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Blog / 29 Nov 2025

एक राष्ट्र, एक चुनाव (ONOE)

संदर्भ:

हाल ही में 23वें विधि आयोग (Law Commission) ने संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के समक्ष यह स्पष्ट किया कि एक राष्ट्र, एक चुनाव (ONOE) से जुड़े विधेयक संविधान की मूल संरचना का उल्लंघन नहीं करते। विशेष रूप से, यह विधेयक न तो संघीय ढांचे (Federalism) को प्रभावित करते हैं और न ही मतदाता के अधिकार को।

पृष्ठभूमि:

    • दिसंबर 2024 में सरकार ने दो विधेयक संविधान (एक सौ उनतीसवां संशोधन) विधेयक, 2024 और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2024” पेश किए। इन दोनों को संयुक्त रूप से राष्ट्र, एक चुनाव (ONOE) विधेयक कहा जाता है।
    • इनका उद्देश्य लोकसभा तथा राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों की विधानसभाओं के चुनावों को एक समान चुनाव चक्र में समन्वित करना है, ताकि चुनाव एक साथ आयोजित किए जा सकें।
    • इन विधेयकों की समीक्षा के लिए संसद ने सांसद पी. पी. चौधरी की अध्यक्षता में एक संयुक्त संसदीय समिति (JPC) का गठन किया।

One Nation, One Election (ONOE)

विधि आयोग के प्रमुख मत और कानूनी आधार:

1.      संवैधानिक वैधता मूल संरचना सिद्धांत:

·        विधि आयोग का कहना है कि चुनावों को एक साथ कराना केवल चुनावों के समय और अवधि को प्रभावित करता है; इससे मत देने के अधिकार या जन प्रतिनिधित्व पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता। इसलिए एक राष्ट्र, एक चुनाव संविधान की मूल संरचनाका उल्लंघन नहीं करता।

·        इसी आधार पर आयोग का मत है कि इस संशोधन के लिए राज्यों से अनुमोदन (Ratification) आवश्यक नहीं है, क्योंकि यह संविधान के अनुच्छेद 368(2)(a)–(e) में वर्णित विषयों को प्रभावित नहीं करता।

2.     विधिक और व्यावहारिक लचीलापन:

·        विधि आयोग के अनुसार, लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की 5 वर्ष की अवधि (अनुच्छेद 83 और 172) पूर्णतः कठोर या अपरिवर्तनीय नहीं है। संविधान में ही सदनों के समय से पहले विघटन तथा आपातकाल की स्थिति में अवधि बढ़ाने जैसी व्यवस्थाएँ पहले से मौजूद हैं।
इसलिए संवैधानिक संशोधन के माध्यम से चुनाव कार्यक्रम (इलेक्टोरल कैलेंडर) में परिवर्तन करना कानूनी रूप से पूरी तरह संभव है।

JPC के समक्ष प्रस्तुत अपने विवरण में विधि आयोग के पैनल ने कहा कि चुनावों की आवृत्ति कम होने से समय एवं सार्वजनिक संसाधनों की बचत, शासन व्यवस्था में स्थिरता और नीतिगत निरंतरता जैसे लाभ इतने महत्त्वपूर्ण हैं कि चुनाव चक्र के समन्वय हेतु आवश्यक प्रशासनिक व विधिक समायोजन अपेक्षाकृत कम चुनौतीपूर्ण प्रतीत होते हैं।

एक साथ चुनाव (Simultaneous Elections) के बारे में:

    • एक साथ चुनाव अर्थात एक राष्ट्र, एक चुनाव (ONOE) एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें लोकसभा तथा सभी राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक ही चुनावी चक्र में संपन्न किए जाते हैं।
    • इसका अर्थ यह नहीं है कि पूरे देश में एक ही दिन मतदान हो, चुनाव वर्तमान की तरह विभिन्न चरणों में भी आयोजित किए जा सकते हैं, परंतु सभी विधानसभाओं और लोकसभा का कार्यकाल एक साथ समाप्त होगा तथा नए जनप्रतिनिधियों का चुनाव भी समान अवधि में होगा।

