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Blog / 22 Sep 2026

बहुपक्षवाद के लिए साझेदार (P4M) पहल

संदर्भ:

हाल ही में, 21 सितंबर, 2026 को न्यूयॉर्क में आयोजित संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) की बैठक से हटकर P4M शिखर सम्मेलन में बहुपक्षवाद के लिए साझेदार (Partners for Multilateralism – P4M) पहल को आधिकारिक रूप से शुरू किया गया। यह मध्य शक्तियों (Middle Powers) और गैर-महाशक्ति देशों का एक गठबंधन है, जिसका उद्देश्य बहुपक्षीय व्यवस्था को मजबूत और सुधारना है।

P4M क्या है?

P4M को एक लचीले और गैर-नौकरशाही कूटनीतिक गठबंधन के रूप में देखा गया है, जिसका उद्देश्य कठोर भू-राजनीतिक गुटों से बाहर रहकर देशों के बीच सहयोग को बढ़ावा देना है।

इसकी केंद्रीय विचारधारा निम्नलिखित को बढ़ावा देना है:

      • विखंडन के बजाय सहयोग
      • शक्ति की राजनीति के बजाय अंतरराष्ट्रीय कानून
      • एकतरफावाद के बजाय बहुपक्षवाद

प्रमुख उद्देश्य:

      • अंतरराष्ट्रीय कानून को मजबूत करना: इस पहल का उद्देश्य बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव, ध्रुवीकरण और वैश्विक विखंडन के बीच वैश्विक मामलों में अंतरराष्ट्रीय कानून और नियम-आधारित सहयोग की भूमिका को मजबूत करना है।
      • बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार: P4M का उद्देश्य द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को समाप्त करना नहीं है। इसके बजाय, यह संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं में सुधार करना चाहता है, ताकि वे:
        • अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण हों
        • अधिक वैध हों
        • अधिक प्रभावी हों
        • वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों के अनुरूप हों
      • वैश्विक चुनौतियों का समाधान: यह गठबंधन उभरती हुई सीमा-पार चुनौतियों से निपटने के लिए व्यावहारिक सहयोग को बढ़ावा देना चाहता है, विशेष रूप से:
        • कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI)
        • जलवायु परिवर्तन
        • स्वास्थ्य सुरक्षा
        • डिजिटल परिवर्तन
      • संस्थापक और भाग लेने वाले नेता: इस पहल को मध्य शक्तियों की आवाज को मजबूत करने वाले एक मंच के रूप में बढ़ावा दिया गया है।
        • इसके प्रमुख नेतृत्व में शामिल हैं:
          • एंटोनियो कोस्टायूरोपीय परिषद के अध्यक्ष
          • लुइज़ इनासियो लूला दा सिल्वाब्राजील के राष्ट्रपति
          • विलियम रूटोकेन्या के राष्ट्रपति
          • मार्क कार्नीकनाडा के प्रधानमंत्री
        • इस पहल से जुड़े अन्य नेताओं में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी शामिल हैं, जिनका प्रतिनिधित्व शिखर सम्मेलन में विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने किया। इसके अलावा ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज़ और बारबाडोस की प्रधानमंत्री मिया मोटली भी इससे जुड़ी हैं।

रणनीतिक महत्त्व:

      • मध्य शक्तियों की आवाज: P4M मध्य शक्तियों की उस बढ़ती इच्छा को दर्शाता है, जिसके तहत वे वैश्विक निर्णय-निर्माण में अधिक प्रभाव चाहती हैं और स्वयं को बड़ी शक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा तक सीमित नहीं रखना चाहतीं।
      • वैश्विक शासन में सुधार: यह पहल इस चिंता को रेखांकित करती है कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनाई गई संस्थाएँ आज की आर्थिक, जनसांख्यिकीय और भू-राजनीतिक वास्तविकताओं को पूरी तरह प्रतिबिंबित नहीं करती हैं।
      • वैश्विक दक्षिण और विकासशील देश: अधिक प्रतिनिधित्व और संस्थागत सुधार से वैश्विक शासन में विकासशील देशों की भागीदारी को मजबूत किया जा सकता है।
      • हिंद-प्रशांत क्षेत्र के लिए महत्त्व: भारत के लिए यह पहल रणनीतिक स्वायत्तता, बहुपक्षवाद, अंतरराष्ट्रीय कानून और वैश्विक संस्थाओं में सुधार पर उसके व्यापक जोर के अनुरूप है।

चुनौतियाँ:

      • भाग लेने वाले देशों के बीच राष्ट्रीय हितों में अंतर।
      • साझा सिद्धांतों को समन्वित कार्रवाई में बदलने में कठिनाई।
      • मौजूदा भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता और महाशक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा।
      • मौजूदा बहुपक्षीय मंचों के साथ दोहराव से बचने की आवश्यकता।

निष्कर्ष:

P4M पहल संस्थाओं को समाप्त करने के बजाय उनमें सुधार के माध्यम से नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को मजबूत करने का मध्य शक्तियों का एक प्रयास है। इसकी प्रभावशीलता इस बात पर निर्भर करेगी कि विविध हितों वाले देश साझा सिद्धांतों को दीर्घकालिक सामूहिक कार्रवाई में किस हद तक बदल पाते हैं।

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