चर्चा में क्यों?
हाल ही मे दिल्ली उच्च न्यायालय ने लक्षवीर सिंह यादव बनाम भारत संघ (2026) मामले में भारत में भूल जाने के अधिकार (Right to be Forgotten- RTBF) को नियंत्रित करने वाली एक ऐतिहासिक रूपरेखा निर्धारित की। न्यायालय ने कहा कि यह अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 से उत्पन्न होता है तथा यह व्यक्ति के निजता के अधिकार और खुली न्याय प्रणाली (Open Justice) के सिद्धांत के बीच संतुलन स्थापित करता है।
भूल जाने का अधिकार (Right to be Forgotten) क्या है?
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- भूल जाने का अधिकार (RTBF) व्यक्तियों को यह अधिकार प्रदान करता है कि वे अपनी व्यक्तिगत जानकारी को डिजिटल प्लेटफॉर्मों और सर्च इंजनों से हटाने (Removal), मिटाने (Erasure) अथवा खोज परिणामों से अलग करने (De-indexing) का अनुरोध कर सकें, जब उसकी निरंतर ऑनलाइन उपलब्धता से उन्हें असंगत हानि पहुँच रही हो तथा उसका कोई वैध सार्वजनिक हित शेष न रह गया हो।
- यह अधिकार विशेष रूप से आरोपों से बरी (Acquittal) होने, झूठे आरोपों (False Accusations), वैवाहिक विवादों (Matrimonial Disputes) अथवा न्यायिक कार्यवाही में किसी व्यक्ति का केवल आकस्मिक उल्लेख (Incidental Mentions) होने जैसे मामलों में महत्वपूर्ण है।
- भूल जाने का अधिकार (RTBF) व्यक्तियों को यह अधिकार प्रदान करता है कि वे अपनी व्यक्तिगत जानकारी को डिजिटल प्लेटफॉर्मों और सर्च इंजनों से हटाने (Removal), मिटाने (Erasure) अथवा खोज परिणामों से अलग करने (De-indexing) का अनुरोध कर सकें, जब उसकी निरंतर ऑनलाइन उपलब्धता से उन्हें असंगत हानि पहुँच रही हो तथा उसका कोई वैध सार्वजनिक हित शेष न रह गया हो।
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पृष्ठभूमि:
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- इस अवधारणा को वर्ष 2014 में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिली, जब यूरोपीय न्यायालय (European Court of Justice) ने Mario Costeja González के पक्ष में निर्णय देते हुए Google को पुरानी व्यक्तिगत जानकारी से संबंधित लिंक हटाने का निर्देश दिया।
- बाद में इस अधिकार को यूरोपीय संघ के सामान्य डेटा संरक्षण विनियमन (General Data Protection Regulation- GDPR) के अनुच्छेद 17 में विधिक रूप से शामिल किया गया।
- भारत में इसकी संवैधानिक आधारशिला K.S. Puttaswamy बनाम भारत संघ (2017) के निर्णय से रखी गई, जिसमें अनुच्छेद 21 के अंतर्गत सूचनात्मक निजता (Informational Privacy) सहित निजता के अधिकार को एक मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी गई।
- इस अवधारणा को वर्ष 2014 में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिली, जब यूरोपीय न्यायालय (European Court of Justice) ने Mario Costeja González के पक्ष में निर्णय देते हुए Google को पुरानी व्यक्तिगत जानकारी से संबंधित लिंक हटाने का निर्देश दिया।
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दिल्ली उच्च न्यायालय का निर्णय:
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- लक्षवीर सिंह यादव बनाम भारत संघ (2026) मामले में न्यायालय ने कहा कि भूल जाने का अधिकार, अनुच्छेद 21 के अंतर्गत गरिमा और सूचनात्मक निजता के अधिकार का अभिन्न अंग है।
- न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि यह अधिकार निजी डिजिटल प्लेटफॉर्मों और सर्च इंजनों के विरुद्ध भी लागू हो सकता है।
- न्यायालय ने संरचित आनुपातिकता परीक्षण (Structured Proportionality Test) भी प्रस्तुत किया, जिसके अनुसार किसी भी राहत प्रदान करने से पूर्व संबंधित प्राधिकरणों को व्यक्ति की निजता और गरिमा, जनता के जानने के अधिकार, खुली न्याय प्रणाली के सिद्धांत तथा वैध सार्वजनिक हित के बीच संतुलन स्थापित करना होगा।
