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Blog / 22 May 2026

धारा 124A: आरोपी के रुख पर टिकी मुकदमे की चाल

धारा 124A: आरोपी के रुख पर टिकी मुकदमे की चाल

चर्चा में क्यों:

हाल ही में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 124A के तहत चल रहे देशद्रोह के मुकदमे और अपीलें आगे बढ़ सकती हैं, यदि आरोपी स्पष्ट रूप से इस पर आपत्ति नहीं करता। यह टिप्पणी उस मामले में आई जिसमें एक आरोपी 17 वर्षों से जेल में था और उसने अपने देशद्रोह मामले की अपील को गुण-दोष के आधार पर निपटाने की मांग की थी। सर्वोच्च न्यायालय की यह स्पष्टता 2022 के उस अंतरिम आदेश को संशोधित करती है, जिसमें सरकार द्वारा औपनिवेशिक काल के इस कानून की समीक्षा किए जाने तक सभी देशद्रोह मामलों पर रोक लगा दी गई थी।

पृष्ठभूमि:

मई 2022 में, सर्वोच्च न्यायालय ने देशभर में सभी देशद्रोह कार्यवाहियों पर रोक लगा दी थी और निर्देश दिया था कि धारा 124A के तहत कोई नई एफआईआर (प्राथमिकी) दर्ज न की जाए, जब तक इस प्रावधान पर पुनर्विचार न हो जाए। इसका उद्देश्य राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी चिंताओं और संविधान के तहत नागरिक स्वतंत्रताओं की सुरक्षा के बीच संतुलन बनाना था। हालिया निर्णय में आरोपी की सहमति के आधार पर एक मामले-विशेष अपवाद जोड़ा गया है।

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य अवलोकन:

      • आरोपी की सहमति:
        • यदि कोई आरोपी चाहता है कि उसके मामले की सुनवाई गुण-दोष के आधार पर हो, तो कार्यवाही आगे बढ़ सकती है।
        • यदि आरोपी स्वेच्छा से सहमत है, तो इस पर कोई कानूनी रोक नहीं है।
      • उच्च न्यायालय को निर्देश:
        • सर्वोच्च न्यायालय ने मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय को लंबित अपील की तुरंत सुनवाई करने का निर्देश दिया।
        • मामले का निर्णय बिना देरी के गुण-दोष के आधार पर किया जाना चाहिए।

धारा 124A (राजद्रोह कानून) के बारे में:

धारा 124A के अनुसार राजद्रोह उन कार्यों को कहा जाता है,भाषण, लेखन या आचरण के माध्यम से, जो सरकार के प्रति घृणा या असंतोष उत्पन्न करते हैं।

      • यह एक संज्ञेय (Cognizable) अपराध है
      • यह एक गैर-जमानती (Non-bailable) अपराध है
      • दंड: आजीवन कारावास या न्यूनतम 3 वर्ष तक की सजा और जुर्माना

राजद्रोह पर प्रमुख न्यायिक निर्णय:

      • केदार नाथ सिंह बनाम बिहार राज्य (1962)
        • राजद्रोह कानून वैध है लेकिन इसका सीमित अर्थ में प्रयोग होना चाहिए।
        • केवल तभी लागू होता है जब हिंसा या सार्वजनिक अशांति के लिए उकसावा हो।
        • केवल सरकार की आलोचना करना राजद्रोह नहीं है।
      • बलवंत सिंह बनाम पंजाब राज्य (1995)
        • बिना हिंसा के नारे लगाना राजद्रोह नहीं माना जाएगा।
      • संवैधानिक प्रावधान:
        • अनुच्छेद 19(1)(a): अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
        • अनुच्छेद 19(2): सार्वजनिक व्यवस्था और सुरक्षा के लिए उचित प्रतिबंध

राजद्रोह कानून के खिलाफ तर्क:

      • अक्सर असहमति (dissent) को दबाने के लिए उपयोग किया जाता है
      • असंतोष” (disaffection) जैसे अस्पष्ट शब्दों का दुरुपयोग संभव है
      • यह औपनिवेशिक काल का कानून है
      • यूके जैसे कई लोकतांत्रिक देशों ने इसे समाप्त कर दिया है
      • पहले से मौजूद कानून (UAPA, NSA) सुरक्षा खतरों से निपटने के लिए पर्याप्त हैं

समर्थन में तर्क:

      • यह देश की संप्रभुता और अखंडता की रक्षा करता है
      • हिंसक अलगाववादी आंदोलनों को रोकने में मदद करता है
      • सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने में सहायक है
      • विद्रोह के लिए उकसाने वाले मामलों में उपयोगी है

आगे की राह:

      • केदार नाथ सिंह दिशा-निर्देशों का सख्ती से पालन करना चाहिए
      • केवल हिंसक इरादे को शामिल करने के लिए कानून की परिभाषा को सीमित करना चाहिए
      • एफआईआर दर्ज करने से पहले मजबूत सुरक्षा उपाय (safeguards) लागू करना चाहिए
      • यह पुनर्मूल्यांकन करना कि धारा 124A को बनाए रखना, संशोधित करना या समाप्त करना चाहिए

निष्कर्ष:

सुप्रीम कोर्ट का यह स्पष्टीकरण राजद्रोह कानून की संवैधानिक समीक्षा के साथ न्यायिक दक्षता को संतुलित करने का एक सूक्ष्म प्रयास दर्शाता है। यह आरोपियों को शीघ्र न्याय पाने की सुविधा देता है, लेकिन धारा 124A पर व्यापक बहस जारी है, जो भारत के लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन की चुनौती को उजागर करती है।

 

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