सन्दर्भ:
हाल ही में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने यूरिया हेतु राष्ट्रीय निवेश नीति-2026 को स्वीकृति प्रदान की है। इसका उद्देश्य गैस-आधारित यूरिया विनिर्माण संयंत्रों में निवेश को प्रोत्साहित करना, घरेलू यूरिया उत्पादन बढ़ाना, आयात निर्भरता कम करना तथा आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को सुदृढ़ करना है।
पृष्ठभूमि:
उर्वरक विभाग ने वर्ष 2012 में नई निवेश नीति (NIP-2012) लागू की थी, जिसके अंतर्गत ग्रीनफील्ड, ब्राउनफील्ड, विस्तार, आधुनिकीकरण एवं बंद यूरिया संयंत्रों के पुनरुद्धार में निवेश को प्रोत्साहन दिया गया।
इस नीति के अंतर्गत-
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- 6 नए यूरिया संयंत्र स्थापित किए गए।
- इनमें 4 सार्वजनिक क्षेत्र के संयुक्त उपक्रमों तथा 2 निजी कंपनियों द्वारा स्थापित किए गए।
- वर्ष 2019 में निवेश अवधि समाप्त होने के बाद प्राप्त नए निवेश प्रस्तावों के आधार पर NIPU-2026 तैयार की गई।
- 6 नए यूरिया संयंत्र स्थापित किए गए।
यूरिया हेतु राष्ट्रीय निवेश नीति 2026 की प्रमुख विशेषताएँ:
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- नए गैस-आधारित यूरिया विनिर्माण संयंत्रों को प्रोत्साहन।
- मूल्य निर्धारण में स्थिर (Fixed) एवं परिवर्ती (Variable) लागतों को अलग-अलग निर्धारित किया गया है।
- निवेश को आकर्षक बनाने हेतु 12% से 16% तक इक्विटी प्रतिफल (Return on Equity-RoE) का प्रावधान।
- चार वर्ष बाद प्रचलित विनिमय दर के आधार पर स्थिर लागत को रुपये में परिवर्तित कर विदेशी मुद्रा जोखिम को कम करना।
- घरेलू उत्पादन बढ़ाकर यूरिया आयात पर निर्भरता घटाना।
- नए गैस-आधारित यूरिया विनिर्माण संयंत्रों को प्रोत्साहन।
भारत में यूरिया उत्पादन:
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- भारत में 33 यूरिया विनिर्माण इकाइयाँ कार्यरत हैं।
- कुल पुनर्मूल्यांकित स्थापित क्षमता 269.42 लाख मीट्रिक टन (LMT) है।
- पर्याप्त क्षमता होने के बावजूद कृषि क्षेत्र में अधिक मांग के कारण भारत को यूरिया का आयात करना पड़ता है।
- भारत में 33 यूरिया विनिर्माण इकाइयाँ कार्यरत हैं।
कृषि एवं औद्योगिक यूरिया में अंतर:
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कृषि यूरिया |
औद्योगिक (तकनीकी ग्रेड) यूरिया |
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फसलों के लिए नाइट्रोजन उर्वरक |
रेज़िन, प्लाईवुड, मेलामाइन, वस्त्र, रंग एवं अन्य उद्योगों में उपयोग |
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सरकार द्वारा अत्यधिक सब्सिडी प्राप्त |
बिना सब्सिडी के बाज़ार मूल्य पर उपलब्ध |
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नीम-लेपित तथा उर्वरक नियंत्रण आदेश (FCO) के अंतर्गत विनियमित |
नीम-लेपित नहीं; औद्योगिक गुणवत्ता मानकों के अनुसार |
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पीले रंग के थैलों में निर्धारित चिन्हों सहित आपूर्ति |
सामान्यतः सफेद थैलों में औद्योगिक विनिर्देशों के साथ |
संबंधित सरकारी पहल:
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- पोषक-आधारित सब्सिडी (NBS) योजना, 2010 – फॉस्फेट एवं पोटाश उर्वरकों के संतुलित उपयोग को बढ़ावा।
- मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना, 2015 – किसानों को मृदा पोषक तत्वों की जानकारी उपलब्ध कराना।
- 100% नीम-लेपित यूरिया, 2015 – नाइट्रोजन हानि कम करना, पोषक उपयोग दक्षता बढ़ाना तथा सब्सिडीयुक्त यूरिया की कालाबाज़ारी रोकना।
- नैनो उर्वरक – पोषक तत्वों की अधिक दक्ष आपूर्ति; भारत आगामी वर्षों में पारंपरिक यूरिया एवं DAP का लगभग 10% नैनो उर्वरकों से प्रतिस्थापित करने का लक्ष्य रखता है।
- पोषक-आधारित सब्सिडी (NBS) योजना, 2010 – फॉस्फेट एवं पोटाश उर्वरकों के संतुलित उपयोग को बढ़ावा।
महत्त्व:
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- आत्मनिर्भर भारत के तहत उर्वरक आत्मनिर्भरता को बढ़ावा।
- महंगे यूरिया आयात पर निर्भरता में कमी।
- सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्र के निवेश को प्रोत्साहन।
- ऊर्जा-कुशल गैस-आधारित उत्पादन को बढ़ावा।
- किसानों को उर्वरकों की स्थिर उपलब्धता सुनिश्चित कर खाद्य सुरक्षा को सुदृढ़ करना।
- आत्मनिर्भर भारत के तहत उर्वरक आत्मनिर्भरता को बढ़ावा।
चुनौतियाँ:
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- नए संयंत्रों के लिए उच्च पूंजी निवेश।
- प्राकृतिक गैस की उपलब्धता एवं कीमतों पर निर्भरता।
- उर्वरक उत्पादन से जुड़े पर्यावरणीय प्रभाव।
- यूरिया के अत्यधिक उपयोग को रोकते हुए संतुलित उर्वरक उपयोग सुनिश्चित करना।
- नए संयंत्रों के लिए उच्च पूंजी निवेश।
निष्कर्ष:
यूरिया हेतु राष्ट्रीय निवेश नीति-2026 भारत की उर्वरक सुरक्षा को सुदृढ़ करने तथा आयात निर्भरता कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। हालांकि, दीर्घकालिक कृषि एवं खाद्य सुरक्षा के लिए घरेलू उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ संतुलित उर्वरक उपयोग, नैनो उर्वरकों को बढ़ावा, मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन तथा पोषक तत्वों के दक्ष उपयोग पर समान रूप से बल देना आवश्यक है।