- न्यायालय ने स्पष्ट किया कि 'भूल जाने का अधिकार' इतिहास को मिटाने या न्यायिक अभिलेखों को समाप्त करने का अधिकार नहीं है। इसका उद्देश्य केवल उन परिस्थितियों में डिजिटल पहुँच को सीमित करना है, जहाँ सूचना का बने रहना किसी वैध सार्वजनिक हित की पूर्ति नहीं करता तथा व्यक्ति की गरिमा और निजता को अनावश्यक रूप से प्रभावित करता है।
- लक्षवीर सिंह यादव बनाम भारत संघ (2026) मामले में न्यायालय ने कहा कि भूल जाने का अधिकार, अनुच्छेद 21 के अंतर्गत गरिमा और सूचनात्मक निजता के अधिकार का अभिन्न अंग है।
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भूल जाने के अधिकार की आवश्यकता:
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- न्यायालय ने कहा कि डिजिटल माध्यमों में जानकारी का स्थायी रूप से उपलब्ध रहना, किसी व्यक्ति के आरोपों से बरी होने अथवा कानूनी कार्यवाही समाप्त होने के काफी समय बाद भी उसकी प्रतिष्ठा को अनुचित रूप से क्षति पहुँचा सकता है।
- झूठे आरोपों के शिकार व्यक्ति, निजी वैवाहिक विवादों में शामिल लोग तथा न्यायालयी मामलों में केवल आकस्मिक रूप से उल्लेखित व्यक्ति, ऑनलाइन खोज योग्य अभिलेखों के कारण लंबे समय तक सामाजिक कलंक का सामना करते रहते हैं।
- भूल जाने का अधिकार (RTBF) ऐसे व्यक्तियों को निरंतर प्रतिष्ठात्मक क्षति से संरक्षण प्रदान करने का प्रयास करता है, साथ ही जहाँ वास्तविक सार्वजनिक हित हो वहाँ पारदर्शिता भी बनाए रखता है।
- न्यायालय ने कहा कि डिजिटल माध्यमों में जानकारी का स्थायी रूप से उपलब्ध रहना, किसी व्यक्ति के आरोपों से बरी होने अथवा कानूनी कार्यवाही समाप्त होने के काफी समय बाद भी उसकी प्रतिष्ठा को अनुचित रूप से क्षति पहुँचा सकता है।
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आगे की राह:
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- सरकार को डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 (Digital Personal Data Protection Act, 2023- DPDP Act) के नियम अधिसूचित कर तथा डेटा संरक्षण बोर्ड (Data Protection Board) की स्थापना करके इस कानून को प्रभावी रूप से लागू करना चाहिए, ताकि डेटा हटाने से संबंधित अनुरोधों का कुशलतापूर्वक निस्तारण किया जा सके।
- डिजिटल प्लेटफॉर्मों, डेटा संरक्षण बोर्ड तथा न्यायिक पुनरावलोकन को सम्मिलित करते हुए बहु-स्तरीय शिकायत निवारण तंत्र (Tiered Grievance Mechanism) त्वरित एवं संतुलित निर्णय सुनिश्चित कर सकता है।
- सर्च इंजनों तथा विधिक डेटाबेसों को भी केवल पुरानी जानकारी बनाए रखने के बजाय, आरोपों से बरी होने अथवा बाद के घटनाक्रमों के अनुरूप अपने अभिलेखों को अद्यतन करना चाहिए।
- निजता और पारदर्शिता के बीच संतुलन स्थापित करने हेतु पूरे देश के लिए एक समान राष्ट्रीय मानक निर्धारित करने में सर्वोच्च न्यायालय का अंतिम निर्णय अत्यंत महत्वपूर्ण होगा।
- सरकार को डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 (Digital Personal Data Protection Act, 2023- DPDP Act) के नियम अधिसूचित कर तथा डेटा संरक्षण बोर्ड (Data Protection Board) की स्थापना करके इस कानून को प्रभावी रूप से लागू करना चाहिए, ताकि डेटा हटाने से संबंधित अनुरोधों का कुशलतापूर्वक निस्तारण किया जा सके।
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निष्कर्ष:
यह निर्णय भारत के निजता संबंधी न्यायशास्त्र (Privacy Jurisprudence) के विकास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। न्यायालय ने यह स्वीकार किया कि व्यक्तियों को पुरानी डिजिटल सूचनाओं के बोझ तले अनिश्चितकाल तक नहीं रहना चाहिए। संपूर्ण जानकारी को हटाने के बजाय आनुपातिकता (Proportionality) पर आधारित संतुलित दृष्टिकोण अपनाकर न्यायालय ने डिजिटल युग में निजता, गरिमा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा खुली न्याय प्रणाली के सिद्धांतों के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास किया है।
