संदर्भ:
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि भारत में, विशेषकर केरल जैसे दक्षिणी राज्यों में, मानव-वन्यजीव संघर्ष (HWC) खतरनाक स्तर पर पहुँच गया है। कोर्ट ने संज्ञान लेते हुए कहा इस समस्या को सिर्फ अदालती आदेशों से नहीं सुलझाया जा सकता। इसके लिए स्थानीय समुदायों की भाषा, उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति और जमीनी स्थिति को समझना और उनसे जुड़ना आवश्यक है।
भारत में मानव-वन्यजीव संघर्ष के बारे में:
भारत में यह संघर्ष संसाधनों और स्थान की कमी के कारण होता है। भारत के पास दुनिया की केवल 2.4% जमीन है, लेकिन यहाँ दुनिया की 18% आबादी रहती है। तेजी से हो रहे विकास, जंगलों की कटाई और प्राकृतिक आवासों के विभाजित होने से इंसानों और जानवरों के बीच टकराव बढ़ गया है।
मुख्य संघर्ष वाली प्रजातियां:
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- हाथी: फसलों को नष्ट करना, संपत्ति का नुकसान और लोगों की जान लेना।
- तेंदुए: ग्रामीण और शहरों के बाहरी इलाकों में हमले।
- जंगली सूअर: बड़े पैमाने पर फसलों को नुकसान पहुँचाना।
- हाथी: फसलों को नष्ट करना, संपत्ति का नुकसान और लोगों की जान लेना।
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संघर्ष के मुख्य कारण:
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- प्राकृतिक आवास की कमी: जंगलों की कटाई, बुनियादी ढांचा परियोजनाएं (सड़क, रेल) और वन्यजीव गलियारों (corridors) में अतिक्रमण।
- खेती का विस्तार: खेतों में लगी फसलें जानवरों को आकर्षित करती हैं और जंगलों के पास पशु चराने से शिकारी जानवरों से सामना बढ़ जाता है।
- भोजन की कमी: जंगलों में प्राकृतिक भोजन कम होने से जानवर बस्तियों की ओर आते हैं।
- व्यावसायिक और प्रणालीगत कारक: अदालत ने हितों के टकराव, स्थानीय लोगों की मजबूरीके शोषण, और पर्यावरण कानूनों की अनदेखी पर प्रकाश डाला।
- प्राकृतिक आवास की कमी: जंगलों की कटाई, बुनियादी ढांचा परियोजनाएं (सड़क, रेल) और वन्यजीव गलियारों (corridors) में अतिक्रमण।
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समुदायों और वन्यजीवों पर प्रभाव:
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- मानवीय क्षति: हर साल सैकड़ों मौतें, चोटें और अपंगता।
- आर्थिक नुकसान: फसल और पशुधन के नुकसान से किसानों पर वित्तीय दबाव।
- बदले की भावना: जानवरों को जहर देना या करंट लगाकर मारना, जिससे संरक्षण को नुकसान पहुँचता है।
- मानसिक प्रभाव: ग्रामीणों में डर, सदमा और आजीविका का बाधित होना।
- मानवीय क्षति: हर साल सैकड़ों मौतें, चोटें और अपंगता।
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समाधान में स्थानीय समुदायों की भूमिका:
कोर्ट के अनुसार, समाधान समुदाय के भीतर से ही निकलना चाहिए:
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- पारंपरिक ज्ञान: ढोल बजाना, रोशनी का उपयोग, फसलों के पैटर्न में बदलाव।
- सामुदायिक निगरानी: सतर्कता समितियां और शुरुआती चेतावनी प्रणाली बनाना।
- भागीदारी: जंगलों और गलियारों के प्रबंधन में लोगों को शामिल करना।
- सूचना देना: स्थानीय लोगों का वन विभाग को तुरंत जानकारी देने वाले 'फर्स्ट रिस्पॉन्डर' के रूप में काम करना।
- पारंपरिक ज्ञान: ढोल बजाना, रोशनी का उपयोग, फसलों के पैटर्न में बदलाव।
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भारत में बचाव और नीतिगत उपाय:
वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 कानून भारत में संरक्षण के लिए कानूनी आधार प्रदान करता है।
सरकारी उपाय जैसे इनमें पीड़ितों के लिए मुआवजा योजनाएं, खेतों के चारों ओर सोलर फेंसिंग (सौर बाड़), संवेदनशील आवासों से समुदायों का पुनर्वास और त्वरित प्रतिक्रिया दल का गठन शामिल है। केरल ने मानव-वन्यजीव संघर्ष को "राज्य-विशिष्ट आपदा" के रूप में वर्गीकृत किया है ताकि प्रभावित लोगों को राहत और सहायता तेजी से मिल सके।अंतरराष्ट्रीय सहयोग जैसे कि इंडो-जर्मन जैव विविधता कार्यक्रम जैसे प्रयास क्षेत्रीय स्तर पर संरक्षण कार्यों में मदद करते हैं।
न्यायालय के निर्णय का महत्व:
यह फैसला केवल कानूनी समाधानों के बजाय मानवीय और सहयोगात्मक दृष्टिकोण की ओर बदलाव का संकेत देता है।उनकी भाषा बोलना,सांस्कृतिक संवेदनशीलता, प्रशासनिक सहानुभूति और स्थानीय समुदायों को बाधा मानने के बजाय उन्हें 'साझेदार' के रूप में स्वीकार करने को दर्शाता है।
निष्कर्ष:
मानव-वन्यजीव संघर्ष विकास और पर्यावरण के बीच के तनाव को दर्शाता है। साथ मिलकर रहने के लिए कानूनी सुरक्षा, वैज्ञानिक योजना और सबसे महत्वपूर्ण रूप से स्थानीय लोगों की भागीदारी की आवश्यकता है।
