संदर्भ:
हाल ही में भारत सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय को सूचित किया कि यदि वन अधिकार अधिनियम, 2006 के तहत व्यक्तिगत वन अधिकार (IFR) विधिवत रूप से मान्यता प्राप्त हो चुके हैं, तो वन भूमि पर प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण (पीएमएवाई-जी) के अंतर्गत आवास निर्माण के लिए वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 (FCA) के तहत पूर्व स्वीकृति आवश्यक नहीं है। यह सूचना वन संरक्षण कानूनों और आदिवासी कल्याणकारी योजनाओं के बीच समन्वय स्पष्ट करने के उद्देश्य से दी गई है।
मामले की पृष्ठभूमि:
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- यह विवाद मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले के बिनेगा गाँव में एक विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTG) के लिए पीएमएवाई-जी के अंतर्गत मकान निर्माण से जुड़ा है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने माना था कि वन भूमि के उपयोग के लिए केंद्र सरकार की पूर्व स्वीकृति नहीं ली गई, जो वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 का उल्लंघन है। इसके बाद यह मामला सिविल अपील और अवमानना याचिका के माध्यम से सर्वोच्च न्यायालय पहुँचा।
- 23 सितंबर 2025 के अपने आदेश में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यद्यपि वन अधिकार अधिनियम (FRA) राज्य को वनवासियों को कुछ बुनियादी सुविधाएँ प्रदान करने का अधिकार देता है, भले ही वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 लागू हो, किंतु यह छूट मुख्यतः सरकारी कार्यों तक सीमित है। यह स्वतः ही किसी तीसरे पक्ष द्वारा किए जाने वाले स्थायी (पक्के) मकान निर्माण पर लागू नहीं होती।
- सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वन अधिकार अधिनियम (FRA) और वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 (FCA) के बीच बेहतर समन्वय के लिए एक स्पष्ट नीति-ढाँचा तैयार किया जाए, ताकि वन संरक्षण को प्रभावित किए बिना आवासीय आवश्यकताओं को पूरा किया जा सके।
- यह विवाद मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले के बिनेगा गाँव में एक विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTG) के लिए पीएमएवाई-जी के अंतर्गत मकान निर्माण से जुड़ा है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने माना था कि वन भूमि के उपयोग के लिए केंद्र सरकार की पूर्व स्वीकृति नहीं ली गई, जो वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 का उल्लंघन है। इसके बाद यह मामला सिविल अपील और अवमानना याचिका के माध्यम से सर्वोच्च न्यायालय पहुँचा।
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केंद्र सरकार का पक्ष:
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- जनजातीय कार्य मंत्रालय तथा पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने संयुक्त रूप से तर्क दिया कि:
- वन अधिकार अधिनियम के अंतर्गत मान्यता प्राप्त व्यक्तिगत वन अधिकार (IFR) में वन भूमि पर आवास, निवास का अधिकार शामिल है, जिसमें ग्राम सभा द्वारा विधिवत सत्यापन के बाद आवासीय अधिकार भी सम्मिलित हैं।
- जब ये अधिकार औपचारिक रूप से मान्यता प्राप्त हो जाते हैं, तब पीएमएवाई-जी के तहत आवास निर्माण के लिए FCA के अंतर्गत पूर्व स्वीकृति की आवश्यकता नहीं रहती।
- वन अधिकारों का निर्धारण और सत्यापन राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है, क्योंकि FRA के तहत वही सक्षम प्राधिकारी है।
- वन अधिकार अधिनियम के अंतर्गत मान्यता प्राप्त व्यक्तिगत वन अधिकार (IFR) में वन भूमि पर आवास, निवास का अधिकार शामिल है, जिसमें ग्राम सभा द्वारा विधिवत सत्यापन के बाद आवासीय अधिकार भी सम्मिलित हैं।
- जनजातीय कार्य मंत्रालय तथा पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने संयुक्त रूप से तर्क दिया कि:
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वन अधिकार अधिनियम, 2006:
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- अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 का उद्देश्य उन अनुसूचित जनजातियों और अन्य पारंपरिक वनवासियों के अधिकारों को मान्यता देना और उन्हें वैधानिक रूप से प्रदान करना है, जो पीढ़ियों से वन क्षेत्रों में निवास करते आए हैं, परंतु जिनके अधिकार पहले दर्ज नहीं किए गए थे।
- इस अधिनियम के तहत:
- व्यक्तिगत वन अधिकार (IFRs) को आवास, निवास और परंपरागत उपयोग के लिए मान्यता दी जा सकती है।
- ग्राम सभा को दावों की जाँच, सत्यापन और अधिकार-पत्र की सिफारिश में केंद्रीय भूमिका दी गई है।
- यह अधिनियम ऐतिहासिक अन्याय को दूर करने और वन पर निर्भर समुदायों को उनके वैध अधिकार दिलाने के उद्देश्य से बनाया गया है।
- व्यक्तिगत वन अधिकार (IFRs) को आवास, निवास और परंपरागत उपयोग के लिए मान्यता दी जा सकती है।
- अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 का उद्देश्य उन अनुसूचित जनजातियों और अन्य पारंपरिक वनवासियों के अधिकारों को मान्यता देना और उन्हें वैधानिक रूप से प्रदान करना है, जो पीढ़ियों से वन क्षेत्रों में निवास करते आए हैं, परंतु जिनके अधिकार पहले दर्ज नहीं किए गए थे।
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वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980:
वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 वन भूमि के गैर-वानिकी उपयोग को नियंत्रित करता है और सामान्यतः ऐसे उपयोग के लिए केंद्र सरकार की पूर्व स्वीकृति अनिवार्य करता है। इसका मुख्य उद्देश्य वन क्षेत्र की रक्षा करना और विकास कार्यों के नाम पर अनियंत्रित वन भूमि हस्तांतरण को रोकना है।
निष्कर्ष:
केंद्र सरकार का यह रुख वन संरक्षण और सामाजिक कल्याण के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास है। यदि सुप्रीम कोर्ट इस तर्क को स्वीकार करता है, तो आदिवासी क्षेत्रों में पीएमएवाई-जी का क्रियान्वयन सुगम हो सकेगा, ग्राम सभा की भूमिका और सशक्त होगी तथा पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक न्याय के बीच बेहतर संतुलन स्थापित किया जा सकेगा। सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निर्णय वन अधिकारों और संरक्षण कानूनों की व्याख्या को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करेगा और भविष्य में FRA तथा FCA के कार्यान्वयन की दिशा निर्धारित करेगा।
