सन्दर्भ:
केंद्र सरकार के पर्यावरण मंत्रालय ने थर्मल पावर प्लांट्स (ताप विद्युत संयंत्रों) के लिए सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂) उत्सर्जन मानकों को पूरा करने हेतु एक नया ढांचा पेश किया है। इस ढांचे में संयंत्रों को उनके स्थान के आधार पर तीन श्रेणियों में बाँटा गया है।
पृष्ठभूमि:
- सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂) कोयले के जलने से निकलने वाली एक हानिकारक गैस है, जो वायु प्रदूषण और द्वितीयक प्रदूषकों के निर्माण में योगदान देती है।
- 2015 में भारत सरकार ने कोयला व लिग्नाइट आधारित पावर प्लांट्स के लिए SO₂ उत्सर्जन मानक तय किए और फ्लू गैस डीसल्फराइजेशन (FGD) सिस्टम लगाने की आवश्यकता बताई।
- लेकिन उच्च लागत और तकनीकी चुनौतियों के कारण इन मानकों को लागू करने की समय-सीमा कई बार बढ़ाई गई।
- अब, जो संयंत्र दिसंबर 2030 से पहले बंद होने वाले हैं, उन्हें एक घोषणा पत्र देने पर इन मानकों से छूट मिल सकती है।
संशोधित ढांचे की प्रमुख बातें:
संयंत्रों का वर्गीकरण:
- श्रेणी A: दिल्ली-एनसीआर या एक मिलियन (10 लाख) से अधिक आबादी वाले शहरों के 10 किमी के दायरे में स्थित संयंत्र। इन्हें दिसंबर 2027 तक SO₂ मानकों का पालन करना होगा।
- श्रेणी B: गंभीर रूप से प्रदूषित क्षेत्रों के 10 किमी के दायरे में स्थित संयंत्र। इनका मूल्यांकन केस-दर-केस आधार पर किया जाएगा।
- श्रेणी C: अन्य सभी संयंत्र। इन्हें SO₂ उत्सर्जन मानकों से पूरी तरह छूट दी गई है, लेकिन इन्हें 31 दिसंबर 2029 तक चिमनी की ऊँचाई से संबंधित मानकों का पालन करना होगा।
छूट की शर्तें:
- जो संयंत्र दिसंबर 2030 से पहले बंद हो रहे हैं, वे घोषणा पत्र देकर मानकों से छूट पा सकते हैं।
- श्रेणी C के संयंत्रों को SO₂ मानकों से छूट है, लेकिन उन्हें चिमनी की ऊँचाई के नियमों का पालन करना होगा।
लागत और प्रभाव:
- पूरे देश में FGD सिस्टम लगाने के लिए अनुमानित लागत: ₹2.54 लाख करोड़।
- यदि कोई संयंत्र 2030 के बाद भी बिना मानकों का पालन किए चलता है, तो उसे ₹0.40 प्रति यूनिट बिजली पर पर्यावरणीय जुर्माना देना होगा।
संशोधन का कारण:
- IIT दिल्ली जैसे वैज्ञानिक संस्थानों के अध्ययन से पता चला कि थर्मल प्लांट के पास के शहरों में SO₂ से बनने वाले सल्फेट का पीएम 2.5 (PM2.5) में केवल 0.96% से 5.21% और पीएम 10 (PM10) में 0.57% से 3.67% योगदान है।
- मंत्रालय का तर्क है कि वर्तमान वायु गुणवत्ता स्तरों पर SO₂ से सार्वजनिक स्वास्थ्य को बड़ा खतरा साबित नहीं हुआ है।
चिंताएं:
- Centre for Science and Environment (CSE) ने इस संशोधन की आलोचना की है। उनका कहना है कि यह स्वच्छ हवा के लक्ष्य को कमजोर करता है, विशेषकर श्रेणी B और C के संयंत्रों के लिए मानकों में ढील देकर।
प्रभाव:
- पर्यावरणीय प्रभाव: स्वच्छ वायु मानकों को हासिल करने में देरी हो सकती है।
- आर्थिक राहत: बिजली उत्पादकों पर वित्तीय दबाव कम होगा और ऊर्जा सुरक्षा बनी रहेगी।
- नीति संतुलन: पर्यावरणीय लक्ष्यों और आर्थिक वास्तविकताओं के बीच संतुलन दर्शाता है।
- भविष्य की चिंता: प्रदूषण नियंत्रण मानकों में ढील को लेकर आलोचना हो सकती है और यह भारत की जलवायु प्रतिबद्धताओं को प्रभावित कर सकता है।
निष्कर्ष:
संशोधित SO₂ ढांचा देश के थर्मल पावर क्षेत्र को आर्थिक और तकनीकी लचीलापन देने का प्रयास है, लेकिन यह भी दिखाता है कि भारत को विकास और पर्यावरणीय स्थिरता के बीच संतुलन बनाना कितना जटिल है। अब यह ज़रूरी है कि स्वास्थ्य प्रभावों और उत्सर्जन आंकड़ों की निगरानी की जाए, ताकि प्रदूषण नियंत्रण के प्रयासों को स्थायी रूप से नज़रअंदाज़ न किया जाए।