प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन (संशोधन) नियम, 2026
सन्दर्भ:
हाल ही में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) ने 'प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन (संशोधन) नियम, 2026' को अधिसूचित किया है। 31 मार्च, 2026 को लागू किए गए ये नियम भारत के 2021 और 2022 के मूल नियमों में महत्वपूर्ण सुधार करते हैं। इनका मुख्य उद्देश्य प्लास्टिक प्रदूषण को कम करना और भारत को 'चक्रीय अर्थव्यवस्था' (Circular Economy) की ओर तेजी से अग्रसर करना है।
प्रमुख संशोधन और विशेषताएं:
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- अनिवार्य पुनर्चक्रित सामग्री: नए नियमों के तहत, उत्पादकों, आयातकों और ब्रांड मालिकों (PIBOs) के लिए प्लास्टिक पैकेजिंग में एक निश्चित प्रतिशत पुनर्चक्रित (Recycled) प्लास्टिक का उपयोग करना अनिवार्य कर दिया गया है।
- श्रेणी I (कठोर प्लास्टिक): वर्ष 2025-26 के लिए 30% का लक्ष्य रखा गया है, जिसे 2028-29 तक बढ़ाकर 60% किया जाएगा।
- श्रेणी II और III (लचीली और बहुस्तरीय पैकेजिंग): इनके लिए भी चरणबद्ध तरीके से लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं।
- श्रेणी I (कठोर प्लास्टिक): वर्ष 2025-26 के लिए 30% का लक्ष्य रखा गया है, जिसे 2028-29 तक बढ़ाकर 60% किया जाएगा।
- पुन: उपयोग (Reuse) के कड़े नियम: पहली बार कठोर प्लास्टिक पैकेजिंग (जैसे 5 लीटर से बड़ी पानी की बोतलें) के लिए 'पुन: उपयोग' के लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं। वर्ष 2025-26 के लिए यह लक्ष्य 70% है, जो भविष्य में 85% तक जाएगा। यह 'उपयोग करो और फेंको' (Use and Throw) की संस्कृति पर प्रहार करता है।
- 'रीसाइक्लिंग' की नई परिभाषा: संशोधन के तहत अब 'पुनर्चक्रण' (Recycling) में न केवल नए उत्पाद बनाना शामिल है, बल्कि प्लास्टिक कचरे से ऊर्जा उत्पन्न करना (Waste-to-Energy) भी शामिल है। इसमें सीमेंट/स्टील उद्योगों में को-प्रोसेसिंग और सड़क निर्माण जैसी प्रक्रियाओं को 'एंड-ऑफ-लाइफ डिस्पोजल' के रूप में मान्यता दी गई है।
- विकेंद्रीकृत प्रवर्तन (Decentralized Enforcement): प्रभावी कार्यान्वयन के लिए स्थानीय निकायों (नगर पालिकाओं और ग्राम पंचायतों) को अधिक शक्तियां दी गई हैं। अब जमीनी स्तर पर प्लास्टिक कचरे के पृथक्करण और प्रबंधन की जिम्मेदारी इन निकायों की होगी।
- सत्यापन और ऑडिट: विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (EPR) के अनुपालन की जांच अब पंजीकृत 'पर्यावरण ऑडिटर्स' द्वारा की जा सकेगी, जिससे पारदर्शिता बढ़ेगी और डेटा की सटीकता सुनिश्चित होगी।
- अनिवार्य पुनर्चक्रित सामग्री: नए नियमों के तहत, उत्पादकों, आयातकों और ब्रांड मालिकों (PIBOs) के लिए प्लास्टिक पैकेजिंग में एक निश्चित प्रतिशत पुनर्चक्रित (Recycled) प्लास्टिक का उपयोग करना अनिवार्य कर दिया गया है।
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चुनौतियां और लाभ:
लाभ:
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- पर्यावरणीय प्रभाव: यह संशोधन लैंडफिल में जाने वाले प्लास्टिक कचरे को कम करेगा और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा करेगा।
- आर्थिक अवसर: पुनर्चक्रण उद्योग में निवेश और रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे।
- सतत विकास लक्ष्य (SDG): यह नियम SDG 12 (जिम्मेदार उपभोग और उत्पादन) और SDG 13 (जलवायु कार्रवाई) को प्राप्त करने में सहायक है।
- पर्यावरणीय प्रभाव: यह संशोधन लैंडफिल में जाने वाले प्लास्टिक कचरे को कम करेगा और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा करेगा।
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चुनौतियां:
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- संग्रहण और पृथक्करण: भारत में अभी भी स्रोत पर कचरे का पृथक्करण एक बड़ी चुनौती है।
- तकनीकी बाधाएं: खाद्य सामग्री और दवाओं की पैकेजिंग में पुनर्चक्रित प्लास्टिक का उपयोग स्वास्थ्य मानकों (FSSAI नियमों) के कारण जटिल है।
- लघु उद्योगों पर प्रभाव: छोटे उत्पादकों के लिए नई तकनीक और अनुपालन की लागत एक वित्तीय बोझ बन सकती है।
- संग्रहण और पृथक्करण: भारत में अभी भी स्रोत पर कचरे का पृथक्करण एक बड़ी चुनौती है।
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निष्कर्ष:
2026 के ये मील के पत्थर प्लास्टिक प्रदूषण पर संयुक्त राष्ट्र संधि (UN Treaty on Plastic Pollution) के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं। एक विकासशील अर्थव्यवस्था के लिए, औद्योगिक विकास को इतने कड़े पर्यावरणीय आदेशों के साथ संतुलित करना एक कठिन कार्य है, लेकिन सतत विकास लक्ष्य (SDG) 12: जिम्मेदार उपभोग और उत्पादन की दिशा में यह एक आवश्यक कदम है।

