रेडिएटिव फोर्सिंग-आधारित अकाउंटिंग' (RFA)
सन्दर्भ:
हाल ही में 'एनवायर्नमेंटल रिसर्च लेटर्स' (Environmental Research Letters) में प्रकाशित एक अध्ययन ने जलवायु नीति के उस पुराने ढांचे पर प्रश्न उठाए हैं, जो सभी ग्रीनहाउस गैसों (GHGs) को एक ही मापदंड से देखता है। अध्ययन में रेडिएटिव फोर्सिंग-आधारित अकाउंटिंग (RFA) नामक एक नए ढांचे का प्रस्ताव दिया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान 'ग्लोबल वार्मिंग पोटेंशियल' (GWP) पद्धति अल्पकालिक गैसों के प्रभाव को सही ढंग से नहीं दर्शाती, जिससे कार्बन बाजारों में विसंगतियां पैदा हो रही हैं। यह अध्ययन इस मूल प्रश्न को उठाता है कि ‘क्या हम जलवायु परिवर्तन को सही तरीके से माप भी रहे हैं?’
वर्तमान पैमाना:
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- दशकों से, जलवायु नीतियों में 'कार्बन डाइऑक्साइड समकक्ष' (CO2e) का उपयोग किया जाता रहा है। इसके लिए 'ग्लोबल वार्मिंग पोटेंशियल' (GWP-100) का प्रयोग होता है, जो 100 वर्षों की अवधि में किसी गैस के वार्मिंग प्रभाव की तुलना 'कार्बन डाइऑक्साइड समकक्ष' (CO2e) से करता है।
- कार्बन डाइऑक्साइड समतुल्य (CO2e) अलग-अलग ग्रीनहाउस गैसों (जैसे मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड) के ग्लोबल वार्मिंग प्रभाव को मापने की एक साझा इकाई (Common Unit) है।
- CO2 वातावरण में सदियों तक बनी रहती है, जबकि मीथेन जैसी गैसें लगभग 12 वर्षों में ही समाप्त हो जाती हैं, लेकिन वे CO2 की तुलना में कहीं अधिक गर्मी सोखती हैं। मीथेन 20 वर्षों में CO₂ की तुलना में लगभग 80 गुना अधिक वार्मिंग प्रभाव डाल सकती है।
- वर्तमान गणना पद्धति अल्पकालिक गैसों के तात्कालिक प्रभाव को कम करके आंकती है। इससे उन परियोजनाओं को कम प्रोत्साहन मिलता है जो वार्मिंग को तुरंत धीमा कर सकती हैं (जैसे मीथेन उत्सर्जन में कटौती)।
- दशकों से, जलवायु नीतियों में 'कार्बन डाइऑक्साइड समकक्ष' (CO2e) का उपयोग किया जाता रहा है। इसके लिए 'ग्लोबल वार्मिंग पोटेंशियल' (GWP-100) का प्रयोग होता है, जो 100 वर्षों की अवधि में किसी गैस के वार्मिंग प्रभाव की तुलना 'कार्बन डाइऑक्साइड समकक्ष' (CO2e) से करता है।
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रेडिएटिव फोर्सिंग बेस्ड एकाउंटिंग (RFA):
नए अध्ययन में एक वैकल्पिक मापन पद्धति रेडिएटिव फोर्सिंग बेस्ड एकाउंटिंग (RFA) का प्रस्ताव किया गया है। RFA एक नई रूपरेखा है जो केवल गैस की मात्रा पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय इस बात को मापती है कि कोई गैस 'वास्तविक समय' (Real-time) में कितनी अतिरिक्त ऊर्जा (गर्मी) पृथ्वी के वायुमंडल में रोक रही है। इसे 'रेडिएटिव फोर्सिंग' कहा जाता है।
RFA के मुख्य लाभ:
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- सटीक मूल्यांकन: यह गैसों के जीवनकाल (Lifetime) और उनकी वार्मिंग तीव्रता के बीच के अंतर को स्पष्ट करता है।
- कार्बन क्रेडिट का सही मूल्य: वर्तमान में, अल्पकालिक गैसों को कम करने वाले प्रोजेक्ट्स को कम कार्बन क्रेडिट मिलते हैं। RFA लागू होने से इन प्रोजेक्ट्स की वैल्यू बढ़ेगी, जिससे मीथेन कटौती जैसे 'क्विक-फिक्स' समाधानों में निवेश बढ़ेगा।
- तापमान लक्ष्य की प्राप्ति: पेरिस समझौते के 1.5°C लक्ष्य को पाने के लिए अल्पकालिक वार्मिंग को तुरंत रोकने की आवश्यकता होगी। RFA नीति निर्माताओं को यह समझने में मदद करता है कि कौन से उत्सर्जन को रोकना सबसे प्रभावी होगा।
- सटीक मूल्यांकन: यह गैसों के जीवनकाल (Lifetime) और उनकी वार्मिंग तीव्रता के बीच के अंतर को स्पष्ट करता है।
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कार्बन बाजारों पर प्रभाव:
कार्बन बाजार 'ऑफसेटिंग' के सिद्धांत पर काम करते हैं। यदि कोई कंपनी 1 टन मीथेन कम करती है, तो उसे मिलने वाले क्रेडिट वर्तमान में CO2 के 100 साल के औसत पर आधारित होते हैं। RFA इस पद्धति को बदल सकता है:
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- इससे उन तकनीकों को बढ़ावा मिलेगा जो अल्पकालिक प्रदूषकों (जैसे- हाइड्रोफ्लोरोकार्बन और मीथेन) पर केंद्रित हैं।
- यह देशों को अपनी 'राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान' (NDC) रणनीतियों को अधिक वैज्ञानिक बनाने में मदद करेगा।
- इससे उन तकनीकों को बढ़ावा मिलेगा जो अल्पकालिक प्रदूषकों (जैसे- हाइड्रोफ्लोरोकार्बन और मीथेन) पर केंद्रित हैं।
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चुनौतियां:
RFA को लागू करना आसान नहीं है। वैश्विक स्तर पर स्वीकृत मानक (GWP-100) को बदलना अंतरराष्ट्रीय वार्ताओं और संधियों में जटिलता पैदा कर सकता है। साथ ही, डेटा संग्रह और गणना के लिए अधिक उन्नत निगरानी प्रणालियों की आवश्यकता होगी।
निष्कर्ष:
जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध लड़ाई में समय सबसे महत्वपूर्ण कारक है। यदि मापन पद्धति वास्तविक प्रभाव को सही ढंग से नहीं दर्शाती, तो नीति-निर्माण भी भ्रामक हो सकता है।
अतः भविष्य की जलवायु रणनीतियों में वैज्ञानिक सटीकता और समय-आधारित प्रभावों को शामिल करना आवश्यक है। RFA जैसे नवाचारी ढांचे न केवल विज्ञान आधारित नीति निर्माण को बढ़ावा देंगे, बल्कि कार्बन बाजारों को अधिक पारदर्शी और प्रभावी बनाएंगे।
