संदर्भ:
हाल ही में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने कई राज्यों द्वारा नियमित और निश्चित कार्यकाल वाले पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) की नियुक्ति के स्थान पर “कार्यवाहक” अथवा तदर्थ डीजीपी नियुक्त किए जाने की बढ़ती प्रवृत्ति पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यह प्रथा प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ (2006) मामले में जारी उसके बाध्यकारी निर्देशों का उल्लंघन है। न्यायालय के अनुसार, इस प्रकार की नियुक्तियाँ योग्यता आधारित चयन प्रक्रिया को कमजोर करती हैं, पारदर्शिता को प्रभावित करती हैं तथा पुलिस की संस्थागत स्वायत्तता को क्षति पहुँचाती हैं। साथ ही, सर्वोच्च न्यायालय ने संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) को यह निर्देश भी दिया कि वह अपने पूर्व निर्देशों के प्रभावी अनुपालन को सुनिश्चित करने हेतु सक्रिय भूमिका निभाए।
सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणियाँ:
मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने यह टिप्पणी की कि अनेक राज्य डीजीपी की नियुक्ति से संबंधित प्रस्तावों को समय पर यूपीएससी को भेजने में लगातार विलंब कर रहे हैं। इसके परिणामस्वरूप तदर्थ व्यवस्थाओं को अपनाया जा रहा है, जिससे वरिष्ठ, योग्य और अनुभवी अधिकारियों को वैध रूप से डीजीपी नियुक्त होने का अवसर नहीं मिल पाता।
न्यायालय ने यूपीएससी को निर्देश दिया कि वह राज्यों के साथ औपचारिक रूप से पत्राचार करे, ताकि प्रस्ताव समयबद्ध रूप से भेजे जा सकें। इसके अतिरिक्त, यदि कोई राज्य निर्देशों का पालन करने में विफल रहता है, तो यूपीएससी को न्यायालय का रुख करने की अनुमति दी गई है। न्यायालय ने यह भी चेतावनी दी कि ऐसे मामलों में संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाएगी।
प्रकाश सिंह मामला और पुलिस सुधार:
प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ (2006) मामले के ऐतिहासिक निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से यह रेखांकित किया था कि डीजीपी का पद राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त होना चाहिए तथा उसकी नियुक्ति एक पारदर्शी, निष्पक्ष और योग्यता-आधारित प्रक्रिया के माध्यम से की जानी चाहिए। संविधान के अनुच्छेद 142 के अंतर्गत अपनी विशेष शक्तियों का प्रयोग करते हुए न्यायालय ने निम्नलिखित प्रमुख निर्देश जारी किए थे:
• चयन मानदंड: राज्यों को डीजीपी की नियुक्ति यूपीएससी द्वारा चयनित तीन सबसे वरिष्ठ और सर्वाधिक योग्य भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) अधिकारियों के पैनल में से करनी होगी।
• न्यूनतम कार्यकाल: नियुक्त डीजीपी को कम से कम दो वर्ष का निश्चित कार्यकाल प्रदान किया जाना अनिवार्य है, जिससे पुलिस प्रशासन में स्थिरता, निरंतरता और प्रभावशीलता सुनिश्चित हो सके।
• कार्यवाहक डीजीपी की अस्वीकृति: “कार्यवाहक” अथवा तदर्थ डीजीपी की अवधारणा को स्पष्ट रूप से अस्वीकार कर दिया गया, क्योंकि अस्थायी नियुक्तियाँ पुलिस सुधारों के मूल उद्देश्य को निष्प्रभावी कर देती हैं।
इसके बाद 2018 और 2019 में दिए गए आदेशों में न्यायालय ने प्रक्रिया को और अधिक स्पष्ट किया। इन आदेशों के माध्यम से यह अनिवार्य किया गया कि राज्य किसी पद के रिक्त होने से कई महीने पूर्व ही यूपीएससी को प्रस्ताव भेजें, ताकि चयन प्रक्रिया समय रहते पूरी की जा सके।
नियुक्ति प्रक्रिया के बारे में:
सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप डीजीपी नियुक्ति प्रक्रिया को सरल, पारदर्शी और एकरूप बनाने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने सिंगल विंडो सिस्टम की शुरुआत की है। यह व्यवस्था प्रकाश सिंह निर्णय तथा यूपीएससी के वर्ष 2009 के दिशानिर्देशों के अनुरूप है और इसका मुख्य उद्देश्य अनावश्यक देरी तथा प्रक्रियागत बाधाओं को कम करना है।
सिंगल विंडो सिस्टम के अंतर्गत डीजीपी नियुक्ति प्रक्रिया:
• राज्य का प्रस्ताव: प्रत्येक राज्य को वर्तमान डीजीपी की सेवानिवृत्ति से कम से कम छह महीने पूर्व योग्य अधिकारियों की सूची यूपीएससी को भेजनी होती है।
• पात्रता मानदंड: अधिकारियों के पास न्यूनतम 30 वर्ष की सेवा होनी चाहिए अथवा वे संबंधित राज्य में पुलिस प्रमुख या उससे एक स्तर नीचे के पद पर कार्यरत हों। जिन अधिकारियों की सेवानिवृत्ति में छह महीने से कम समय शेष है, उन्हें पात्र नहीं माना जाता।
• यूपीएससी द्वारा पैनल चयन: यूपीएससी की चयन समिति योग्यता, वरिष्ठता, सेवा अभिलेख तथा कार्यानुभव के आधार पर तीन अधिकारियों (छोटे राज्यों के लिए दो अधिकारियों) का पैनल तैयार करती है।
• राज्य द्वारा चयन: राज्य सरकार यूपीएससी द्वारा अनुशंसित पैनल में से किसी एक अधिकारी को डीजीपी के रूप में नियुक्त करती है।
निष्कर्ष:
सर्वोच्च न्यायालय की हालिया टिप्पणियाँ इस तथ्य को स्पष्ट रूप से उजागर करती हैं कि न्यायिक निर्देशों और राज्यों द्वारा उनके वास्तविक क्रियान्वयन के बीच अब भी गंभीर अंतर बना हुआ है। सिंगल विंडो सिस्टम (जो प्रकाश सिंह निर्णय और यूपीएससी के दिशानिर्देशों पर आधारित है) पारदर्शी, योग्यता-आधारित और जवाबदेह डीजीपी नियुक्तियों को प्रोत्साहित करता है। इन मानकों का प्रभावी और ईमानदार क्रियान्वयन पुलिस की स्वायत्तता, पेशेवर क्षमता तथा लोकतांत्रिक शासन को मजबूत करने के लिए अत्यंत आवश्यक है।
