संदर्भ:
हाल ही में, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की उस मांग पर अपना आदेश सुरक्षित रख लिया है, जिसमें ओबीसी क्रीमी लेयर के निर्धारण से संबंधित मार्च 2026 के फैसले को लागू करने के लिए दो साल का समय मांगा गया है। केंद्र ने कहा है कि मौजूदा और चल रही भर्ती, नियुक्ति, कैडर आवंटन और वरिष्ठता की प्रक्रियाओं में व्यवधान न हो, इसके लिए फैसले को लागू करने हेतु समय आवश्यक है।
पृष्ठभूमि:
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- यह मामला अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) में क्रीमी लेयर के निर्धारण से संबंधित है। सुप्रीम कोर्ट ने भारत संघ बनाम रोहित नाथन मामले में यह विचार किया कि क्या सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम (PSU) और निजी क्षेत्र में कार्यरत माता-पिता का वेतन या आय अपने आप में यह तय करने का आधार हो सकती है कि उनके बच्चों को OBC आरक्षण का लाभ दिया जाए या नहीं।
- कोर्ट ने कहा कि केवल माता-पिता की वेतन आय को एकमात्र आधार नहीं बनाया जा सकता। माता-पिता के पद की स्थिति और श्रेणी के साथ-साथ लागू आय/संपत्ति संबंधी मानदंडों को भी मौजूदा व्यवस्था के तहत ध्यान में रखा जाना चाहिए।
- यह मामला अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) में क्रीमी लेयर के निर्धारण से संबंधित है। सुप्रीम कोर्ट ने भारत संघ बनाम रोहित नाथन मामले में यह विचार किया कि क्या सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम (PSU) और निजी क्षेत्र में कार्यरत माता-पिता का वेतन या आय अपने आप में यह तय करने का आधार हो सकती है कि उनके बच्चों को OBC आरक्षण का लाभ दिया जाए या नहीं।
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1993 का कार्यालय ज्ञापन और 2004 का स्पष्टीकरण:
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- 1993 के कार्यालय ज्ञापन (Office Memorandum) के तहत क्रीमी लेयर निर्धारित करने के लिए आय/संपत्ति संबंधी परीक्षण में माता-पिता की वेतन आय और कृषि आय को बाहर रखा गया था।
- हालांकि, 2004 के DoPT स्पष्टीकरण में PSU, बैंकों और निजी कंपनियों में कार्यरत माता-पिता के वेतन को शामिल किया गया, जबकि समान स्तर के पदों पर कार्यरत सरकारी कर्मचारियों के साथ अलग व्यवहार किया गया। इसके परिणामस्वरूप, समान स्थिति वाले उम्मीदवारों के साथ उनके माता-पिता के रोजगार क्षेत्र के आधार पर अलग-अलग व्यवहार होने लगा।
- सुप्रीम कोर्ट ने माना कि पदों की उचित समानता स्थापित किए बिना ऐसा अलग-अलग व्यवहार ‘शत्रुतापूर्ण भेदभाव’ (Hostile Discrimination) की स्थिति पैदा कर सकता है।
- 1993 के कार्यालय ज्ञापन (Office Memorandum) के तहत क्रीमी लेयर निर्धारित करने के लिए आय/संपत्ति संबंधी परीक्षण में माता-पिता की वेतन आय और कृषि आय को बाहर रखा गया था।
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केंद्र की मांग क्या है?
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- केंद्र ने फैसले को पूरी तरह लागू करने से पहले दो साल की संक्रमण अवधि की मांग की है। सरकार का तर्क है कि तत्काल प्रभाव से फैसला लागू करने पर पहले से चयनित या नियुक्त उम्मीदवार प्रभावित हो सकते हैं और भर्ती, कैडर आवंटन तथा वरिष्ठता को लेकर अनिश्चितता पैदा हो सकती है।
- सरकार को सरकारी सेवाओं, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSUs) और निजी क्षेत्र में समान या तुलनीय पदों की पहचान करने के लिए पद-समानता (equivalence) का व्यापक अध्ययन करने के लिए भी समय चाहिए।
- इसलिए केंद्र ने फैसले को भविष्य में लागू (prospective operation) करने तथा हितधारकों से परामर्श और पदों की समानता निर्धारित करने के लिए एक उपयुक्त एवं समान नीति तैयार करने हेतु दो साल का समय मांगा है।
- केंद्र ने फैसले को पूरी तरह लागू करने से पहले दो साल की संक्रमण अवधि की मांग की है। सरकार का तर्क है कि तत्काल प्रभाव से फैसला लागू करने पर पहले से चयनित या नियुक्त उम्मीदवार प्रभावित हो सकते हैं और भर्ती, कैडर आवंटन तथा वरिष्ठता को लेकर अनिश्चितता पैदा हो सकती है।
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संवैधानिक महत्व:
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- यह मुद्दा संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 16 से जुड़ा हुआ है, जो क्रमशः समानता तथा सकारात्मक भेदभाव/आरक्षण से संबंधित प्रावधानों को आधार प्रदान करते हैं।
- क्रीमी लेयर की अवधारणा सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक इंद्रा साहनी फैसले (1992) से विकसित हुई। इसका उद्देश्य पिछड़े वर्गों के अपेक्षाकृत उन्नत वर्गों को आरक्षण के लाभ पर अत्यधिक कब्जा करने से रोकना है, ताकि आरक्षण का लाभ वास्तव में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों तक पहुंच सके।
- वर्तमान मामला वास्तविक/सार्थक समानता (Substantive Equality) से जुड़े एक महत्वपूर्ण प्रश्न को उठाता है, क्या समान परिस्थितियों वाले व्यक्तियों के साथ केवल इसलिए अलग व्यवहार किया जाना चाहिए क्योंकि उनके माता-पिता अलग-अलग क्षेत्रों में कार्यरत हैं?
- यह मुद्दा संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 16 से जुड़ा हुआ है, जो क्रमशः समानता तथा सकारात्मक भेदभाव/आरक्षण से संबंधित प्रावधानों को आधार प्रदान करते हैं।
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आगे की राह:
सरकार को पदों की समानता निर्धारित करने के लिए स्पष्ट, वस्तुनिष्ठ और पारदर्शी मानदंड विकसित करने चाहिए। विश्वसनीय सामाजिक-आर्थिक आंकड़ों के आधार पर समय-समय पर समीक्षा करने से क्रीमी लेयर की व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है। साथ ही, संक्रमणकालीन व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिससे पहले से चल रही भर्ती प्रक्रियाओं और उनसे जुड़े उम्मीदवारों पर न्यूनतम प्रभाव पड़े।
