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Blog / 18 Mar 2026

स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया 2026 रिपोर्ट

स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया 2026 रिपोर्ट

संदर्भ:

हाल ही में अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया 2026” रिपोर्ट के अनुसार, भारत का जनसांख्यिकीय लाभ (डेमोग्राफिक डिविडेंड) धीरे-धीरे दबाव में आता जा रहा है, क्योंकि शिक्षा का स्तर बढ़ने के बावजूद उसके अनुरूप रोजगार के पर्याप्त अवसर सृजित नहीं हो रहे हैं। पुरुष स्नातकों में 7% से भी कम लोग एक वर्ष के भीतर स्थायी वेतन वाली नौकरी हासिल कर पाते हैं, जबकि केवल 3.7% को कार्यालयी या पेशेवर श्रेणी की नौकरियों तक पहुंच मिलती है। यह स्थिति भारत के श्रम बाजार में मौजूद गहरे संरचनात्मक असंतुलन और रोजगार सृजन की सीमाओं को स्पष्ट रूप से उजागर करती है।

रिपोर्ट के मुख्य निष्कर्ष:

      • पुरुष स्नातकों में 7% से भी कम को एक वर्ष के भीतर स्थायी वेतन वाली नौकरी मिलती है।
      • कार्यालयी या पेशेवर श्रेणी की नौकरियों तक पहुंच और भी सीमित है, जो केवल 3.7% है।
      • 12वीं पास पुरुषों में:
        • लगभग 4% को वेतन वाली नौकरी मिलती है।
        • केवल 1.5% श्वेत-कॉलर कार्य में प्रवेश कर पाते हैं।
      • लगभग 40% युवा स्नातक बेरोजगार रहते हैं, जो श्रम बाजार में निरंतर दबाव को दर्शाता है।
      • इसके अतिरिक्त, PLFS के अनुसार 15–29 वर्ष के युवाओं में बेरोजगारी दर, कुल बेरोजगारी दर की तुलना में लगभग तीन गुना है, जिससे स्पष्ट होता है कि युवाओं पर इसका प्रभाव अधिक है।

बेरोजगारी क्या है?

      • बेरोजगारी वह स्थिति है जब कोई व्यक्ति काम करने के लिए इच्छुक और सक्षम होने के बावजूद वर्तमान वेतन दर पर रोजगार प्राप्त नहीं कर पाता। इसे सामान्यतः श्रम बल के उस प्रतिशत के रूप में मापा जाता है, जो सक्रिय रूप से काम की तलाश कर रहा है लेकिन उसे काम नहीं मिल रहा। भारत में बेरोजगारी के आंकड़े मुख्य रूप से आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) के माध्यम से संकलित किए जाते हैं।
      • श्रम बल में 15 वर्ष से अधिक और 64 वर्ष तक की आयु के वे सभी लोग शामिल होते हैं, जो या तो कार्यरत हैं या सक्रिय रूप से रोजगार की तलाश कर रहे हैं।

समस्या का स्वरूप:

      • संरचनात्मक असंतुलन: उच्च शिक्षा का विस्तार तेज़ी से हुआ है, लेकिन उसके अनुरूप रोजगार सृजन और कौशल विकास नहीं हो पाया है।
      • लगातार स्नातक बेरोजगारी: विशेष रूप से युवाओं में स्नातक स्तर पर बेरोजगारी लंबे समय से उच्च बनी हुई है।
      • प्रतीक्षात्मक बेरोजगारी: कई युवा नौकरी लेने में देरी करते हैं, क्योंकि:
        • वे सरकारी नौकरियों की तैयारी करते हैं।
        • उच्च शिक्षा या कौशल विकास को प्राथमिकता देते हैं।
      • अनौपचारिककरण: कई स्नातक कम गुणवत्ता वाले, असुरक्षित तथा अनौपचारिक या गिग कार्यों में प्रवेश कर जाते हैं, जिनमें नौकरी की स्थिरता और सुरक्षा का अभाव होता है।

आर्थिक और सामाजिक प्रभाव:

      • जनसांख्यिकीय लाभ पर खतरा: बड़ी युवा आबादी संभावित संपत्ति के बजाय बोझ बन सकती है।
      • बढ़ती असमानता: शिक्षित लेकिन बेरोजगारवर्ग का विस्तार हो रहा है।
      • शिक्षा का घटता प्रतिफल: स्नातकों की आय में वृद्धि दर धीमी हो गई है।
      • सामाजिक असंतोष: सीमित औपचारिक नौकरियों के लिए प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है।

संकट के प्रमुख कारण:

      • स्नातकों की संख्या में वृद्धि, लेकिन गुणवत्तापूर्ण नौकरियों की कमी
      • विनिर्माण क्षेत्र का कमजोर प्रदर्शन
      • कौशल अंतराल और व्यावसायिक प्रशिक्षण की कमी
      • तकनीकी परिवर्तन, जिससे शुरुआती स्तर की नौकरियों में कमी आई है।

आगे की राह:

      • श्रम-प्रधान विनिर्माण और एमएसएमई क्षेत्र को प्रोत्साहन देना।
      • कौशल विकास और प्रशिक्षुता (अप्रेंटिसशिप) प्रणाली को मजबूत बनाना।
      • उद्योग और शिक्षा संस्थानों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना।
      • डिग्री के बजाय रोजगार योग्य कौशल पर ध्यान केंद्रित करना।
      • सामाजिक सुरक्षा के साथ औपचारिक रोजगार के अवसरों का विस्तार करना।

निष्कर्ष:

यह रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि भारत के श्रम बाजार में एक गहरा संरचनात्मक संकट मौजूद है, जहां केवल शिक्षा प्राप्त करना रोजगार की गारंटी नहीं रहा। इस चुनौती से निपटने के लिए कौशल-आधारित विकास, बेहतर गुणवत्ता वाले रोजगार और समावेशी श्रम नीतियों की दिशा में ठोस कदम उठाना आवश्यक है, ताकि भारत अपने जनसांख्यिकीय लाभ का प्रभावी उपयोग कर सके।