चर्चा में क्यों?
हाल ही में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो ने इंडोनेशिया के योग्याकार्ता (Yogyakarta) स्थित प्रम्बानन मंदिर परिसर के संरक्षण एवं पुनर्स्थापन (Conservation and Restoration) के लिए एक अंतरराष्ट्रीय परियोजना का संयुक्त शुभारंभ किया। यह पहल भारत और इंडोनेशिया के बीच मजबूत सभ्यतागत संबंधों को प्रतिबिंबित करती है तथा साझा सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण में दोनों देशों के सहयोग को रेखांकित करती है।
प्रम्बानन मंदिर के बारे में:
प्रम्बानन, जिसे स्थानीय रूप से रोरो जोंग्रांग (Roro Jonggrang / Loro Jonggrang) के नाम से जाना जाता है, इंडोनेशिया का सबसे बड़ा हिंदू मंदिर परिसर तथा दक्षिण-पूर्व एशिया में हिंदू स्थापत्य कला के सबसे भव्य उदाहरणों में से एक है। यह शैव मंदिर वास्तुकला की उत्कृष्टता का प्रतिनिधित्व करता है तथा इस क्षेत्र में भारतीय संस्कृति, धर्म और कला के प्रभाव को प्रदर्शित करता है।
स्थान:
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- इंडोनेशिया के जावा द्वीप (Java Island) के उपजाऊ ज्वालामुखीय मैदानों में स्थित है।
- यह योग्याकार्ता विशेष क्षेत्र (Special Region of Yogyakarta) और मध्य जावा (Central Java) की सीमा पर स्थित है।
- यह प्रसिद्ध बोरोबुदुर बौद्ध मंदिर (Borobudur Buddhist Temple) के निकट स्थित है।
- इंडोनेशिया के जावा द्वीप (Java Island) के उपजाऊ ज्वालामुखीय मैदानों में स्थित है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:
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- प्रम्बानन मंदिर का निर्माण लगभग 850 ईस्वी में संजय वंश (Sanjaya Dynasty) के शासनकाल में हुआ था, जिसने जावा में शैव हिंदू धर्म के पुनरुत्थान का प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व किया।
- इसका निर्माण एक भव्य राजकीय मंदिर के रूप में किया गया था और माना जाता है कि इसे निकटवर्ती बोरोबुदुर स्मारक के उत्तरस्वरूप निर्मित किया गया था।
- 11वीं शताब्दी में राजनीतिक परिवर्तनों, भूकंपों तथा मेरापी पर्वत (Mount Merapi) के ज्वालामुखीय विस्फोटों के कारण यह मंदिर परित्यक्त हो गया।
- 19वीं शताब्दी के प्रारंभ में जावा पर ब्रिटिश प्रशासन के दौरान इसकी पुनः खोज की गई। वर्ष 1918 में इसका वैज्ञानिक संरक्षण एवं पुनर्स्थापन कार्य प्रारंभ हुआ तथा 1991 में यूनेस्को (UNESCO) ने इसे विश्व धरोहर स्थल (World Heritage Site) घोषित किया।
- प्रम्बानन मंदिर का निर्माण लगभग 850 ईस्वी में संजय वंश (Sanjaya Dynasty) के शासनकाल में हुआ था, जिसने जावा में शैव हिंदू धर्म के पुनरुत्थान का प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व किया।
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स्थापत्य विशेषताएँ:
प्रम्बानन मंदिर परिसर तीन स्तरों वाले संकेंद्रित वर्गाकार (Three-tier Concentric Square) विन्यास पर आधारित है, जो विभिन्न आध्यात्मिक लोकों का प्रतीक है।
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- बाहरी क्षेत्र (Outer Zone): विशाल प्रांगण, जहाँ पहले लकड़ी की संरचनाएँ स्थित थीं।
- मध्य क्षेत्र (Middle Zone): यहाँ मूल रूप से 224 परवारा (Perwara) अथवा संरक्षक मंदिर सममित रूप से निर्मित थे।
- आंतरिक क्षेत्र (Inner Zone): इसमें 16 प्रमुख मंदिर स्थित हैं, जिनमें प्रसिद्ध त्रिमूर्ति मंदिर (Trimurti Temples) शामिल हैं।
- बाहरी क्षेत्र (Outer Zone): विशाल प्रांगण, जहाँ पहले लकड़ी की संरचनाएँ स्थित थीं।
- परिसर का 47 मीटर ऊँचा शिव मंदिर इसकी सबसे ऊँची संरचना है, जिसके दोनों ओर ब्रह्मा और विष्णु को समर्पित मंदिर स्थित हैं।
- इनके सामने वाहन मंदिर (Vahana Temples) स्थित हैं, जो क्रमशः नंदी (बैल), हंस (Hamsa) तथा गरुड़ (Garuda) को समर्पित हैं।
- मंदिर की दीवारों पर रामायण तथा भागवत पुराण के अत्यंत सुंदर उत्कीर्ण शिल्प (Reliefs) अंकित हैं।
- इसका निर्माण बिना गारे (Mortar) के सूखी इंटरलॉकिंग पत्थर चिनाई (Dry Interlocking Stone Masonry) तकनीक से किया गया है, जो प्राचीन भारतीय एवं जावाई अभियंत्रण कौशल की उन्नत तकनीक को दर्शाता है।
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महत्त्व:
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- प्रम्बानन मंदिर दक्षिण-पूर्व एशिया में हिंदू धर्म तथा भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं के प्रसार का एक महत्वपूर्ण प्रतीक है।
- यह भारत और इंडोनेशिया के बीच सदियों से चले आ रहे समुद्री व्यापार, सांस्कृतिक आदान-प्रदान तथा धार्मिक संपर्कों को प्रतिबिंबित करता है।
- प्रम्बानन संरक्षण परियोजना सांस्कृतिक कूटनीति, विरासत संरक्षण, पुरातात्त्विक सहयोग तथा जन-से-जन (People-to-People) संबंधों को सुदृढ़ करेगी। साथ ही, यह भारत की 'एक्ट ईस्ट नीति (Act East Policy)' तथा आसियान (ASEAN) के साथ उसके व्यापक सहयोग को भी मजबूती प्रदान करेगी।
- प्रम्बानन मंदिर दक्षिण-पूर्व एशिया में हिंदू धर्म तथा भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं के प्रसार का एक महत्वपूर्ण प्रतीक है।
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