नीदरलैंड द्वारा 11वीं शताब्दी की चोल ताम्रपत्रों की भारत को वापसी
संदर्भ:
हाल ही में 11वीं शताब्दी के चोल ताम्रपत्रों को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की नीदरलैंड यात्रा के दौरान औपचारिक रूप से भारत को सौंप दिया गया।
पृष्ठभूमि:
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- नीदरलैंड ने चोल ताम्रपत्रों (अनैमंगलम ताम्रपत्र) को उनकी भारतीय उत्पत्ति को स्वीकार करते हुए भारत को वापस किया।
- ये ताम्रपत्र वर्ष 1862 से लीडेन विश्वविद्यालय के पास सुरक्षित थे।
- यह निर्णय डच कॉलोनियल कलेक्शंस समिति की सिफारिश पर भारत के वर्ष 2023 के अनुरोध के बाद लिया गया।
- नीदरलैंड ने चोल ताम्रपत्रों (अनैमंगलम ताम्रपत्र) को उनकी भारतीय उत्पत्ति को स्वीकार करते हुए भारत को वापस किया।
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ताम्रपत्रों के बारे में:
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- कुल: 21 बड़े ताम्रपत्र और 3 छोटे ताम्रपत्र
- ये दो अलग-अलग समूहों से संबंधित हैं:
- एक राजराजा चोल प्रथम और राजेंद्र चोल प्रथम से संबंधित
- दूसरा कुलोत्तुंगा चोल प्रथम से संबंधित
- एक राजराजा चोल प्रथम और राजेंद्र चोल प्रथम से संबंधित
- इन ताम्रपत्रों पर राजकीय मुहरें अंकित हैं तथा इनमें प्रशासनिक एवं धार्मिक अनुदानों का उल्लेख मिलता है।
- माना जाता है कि इन्हें 1687 से 1700 के बीच नागपट्टिनम में डच औपनिवेशिक गतिविधियों के दौरान प्राप्त किया गया था।
- इन ताम्रपत्रों को वर्ष 1712 में नागपट्टिनम से फ्लोरेंटियस कैम्पर नामक डच मिशनरी द्वारा नीदरलैंड ले जाया गया था, जो डच ईस्ट इंडीज कंपनी से जुड़ा हुआ था।
- कुल: 21 बड़े ताम्रपत्र और 3 छोटे ताम्रपत्र
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चोल वंश के बारे में:
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- चोल वंश दक्षिण भारत के सबसे दीर्घकाल तक शासन करने वाले राजवंशों में से एक था।
- इसकी उत्पत्ति तमिल क्षेत्र में हुई थी।
- इसका नियंत्रण वर्तमान तमिलनाडु, केरल और आंध्र प्रदेश और कर्नाटक के कुछ भागों तक फैला हुआ था।
- यह निम्नलिखित विशेषताओं के लिए प्रसिद्ध था:
- सशक्त नौसैनिक शक्ति,
- समुद्री व्यापार,
- मंदिर वास्तुकला,
- कुशल प्रशासन।
- सशक्त नौसैनिक शक्ति,
- चोल वंश दक्षिण भारत के सबसे दीर्घकाल तक शासन करने वाले राजवंशों में से एक था।
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प्रमुख चोल शासक:
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- राजाराज चोल प्रथम (947–1014 ई.):
- इन्होंने बृहदेश्वर मंदिर का निर्माण कराया।
- दक्षिण भारत और श्रीलंका तक साम्राज्य का विस्तार किया।
- इन्होंने बृहदेश्वर मंदिर का निर्माण कराया।
- राजेंद्र चोल प्रथम:
- दक्षिण-पूर्व एशिया तक चोल प्रभाव का विस्तार किया।
- गंगईकोंडा चोलपुरम की स्थापना की।
- शक्तिशाली समुद्री अभियानों के लिए प्रसिद्ध रहे।
- दक्षिण-पूर्व एशिया तक चोल प्रभाव का विस्तार किया।
- कुलोत्तुंग चोल प्रथम:
- प्रशासनिक सुधारों को मजबूत किया।
- व्यापारिक नेटवर्क और राजनीतिक स्थिरता बनाए रखी।
