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Blog / 25 Mar 2026

अनुसूचित जाति का दर्जा केवल हिंदू, सिख और बौद्धों तक सीमित

संदर्भ:

हाल ही में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने इस बात की पुनः पुष्टि की है कि अनुसूचित जाति (SC) का दर्जा केवल हिंदुओं, सिखों और बौद्धों तक ही सीमित है और किसी अन्य धर्म में धर्मांतरण करने पर एससी का दर्जा समाप्त हो जाता है। इस फैसले ने जाति, धर्म, संवैधानिक समानता और सकारात्मक कार्रवाई (affirmative action) नीतियों पर चल रही बहस फिर से शुरू कर दी है।

पृष्ठभूमि:

      • यह मामला उस व्यक्ति से जुड़ा था जिसने ईसाई धर्म अपनाने के बाद एससी/एसटी (अत्याचार रोकथाम) अधिनियम के तहत सुरक्षा मांगी थी। कोर्ट ने कहा कि जैसे ही कोई व्यक्ति हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म को अपनाता है, वह अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जाएगा और उससे जुड़े कानूनी लाभ नहीं मिलेंगे। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि धर्म परिवर्तन करते ही एससी का दर्जा तुरंत समाप्त हो जाता है, चाहे जन्मजात पहचान कुछ भी हो।
      • एससी का दर्जा संविधान (अनुसूचित जातियाँ) आदेश, 1950 द्वारा नियंत्रित है। इसे शुरू में केवल हिंदुओं तक सीमित किया गया था, बाद में इसमें 1956 में सिख धर्म और 1990 में बौद्ध धर्म को शामिल किया गया।
      • इसके पीछे कारण यह है कि जाति आधारित भेदभाव ऐतिहासिक रूप से केवल इन धर्मों में गहराई से जुड़ा हुआ है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुख्य बिंदु:

      • केवल हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अनुयायी ही अनुसूचित जाति (एससी) के रूप में मान्यता प्राप्त कर सकते हैं।
      • ईसाई या मुस्लिम धर्म में परिवर्तन करने पर एससी का दर्जा तत्काल और पूर्ण रूप सेसमाप्त हो जाता है।
      • धर्म परिवर्तन करने वाला व्यक्ति एससी/एसटी (अत्याचार रोकथाम) अधिनियम के तहत कोई लाभ नहीं ले सकता।
      • अदालत ने एक ईसाई पादरी से जुड़े मामले में आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के फ़ैसले को बरकरार रखा।

अदालत का तर्क:

      • जाति का सामाजिक संदर्भ से जुड़ाव: एससी श्रेणी कुछ विशिष्ट धार्मिक ढाँचों के भीतर ऐतिहासिक जातिगत उत्पीड़न से जुड़ी हुई है।
      • आरक्षण का नीतिगत उद्देश्य: आरक्षण का लक्ष्य जातिगत पदानुक्रम से उत्पन्न होने वाली सामाजिक अक्षमताओं को दूर करना है, न कि केवल आर्थिक पिछड़ापन।
      • धार्मिक परिवर्तन का तर्क: यह माना जाता है कि धर्मांतरण जाति-आधारित सामाजिक संरचनाओं को तोड़ देता है, जिससे एससी लाभों का आधार समाप्त हो जाता है।

फैसले से जुड़े सवाल:

      • हालाँकि यह फैसला मौजूदा कानून को मजबूत करता है, लेकिन इससे संवैधानिक और सामाजिक सवाल भी उठते हैं। आलोचकों का कहना है कि जाति आधारित भेदभाव धर्म परिवर्तन के बाद भी अक्सर जारी रहता है, खासकर दलित ईसाई और मुस्लिम समुदायों में। इससे यह सवाल उठता है कि क्या अनुच्छेद 14 के तहत समानता और आरक्षण केवल धर्म तक सीमित रहना चाहिए या सामाजिक पिछड़ेपन पर आधारित होना चाहिए।
      • साथ ही, यह फैसला अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता पर भी असर डालता है, क्योंकि लोग अनुसूचित जाति से जुड़े कानूनी लाभ को खोने के डर से धर्म परिवर्तन करने में हिचक सकते हैं।

आगे की राह:

      • विभिन्न धर्मों में जाति भेदभाव का वास्तविक आंकड़ों के आधार पर मूल्यांकन करना।
      • सामाजिक पिछड़ेपन पर आधारित, धर्म-निरपेक्ष मानदंड अपनाना।
      • संसद में 1950 के राष्ट्रपति आदेश की समीक्षा करना।
      • सामाजिक न्याय (अनुच्छेद 15(4), 16(4)) और धार्मिक स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25) के बीच संतुलन बनाए रखना।

निष्कर्ष:

यह फैसला मौजूदा संवैधानिक ढांचे को मजबूत करता है, लेकिन एक गहरी समस्या को भी उजागर करता है: क्या जाति आधारित आरक्षण धर्म के साथ जुड़ा रहना चाहिए या इसे व्यापक, धर्म-निरपेक्ष सामाजिक न्याय प्रणाली में बदलना चाहिए।