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Blog / 10 Apr 2026

पल्सर आधारित दूरी मापन की नई विधि

पल्सर आधारित दूरी मापन की नई विधि

संदर्भ:

हाल ही में, आईआईटी कानपुर (IIT Kanpur) और नेशनल सेंटर फॉर रेडियो एस्ट्रोफिजिक्स (NCRA), पुणे के खगोलविदों ने एक नई वैज्ञानिक विधि विकसित की है, जिसके माध्यम से पल्सर (Pulsars) के संकेतों का उपयोग करके गहरे अंतरिक्ष में दूरियों को अधिक सटीकता से मापा जा सकता है।

प्रमुख बिंदु:

      • इस नई विधि में पल्सर से आने वाले रेडियो संकेतों (radio signals) के व्यवहार का अध्ययन किया जाता है। जब ये संकेत अंतरिक्ष में मौजूद गैस और प्लाज़्मा से गुजरते हैं, तो उनमें बदलाव (dispersion और scattering) होता है। इन बदलावों का विश्लेषण करके दूरी का अनुमान लगाया जाता है।
      • यह विधि अंतरिक्ष विज्ञान में भारत की बढ़ती क्षमता को दर्शाता है और खगोल भौतिकी (Astrophysics) के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण प्रगति माना जा रहा है। इस तकनीक से आकाशगंगा (Milky Way) के संरचनात्मक अध्ययन में अधिक सटीकता आने की संभावना है।

पल्सर के बारे में:

      • पल्सर अत्यंत घने और तेज़ गति से घूमने वाले न्यूट्रॉन तारे (Neutron Stars) होते हैं, जो नियमित अंतराल पर रेडियो तरंगों के रूप में संकेत भेजते हैं। इन्हें कॉस्मिक लाइटहाउसभी कहा जाता है।
      • इनकी खोज 1967 में हुई थी और तब से यह खगोल विज्ञान में महत्वपूर्ण उपकरण बन चुके हैं, क्योंकि इनका समय (timing) अत्यंत सटीक होता है।

पल्सर की कार्यप्रणाली:

      • पल्सर अपने ध्रुवों से रेडियो तरंगें उत्सर्जित करते हैं।
      • जब ये तरंगें पृथ्वी की दिशा में आती हैं तो नियमित पल्स (pulse) के रूप में दिखाई देती हैं।
      • इनकी घूर्णन गति अत्यंत स्थिर होती है, जिससे ये ब्रह्मांडीय घड़ी (cosmic clock) की तरह काम करते हैं।

नई विधि का वैज्ञानिक आधार:

परंपरागत रूप से अंतरिक्ष की दूरी मापने के लिए फैलाव मापन (Dispersion Measure- DM) का उपयोग किया जाता था, जिसमें संकेतों के समय विलंब का अध्ययन किया जाता है।

नई विधि में दो प्रभावों का संयुक्त उपयोग किया गया है:

      • Dispersion (संकेतों का समय विलंब)
      • Scattering (संकेतों का फैलाव)

इन दोनों को मिलाकर दूरी मापन अधिक सटीक हो जाता है क्योंकि यह अंतरिक्षीय प्लाज़्मा के प्रभावों को भी शामिल करता है।

इस विधि का महत्व:

    • अंतरिक्ष में दूरी मापन, खगोल विज्ञान की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक रहा है। इस विधि के प्रयोग से अत्यंत सटीक दूरी नापी जा सकती है। 

मुख्य पारंपरिक विधियाँ:

      • त्रिकोणमितीय पारलैक्स (Trigonometric Parallax)
      • वर्णक्रमीय विधियाँ (Spectroscopic Methods)
      • प्रकीर्णन-आधारित रेडियो खगोलिकी (Dispersion-based Radio Astronomy)

इन सभी विधियों की सीमाएँ हैं, विशेषकर जब दूरी बहुत अधिक हो। इसलिए पल्सर आधारित विधि एक उन्नत विकल्प प्रदान करती है।

निष्कर्ष:

यह नई विधि न केवल अंतरिक्ष की दूरियों को अधिक सटीक बनाएगी, बल्कि आकाशगंगा की संरचना और विकास को समझने में भी मदद करेगी। हालिया उपलब्धि भारत को वैश्विक खगोल विज्ञान अनुसंधान में एक मजबूत स्थिति प्रदान करती है और यह दर्शाती है कि भारतीय वैज्ञानिक अंतरिक्ष अनुसंधान (ISRO) लगातार नई सीमाएँ (frontiers) छू रहे हैं।