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Blog / 20 Feb 2026

सबरीमाला निर्णय समीक्षा: लैंगिक समानता बनाम धार्मिक अधिकार

संदर्भ

हाल ही में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 2018 के सबरीमाला फैसले के खिलाफ दायर पुनर्विचार याचिकाओं पर 7 अप्रैल, 2026 को सुनवाई निर्धारित की है। नौ न्यायाधीशों की एक संविधान पीठ इस बात की जांच करेगी कि क्या 2018 के उस फैसले की समीक्षा की जानी चाहिए, जिसने सभी आयु वर्ग की महिलाओं को सबरीमाला मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी थी। यह पीठ लैंगिक समानता और धार्मिक प्रथाओं से संबंधित व्यापक संवैधानिक प्रश्नों पर भी विचार करेगी।

मामले की पृष्ठभूमि

      पारंपरिक प्रथा: मंदिर में ऐतिहासिक रूप से 10-50 वर्ष की आयु की महिलाओं के प्रवेश पर रोक थी, जिसका कारण भगवान अयप्पा का 'नैष्ठिक ब्रह्मचारी' (अविवाहित) स्वरूप बताया गया था।

      केरल उच्च न्यायालय (1991): केरल हाई कोर्ट ने इस प्रतिबंध को रीति-रिवाजों के अनुरूप मानते हुए बरकरार रखा था और अधिकारियों को इसे लागू करने का निर्देश दिया था। 

      सर्वोच्च न्यायालय (2018 का निर्णय): पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने (4:1 बहुमत से) 'केरल हिंदू सार्वजनिक पूजा स्थल (प्रवेश प्राधिकरण) नियम, 1965' के नियम 3(b) को रद्द कर दिया।

       2018 के इस फैसले ने सभी आयु की महिलाओं को सबरीमाला मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी, जिससे पिछला प्रतिबंध हट गया।

      अदालत ने माना कि महिलाओं का बहिष्कार संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 25 का उल्लंघन है।

      न्यायालय ने फैसला सुनाया कि यह प्रतिबंध भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत कोई 'अनिवार्य धार्मिक प्रथा' (Essential Religious Practice) नहीं हैं।

      निर्णय में इस बात पर जोर दिया गया कि समानता और गरिमा के संवैधानिक मूल्य भेदभावपूर्ण प्रथाओं पर लागू होते हैं।

फैसले के बाद के घटनाक्रम:

      तीर्थयात्रा माह के दौरान व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए।

      पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गईं और 2019 में इस मामले को एक बड़ी पीठ (Larger Bench) को भेज दिया गया। 

      2020 में, नौ न्यायाधीशों की पीठ ने 'अनिवार्य धार्मिक प्रथा' (ERP) सिद्धांत से संबंधित व्यापक संवैधानिक प्रश्न तैयार किए।

अनिवार्य धार्मिक प्रथा (ERP) सिद्धांत :

      इस सिद्धांत की शुरुआत शिरूर मठ मामले (1954) में हुई थी। 

      सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि केवल वही प्रथाएं अनुच्छेद 25 और 26 के तहत संरक्षित हैं जो किसी धर्म के लिए अनिवार्य और अभिन्न हैं।

      अदालतें यह निर्धारित करती हैं कि कोई प्रथा अनिवार्य है या नहीं, इसके आधार निम्नलिखित हैं:

           1.धार्मिक ग्रंथ और सिद्धांत

           2.ऐतिहासिक निरंतरता

            3.धर्म के प्रति उसकी केंद्रीयता

'अनिवार्य धार्मिक प्रथा' सिद्धांत की आलोचना:

      यह न्यायपालिका को धर्मशास्त्र (Theology) की व्याख्या करने की भूमिका में डाल देता है।

      यह "अनिवार्य" क्या है, इसे निर्धारित करने में व्यक्तिपरकता  लाता है।

      यह धार्मिक स्वायत्तता और संवैधानिक नैतिकता के बीच तनाव पैदा करता है।

नौ-न्यायाधीशों की पीठ के समक्ष मुख्य मुद्दे:

      अनिवार्य धार्मिक प्रथा सिद्धांत का दायरा और भविष्य।

      व्यक्तिगत मौलिक अधिकारों और सामूहिक धार्मिक अधिकारों के बीच संतुलन।

      धार्मिक रीति-रिवाजों में न्यायिक हस्तक्षेप की सीमा।

निष्कर्ष:

सबरीमाला मामला केवल मंदिर प्रवेश के विषय में नहीं है, यह लैंगिक न्याय, धार्मिक स्वतंत्रता और न्यायिक समीक्षा के बीच सामंजस्य स्थापित करने पर एक व्यापक संवैधानिक बहस का प्रतिनिधित्व करता है। आगामी फैसला 'अनिवार्य धार्मिक प्रथा' सिद्धांत की रूपरेखा को फिर से परिभाषित कर सकता है और भारत में धार्मिक अधिकारों के कानून के भविष्य को आकार दे सकता है, जिससे इस सिद्धांत को मजबूती मिलेगी कि धार्मिक स्वतंत्रता संवैधानिक नैतिकता और समानता के ढांचे के भीतर कार्य करती है।