- प्रशासनिक सुधारों को मजबूत किया।
- राजाराज चोल प्रथम (947–1014 ई.):
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प्रशासन, समाज और अर्थव्यवस्था:
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- प्रशासन:
- अत्यधिक केंद्रीकृत राजतंत्र
- सुव्यवस्थित राजस्व प्रणाली
- ग्राम स्वशासन की मजबूत व्यवस्था (उर एवं सभा प्रणाली)
- प्रभावी भूमि राजस्व प्रशासन
- अत्यधिक केंद्रीकृत राजतंत्र
- अर्थव्यवस्था:
- कृषि आधारित अर्थव्यवस्था
- दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ समृद्ध समुद्री व्यापार
- नागपट्टिनम जैसे सक्रिय बंदरगाह नगर
- व्यापार एवं वाणिज्य के लिए सशक्त श्रेणी (गिल्ड) व्यवस्था
- कृषि आधारित अर्थव्यवस्था
- समाज:
- स्तरीकृत किंतु सुव्यवस्थित सामाजिक संरचना
- सामाजिक जीवन में मंदिरों की महत्वपूर्ण भूमिका
- बौद्ध धर्म एवं हिंदू धर्म दोनों को संरक्षण
- स्तरीकृत किंतु सुव्यवस्थित सामाजिक संरचना
- प्रशासन:
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सांस्कृतिक एवं स्थापत्य योगदान:
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- चोल स्थापत्य कला
- द्रविड़ शैली की मंदिर वास्तुकला
- विशाल विमानों (मंदिर शिखरों) का निर्माण
- जटिल पत्थर नक्काशी एवं कांस्य मूर्तिकला
- द्रविड़ शैली की मंदिर वास्तुकला
- प्रमुख मंदिर
- बृहदेश्वर मंदिर
- गंगईकोंडा चोलपुरम मंदिर
- ऐरावतेश्वर मंदिर
- इन सभी को सामूहिक रूप से “ग्रेट लिविंग चोला टेम्पल्स” कहा जाता है और ये यूनेस्को (UNESCO) विश्व धरोहर स्थल हैं।
- बृहदेश्वर मंदिर
- समुद्री विरासत
- राजेंद्र चोल प्रथम के शासनकाल में चोलों ने एक शक्तिशाली नौसेना विकसित की।
- दक्षिण-पूर्व एशिया, श्रीलंका और चीन के साथ व्यापारिक संबंध स्थापित किए।
- हिंद महासागर व्यापार नेटवर्क में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- राजेंद्र चोल प्रथम के शासनकाल में चोलों ने एक शक्तिशाली नौसेना विकसित की।
- चोल स्थापत्य कला
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ताम्रपत्रों की वापसी का महत्व:
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- भारत की सांस्कृतिक पुनर्स्थापन कूटनीति को मजबूती मिलेगी।
- भारतीय विरासत अधिकारों की वैश्विक मान्यता को बल मिलेगा।
- दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ ऐतिहासिक व्यापारिक एवं सांस्कृतिक संबंधों को उजागर करता है।
- औपनिवेशिक काल में कलाकृतियों की लूट के विरुद्ध भारत के व्यापक अभियान को समर्थन मिलता है।
- वैश्विक स्तर पर चोल सभ्यता की बेहतर समझ विकसित होगी।
- भारत की सांस्कृतिक पुनर्स्थापन कूटनीति को मजबूती मिलेगी।
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निष्कर्ष:
चोल ताम्रपत्रों की वापसी भारत की सांस्कृतिक धरोहर की पुनर्स्थापना की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह सांस्कृतिक विरासत की वापसी हेतु वैश्विक सहयोग को सुदृढ़ करता है तथा ऐतिहासिक महत्व की कलाकृतियों को उनके वास्तविक मूल स्थान पर लौटाने की आवश्यकता को रेखांकित करता है।