ऐतिहासिक संदर्भ:

·        भारत के पहले चार आम चुनाव चक्रों “1952, 1957, 1962 और 1967 में लोकसभा और सभी राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ आयोजित किए जाते थे।

o   1967 के बाद यह समन्वय निम्न कारणों से टूट गया:

§  लोकसभा का समय से पहले विघटन,

§  राज्य सरकारों का निरंतर अस्थिर होना

§  विभिन्न राज्यों में राष्ट्रपति शासन (President’s Rule) लागू होना।

·        इन परिस्थितियों के चलते अलग-अलग राज्यों एवं केंद्र में चुनावों का समय असंगत हो गया और परिणामस्वरूप भारत में वर्तमान चरणबद्ध एवं असमकालीन चुनाव प्रणाली विकसित हो गई।

संविधान में ज़रूरी संशोधन:

·        अनुच्छेद 83 और 172 — लोकसभा व राज्यों की अवधि

·        अनुच्छेद 85 और 174 — सदन भंग करने की शक्तियाँ

·        दसवीं अनुसूची दल-बदल कानून में समायोजन

ऐसे प्रावधान जिनसे एक बार के लिए सभी सदनों की अवधि बढ़ाई या घटाई जा सके, ताकि चुनाव एक साथ हो सकें।

एक राष्ट्र, एक चुनाव प्रस्ताव का तर्क:

·        शासन कुशलता: बार-बार चुनाव से आदर्श आचार संहिता लगती है और विकास कार्य रुक जाते हैं। एक राष्ट्र, एक चुनाव से यह समस्या कम होगी।

·        खर्च में कमी: हर चुनाव में भारी आर्थिक और मानव संसाधन की आवश्यकता होती है। एक साथ चुनाव से खर्च काफी घटेगा।

·        नीति निरंतरता: सरकारें लगातार चुनावी स्थिति में रहने के अतिरिक्त लंबी अवधि की नीतियों पर ध्यान दे पाएँगी।

·        राजनीतिक ध्रुवीकरण में कमी: लगातार चुनावों से ज़्यादा ध्रुवीकरण और लोकलुभावन राजनीति बढ़ती है। एक राष्ट्र, एक चुनाव स्थिर और दीर्घकालिक नीति-बहस को बढ़ावा दे सकता है।

चिंताएँ और आलोचनाएँ:

1.      संघवाद संबंधी चिंताएँ:

·        विरोधियों का तर्क है कि एक राष्ट्र, एक चुनाव से:

o   राज्यों की विधायी स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है।

o   राज्यों के स्वतंत्र चुनावी चक्र का अधिकार समाप्त हो सकता है।

o   सहकारी संघवाद की भावना कमजोर पड़ सकती है।

2.     व्यावहारिक चुनौतियाँ

·        यदि गठबंधन सरकारें अपने कार्यकाल से पहले अस्थिर हो जाएँ, तो चुनावी समन्वय बनाए रखना कठिन हो जाएगा।

·        हर स्थिति में वैकल्पिक सरकार बन पाना संभव नहीं होगा, जिससे राष्ट्रपति शासन लागू होने की आवृत्ति बढ़ सकती है।

3.     कार्यपालिका के केंद्रीकरण का खतरा

·        एक साथ चुनाव में राष्ट्रीय मुद्दे स्थानीय और क्षेत्रीय मुद्दों को पीछे धकेल सकते हैं।

·        इससे क्षेत्रीय दलों की राजनीतिक भूमिका कमजोर पड़ने और राष्ट्रीय दलों के वर्चस्व बढ़ने की आशंका है।

4.    शुरुआती आर्थिक और लॉजिस्टिक दबाव

·        EVM और VVPAT मशीनों की बड़े पैमाने पर खरीद,

·        सुरक्षा बलों और चुनाव कर्मियों की व्यापक तैनाती,

·        प्रशासनिक तैयारियों का भारी बोझ