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Blog / 21 Aug 2026

मृत्युदंड की पद्धतियां: न्यायिक समीक्षा

संदर्भ:

हाल ही में अगस्त 2026 में, सर्वोच्च न्यायालय के जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने एक जनहित याचिका (PIL) को खारिज कर दिया, जिसमें मृत्युदंड के लिए 'फांसी की सजा' (Hanging) को अमानवीय बताते हुए इसे घातक सुई (Lethal Injection) जैसे विकल्पों से बदलने की मांग की गई थी। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि वर्तमान वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर फांसी को पूरी तरह अमानवीय नहीं माना जा सकता, लेकिन भविष्य में बेहतर वैज्ञानिक विकल्पों के लिए रास्ते बंद नहीं किए गए हैं।

प्रमुख कानूनी और संवैधानिक आयाम:

भारतीय न्यायशास्त्र में मृत्युदंड और उसे लागू करने की पद्धति को मुख्य रूप से दो संवैधानिक और विधिक पैमानों पर परखा जाता है:

      • अनुच्छेद 21 और सम्मानजनक मृत्यु का अधिकार: भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक नागरिक को 'जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार' देता है। सर्वोच्च न्यायालय ने विभिन्न ऐतिहासिक फैसलों (जैसे ज्ञान कौर बनाम पंजाब राज्य) में यह स्थापित किया है कि गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार में 'गरिमापूर्ण मृत्यु का अधिकार' (Right to Dignity in Death) भी शामिल है। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि फांसी में होने वाला अत्यधिक दर्द इस गरिमा का उल्लंघन करता है।
      • न्यायिक मिसालें (Judicial Precedents): सर्वोच्च न्यायालय ने अपने ऐतिहासिक दीना बनाम भारत संघ (1983) मामले का हवाला दिया। इस मामले में न्यायालय ने माना था कि फांसी की आधुनिक पद्धति (लॉन्ग-ड्रॉप मेथड) त्वरित है, इसमें कम दर्द होता है, और यह शव को विकृत नहीं करती है। न्यायालय के अनुसार, बिजली की कुर्सी (Electrocution) या घातक सुई जैसे विकल्पों में फांसी की तुलना में कोई विशिष्ट या सिद्ध लाभ नहीं पाया गया है।
      • विधायी मंशा (Legislative Intent): हाल ही में लागू की गई भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 393(5) में भी संसद ने मृत्युदंड के लिए फांसी की पद्धति को ही बरकरार रखा है। न्यायालय ने कहा कि कानून बनाना और उसमें बदलाव करना मुख्य रूप से विधायिका का कार्यक्षेत्र है।

न्यायालय का दृष्टिकोण:

      • न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि भविष्य में कोई ऐसी वैज्ञानिक पद्धति सामने आती है जो फांसी से कम दर्दनाक और अधिक मानवीय हो, तो उसकी संवैधानिक समीक्षा की जा सकती है।
      • न्यायालय ने केंद्र सरकार से कहा है कि वह कानूनी विशेषज्ञों, तंत्रिका विज्ञानियों (Neuroscientists) और फोरेंसिक विशेषज्ञों की एक उच्च स्तरीय समिति का गठन कर सकती है, जो विभिन्न देशों की पद्धतियों का डेटा एकत्र कर अधिक मानवीय विकल्पों पर विचार कर सके।
      • सरकार का तर्क रहा है कि भारत के सुदूर क्षेत्रों की जेलों में जटिल चिकित्सा बुनियादी ढांचे और डॉक्टरों की कमी के कारण, फांसी एक प्रशासनिक रूप से पूर्वानुमानित (Predictable) और विश्वसनीय माध्यम है।

विधि आयोग की 262वीं रिपोर्ट:

विधि आयोग (Law Commission) की 262वीं रिपोर्ट (2015) ने भारत में मृत्युदंड को लेकर एक क्रांतिकारी सिफारिश की थी। आयोग ने सुझाव दिया कि आतंकवाद और राज्य के खिलाफ युद्ध (Waging War) से जुड़े अपराधों को छोड़कर, अन्य सभी सामान्य अपराधों के लिए मृत्युदंड को पूरी तरह समाप्त (Abolish) कर दिया जाना चाहिए।

आयोग के मुख्य निष्कर्ष निम्नलिखित थे:

      • कोई निवारक प्रभाव नहीं: मृत्युदंड से अपराधों में कमी आने का कोई ठोस साक्ष्य नहीं है।
      • अपरिवर्तनीय प्रकृति: न्यायिक त्रुटि के कारण यदि किसी निर्दोष को फांसी दे दी जाए, तो उसे सुधारा नहीं जा सकता।
      • सुधारात्मक न्याय: न्याय प्रणाली का ध्यान प्रतिशोध (Retribution) के बजाय अपराधी के सुधार पर होना चाहिए।
      • वैकल्पिक सजा: आयोग ने मृत्युदंड की जगह बिना पैरोल के 'आजीवन कारावास' को एक मजबूत विकल्प माना।

निष्कर्ष:

एमनेस्टी इंटरनेशनल के अनुसार, दुनिया के दो-तिहाई से अधिक देशों ने मृत्युदंड को समाप्त कर दिया है। भारत में मृत्युदंड केवल 'दुर्लभ से दुर्लभतम मामलों' (Rarest of Rare Cases) में ही दिया जाता है। जब तक देश में मृत्युदंड का अस्तित्व है, तब तक राज्य की संप्रभु शक्ति (State Power) और मानवीय गरिमा के बीच संतुलन बनाए रखना अनिवार्य है। 

 

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