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Blog / 09 Jan 2026

पीएसएलवी-सी62/ईओएस-एन1 मिशन

संदर्भ:

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) 12 जनवरी 2026 को अपने पीएसएलवी-सी62 मिशन के प्रक्षेपण की तैयारी कर रहा है। यह प्रक्षेपण आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र (एसडीएससी) के प्रथम प्रक्षेपण स्थल से किया जाएगा। इस मिशन के अंतर्गत एक उन्नत पृथ्वी अवलोकन उपग्रह ईओएस-एन1 (कोडनेम: अन्वेषा)को अंतरिक्ष में स्थापित किया जाएगा। इसके साथ कई सह-यात्री उपग्रह भी प्रक्षेपित किए जाएंगे। यह मिशन निगरानी तथा अंतरिक्ष सहयोग के क्षेत्रों में भारत की निरंतर सशक्त होती क्षमताओं को और अधिक मज़बूती प्रदान करता है।

प्रक्षेपण यान के बारे में:

      • इस मिशन में पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (पीएसएलवी-सी62) के डीएल विन्यास का उपयोग किया जाएगा, जिसमें दो ठोस स्ट्रैप-ऑन बूस्टर लगाए गए होंगे।
      • यह पीएसएलवी की 64वीं उड़ान होगी, जिसे भारत के अंतरिक्ष प्रक्षेपण बेड़े का सबसे विश्वसनीय और सिद्ध प्रक्षेपण यान माना जाता है।
      • पीएसएलवी का सफल अभियानों का एक दीर्घ इतिहास रहा है, जिसमें चंद्रयान-1, मंगल ऑर्बिटर मिशन जैसे ऐतिहासिक मिशन शामिल हैं। इन अभियानों ने वैश्विक स्तर पर भारत की अंतरिक्ष प्रक्षेपण क्षमता और विश्वसनीयता को सुदृढ़ रूप से स्थापित किया है।

PSLV-C62 / EOS-N1 Mission | Live Launch Coverage

EOS-N1 (अन्वेषा) के बारे में:

      • इस मिशन का मुख्य उपग्रह EOS-N1 है, जिसे अन्वेषा के नाम से भी जाना जाता है। इसे पृथ्वी अवलोकन एवं रणनीतिक उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए विकसित किया गया है।
      • EOS-N1 एक उन्नत हाइपरस्पेक्ट्रल इमेजिंग उपग्रह है, जो सैकड़ों संकीर्ण स्पेक्ट्रल बैंडों में उच्च-रिज़ॉल्यूशन डेटा एकत्र करने में सक्षम है। इसके माध्यम से ऐसे पदार्थों, भू-आकृतिक संरचनाओं और पर्यावरणीय पैटर्न की पहचान संभव होती है, जो पारंपरिक सेंसरों द्वारा सामान्यतः दृश्य नहीं होते।
      • EOS-N1 से प्राप्त डेटा सीमा निगरानी, पर्यावरणीय निगरानी, कृषि आकलन, शहरी नियोजन तथा आपदा प्रबंधन जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में व्यापक रूप से उपयोगी सिद्ध होगा।

सह-यात्री उपग्रह:

      • EOS-N1 के साथ यह मिशन कुल 18 सह-यात्री उपग्रहों को भी अंतरिक्ष में स्थापित करेगा। इनमें भारतीय स्टार्टअप्स, अनुसंधान संस्थानों तथा अंतरराष्ट्रीय भागीदारों द्वारा विकसित उपग्रह शामिल हैं। यह पहल वैश्विक प्रक्षेपण सेवा प्रदाता के रूप में इसरो की भूमिका को और अधिक सुदृढ़ बनाती है।
      • इन सह-यात्री उपग्रहों में तकनीकी क्षमताओं के परीक्षण हेतु विकसित पेलोड भी सम्मिलित हैं, जैसे स्पेन के एक स्टार्टअप द्वारा निर्मित केस्ट्रेल इनिशियल डेमॉन्स्ट्रेटर (केआईडी)। इसके अतिरिक्त, अन्य लघु उपग्रह वैज्ञानिक अनुसंधान और व्यावसायिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए प्रक्षेपित किए जाएंगे।

रणनीतिक महत्व:

      • यह मिशन भारत की दूरसंवेदीकरण तथा अंतरिक्ष निगरानी अवसंरचना को मज़बूत करता है, जो राष्ट्रीय सुरक्षा, सीमावर्ती निगरानी और पर्यावरणीय प्रबंधन जैसे महत्वपूर्ण कार्यों के लिए अत्यंत आवश्यक है।
      • इसके माध्यम से भारत की उन्नत तकनीकी क्षमता, स्वदेशी नवाचार, अंतरराष्ट्रीय सहयोग तथा व्यावसायिक उपग्रह प्रक्षेपण में बढ़ती दक्षता का स्पष्ट प्रदर्शन होता है।

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के बारे में:

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) भारत की राष्ट्रीय अंतरिक्ष एजेंसी है, जिसकी स्थापना वर्ष 1969 में डॉ. विक्रम साराभाई के दूरदर्शी नेतृत्व में की गई थी। यह संगठन अंतरिक्ष विभाग (DoS) के अधीन कार्य करता है, जो सीधे भारत के प्रधानमंत्री को उत्तरदायी है। इसरो का मुख्यालय कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु में स्थित है।

दायित्व और उद्देश्य:

इसरो का प्रमुख उद्देश्य अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी का उपयोग राष्ट्रीय विकास की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए करना तथा अंतरिक्ष विज्ञान और अनुसंधान को निरंतर आगे बढ़ाना है। इसकी प्रमुख गतिविधियों में उपग्रहों का निर्माण, प्रक्षेपण यान प्रौद्योगिकी का विकास, विभिन्न अंतरिक्ष अनुप्रयोगों का विस्तार तथा ग्रहों और अंतरिक्ष का अन्वेषण शामिल है।

प्रमुख उपलब्धियाँ:

आर्यभट्ट (1975): भारत का पहला उपग्रह
• PSLV: विश्वसनीय और किफायती प्रक्षेपण यान
• GSLV और LVM3: भारी भार उठाने की क्षमता
चंद्रयान-3 (2023): चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास पहली सफल सॉफ्ट लैंडिंग
मंगल ऑर्बिटर मिशन (2014): पहले ही प्रयास में सफलता
आदित्य-एल1: भारत का पहला सौर मिशन

निष्कर्ष:

12 जनवरी 2026 को प्रस्तावित पीएसएलवी-सी62 / ईओएस-एन1 मिशन भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि का प्रतीक है। यह मिशन पृथ्वी अवलोकन क्षमताओं के सुदृढ़ीकरण, अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी में नवाचार तथा वैश्विक सहयोग के प्रति इसरो की निरंतर प्रतिबद्धता को स्पष्ट रूप से दर्शाता है। साथ ही, यह वैज्ञानिक, रणनीतिक एवं व्यावसायिक उद्देश्यों का समन्वय करते हुए भारत के सशक्त, आत्मनिर्भर और जीवंत अंतरिक्ष पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माण की दिशा में एक और ठोस एवं निर्णायक कदम सिद्ध होता है।