भारत में जनहित याचिका (PIL) का दुरुपयोग
संदर्भ:
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट की नौ-न्यायाधीशों की पीठ ने सबरीमाला पुनर्विचार याचिकाओं की सुनवाई के दौरान जनहित याचिका (PIL) के दुरुपयोग को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की। न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना ने टिप्पणी की कि PIL एक समय सामाजिक न्याय का साधन थी, लेकिन अब यह ‘निजी’, ‘प्रचार’, ‘राजनीतिक’ और यहां तक कि ‘पैसा’ (धन) हित याचिका में बदलती जा रही है।
PIL का ऐतिहासिक विकास:
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- PIL की अवधारणा 1970 के दशक के अंत और 1980 के दशक की शुरुआत में न्यायमूर्ति पी.एन. भगवती और न्यायमूर्ति वी.आर. कृष्ण अय्यर द्वारा एक क्रांतिकारी उपकरण के रूप में की गई थी। इसका मुख्य उद्देश्य उन वंचित वर्गों को “न्याय तक पहुंच” प्रदान करना था, जो स्वयं अदालत तक नहीं पहुंच सकते थे।
- पारंपरिक locus standi के नियम—जिसमें याचिकाकर्ता का सीधे प्रभावित होना आवश्यक होता है—को शिथिल करते हुए अदालत ने किसी भी जनहितैषी नागरिक को वंचित लोगों की ओर से याचिका दायर करने की अनुमति दी। हुसैनारा खातून (1979) और एस.पी. गुप्ता (1981) जैसे महत्वपूर्ण मामलों ने इस “न्यायिक सक्रियता” (judicial activism) को मजबूत आधार प्रदान किया।
- PIL की अवधारणा 1970 के दशक के अंत और 1980 के दशक की शुरुआत में न्यायमूर्ति पी.एन. भगवती और न्यायमूर्ति वी.आर. कृष्ण अय्यर द्वारा एक क्रांतिकारी उपकरण के रूप में की गई थी। इसका मुख्य उद्देश्य उन वंचित वर्गों को “न्याय तक पहुंच” प्रदान करना था, जो स्वयं अदालत तक नहीं पहुंच सकते थे।
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वर्तमान विवाद:
यह बहस सबरीमाला पुनर्विचार मामले के दौरान फिर से सामने आई, जहां केंद्र सरकार और पीठ ने Indian Young Lawyers Association के locus standi पर सवाल उठाया। इस गैर-सरकारी संगठन (NGO) ने मूल रूप से 10–50 वर्ष की महिलाओं के मंदिर में प्रवेश पर लगे प्रतिबंध को चुनौती दी थी।
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- पीठ की चिंता: मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने प्रश्न उठाया कि इस NGO का मंदिर की परंपराओं में क्या “हित” है, और याचिका को संभावित रूप से एक वास्तविक जनहित याचिका के बजाय “अनावश्यक हस्तक्षेप” (meddling) बताया।
- ‘पैसा/प्रचार’ कारक: न्यायालय ने यह भी कहा कि अब कई PIL अखबारों की खबरों या व्यक्तिगत एजेंडा से प्रेरित होती हैं, न कि वास्तविक जनहित या सार्वजनिक पीड़ा से, जिससे न्यायालय का समय व्यर्थ होता है।
- पीठ की चिंता: मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने प्रश्न उठाया कि इस NGO का मंदिर की परंपराओं में क्या “हित” है, और याचिका को संभावित रूप से एक वास्तविक जनहित याचिका के बजाय “अनावश्यक हस्तक्षेप” (meddling) बताया।
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आधुनिक PIL से जुड़ी प्रमुख समस्याएँ:
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- अनावश्यक कानूनी कार्रवाई: “पब्लिसिटी इंटरेस्ट लिटिगेशन” अक्सर मीडिया का ध्यान आकर्षित करने या राजनीतिक बदले के लिए दायर की जाती हैं।
- न्यायिक अतिक्रमण: PIL का अत्यधिक उपयोग न्यायपालिका को कार्यपालिका के कार्य करने की ओर ले जा सकता है, जिससे शक्तियों के पृथक्करण (Separation of Powers) की सीमाएँ धुंधली हो जाती हैं।
- मामलों का लंबित बोझ: कई याचिकाएँ न्यायालय का समय नष्ट करती हैं और आपराधिक न्याय जैसे महत्वपूर्ण मामलों (जैसे suo motu कार्यवाही) से ध्यान भटका देती हैं।
- अनावश्यक कानूनी कार्रवाई: “पब्लिसिटी इंटरेस्ट लिटिगेशन” अक्सर मीडिया का ध्यान आकर्षित करने या राजनीतिक बदले के लिए दायर की जाती हैं।
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निष्कर्ष:
यद्यपि PIL सामाजिक परिवर्तन के लिए एक “अद्वितीय तंत्र” बनी हुई है, सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणियाँ इसके प्रति सख्त जांच (scrutiny) की दिशा में बदलाव का संकेत देती हैं। केंद्र सरकार के सुझाव के अनुसार, PIL व्यवस्था को पुनः संतुलित (recalibrate) करने की आवश्यकता है, ताकि यह कमजोर वर्गों की रक्षा का साधन बनी रहे, न कि अनावश्यक हस्तक्षेप करने वालों का हथियार।

