी जाती हैं।
      • उच्च न्यायालयों की मिश्रित भूमिका: कुछ मामलों में उच्च न्यायालय मृत्युदंड की पुष्टि करते हैं, परंतु ऐसे मामलों का केवल एक छोटा हिस्सा ही सर्वोच्च न्यायालय की कठोर और व्यापक जाँच में टिक पाता है।

प्रोजेक्ट 39ए के बारे में:

प्रोजेक्ट 39, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 39ए से प्रेरित एक पहल है, जो आपराधिक न्याय सुधार, विधिक सहायता तथा मृत्युदंड से संबंधित मामलों पर केंद्रित रूप से कार्य करती है। इसके शोध से यह स्पष्ट होता है कि मृत्युदंड की प्रतीक्षा में रहने वाले कैदियों का एक बड़ा वर्ग आर्थिक रूप से कमजोर, सामाजिक रूप से पिछड़े अथवा अल्पसंख्यक समुदायों से संबंधित है। यह पहल निःशुल्क कानूनी सहायता प्रदान करती है तथा फॉरेंसिक विज्ञान, मानसिक स्वास्थ्य और न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता से जुड़े विषयों पर गहन शोध करती है।

भारत में मृत्युदंड व्यवस्था पर प्रभाव:

सर्वोच्च न्यायालय के इस संयमित और मानवोन्मुखी दृष्टिकोण ने न्यायिक मानवीयता और न्याय व्यवस्था में जनता के विश्वास के बीच संतुलन, कानूनी सिद्धांतों और ज़मीनी स्तर की वास्तविकताओं के बीच अंतर, तथा सभी स्तरों की अदालतों में सज़ा निर्धारण से जुड़े सुरक्षा उपायों के समान और प्रभावी पालन की आवश्यकता पर एक नई और व्यापक बहस को जन्म दिया है।

निष्कर्ष:

पिछले तीन वर्षों में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा किसी भी मृत्युदंड की सज़ा को बरकरार न रखना, भारत में मृत्युदंड संबंधी न्यायशास्त्र के विकास में एक महत्वपूर्ण और परिवर्तनकारी चरण को दर्शाता है। यह एक ओर जहाँ संवैधानिक सुरक्षा और नैतिक न्याय की अवधारणा को सुदृढ़ करता है, वहीं दूसरी ओर निचली अदालतों में विद्यमान संरचनात्मक और प्रक्रियात्मक चुनौतियों को भी उजागर करता है। भारत में मृत्युदंड को लेकर चल रही बहस आज भी प्रतिशोध, निवारण और मानवाधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करने की कोशिश करती हुई एक सतत विकसित होती न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा बनी हुई है।