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Blog / 02 Feb 2026

मासिक धर्म स्वास्थ्य मौलिक अधिकार है: सर्वोच्च न्यायालय

संदर्भ:

हाल ही में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने यह घोषित किया कि विद्यालयों में मासिक धर्म स्वास्थ्य और स्वच्छता तक पहुँच संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का अभिन्न हिस्सा है।

मुख्य न्यायिक निष्कर्ष:

      • मासिक धर्म स्वास्थ्य एक मौलिक अधिकार के रूप में:
        • न्यायालय ने माना कि मासिक धर्म स्वास्थ्य एवं स्वच्छता प्रबंधन (MHM) अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का एक मूल घटक है, क्योंकि इसमें गरिमा, निजता, स्वास्थ्य और शारीरिक स्वायत्तता शामिल हैं।
        • निर्णय में इस बात पर बल दिया गया कि मासिक धर्म स्वच्छता उपायों तक पहुँच का अभाव कलंक, अपमान और बहिष्कार को जन्म देता है, जिससे सार्थक (Substantive) समानता कमजोर होती है।
      • शिक्षा के अधिकार से संबंध:
        • चूँकि अनुच्छेद 21A के तहत शिक्षा का अधिकार, जीवन के अधिकार का विस्तार है, इसलिए शिक्षा तक प्रभावी पहुँच के लिए उन बाधाओं को हटाना आवश्यक है, जैसे मासिक धर्म सुविधाओं का अभाव, जो किशोरियों को असमान रूप से प्रभावित करती हैं।
      • सार्थक समानता:
        • न्यायालय ने अनुच्छेद 14 के तहत सार्थक समानता के दृष्टिकोण को अपनाया और कहा कि असमानों के साथ समान व्यवहार करना संरचनात्मक बहिष्कार और प्रणालीगत नुकसान को बनाए रख सकता है।

Right to Menstrual Health as a Fundamental Right in India

जारी निर्देश:

      • निःशुल्क सैनिटरी नैपकिन
        • सभी राज्य, केंद्र शासित प्रदेश तथा सरकारी और निजीसभी विद्यालयों को छात्राओं को निःशुल्क जैव-अपघटनीय सैनिटरी नैपकिन उपलब्ध कराने होंगे।
      • मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन सुविधाएँ
        • विद्यालयों में पानी, साबुन और पर्याप्त निजता से युक्त, दिव्यांग-अनुकूल, कार्यशील लैंगिक रूप से पृथक शौचालय स्थापित किए जाने चाहिए।
        • सुरक्षित निपटान के लिए ढके हुए डिब्बे, इंसीनेरेटर या अन्य पर्यावरण-अनुकूल प्रणालियाँ उपलब्ध कराई जानी चाहिए।
      • जागरूकता और शिक्षा
        • विद्यालयी पाठ्यक्रम में मासिक धर्म स्वास्थ्य शिक्षा को शामिल किया जाए तथा सामाजिक कलंक को दूर करने और गरिमा सुनिश्चित करने हेतु शिक्षकों के लिए संवेदनशीलता कार्यक्रम चलाए जाएँ।
      • अनुपालन और जवाबदेही
        • राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्धारित समय-सीमा में इन उपायों को लागू करना होगा; अनुपालन न करने वाले निजी विद्यालयों की मान्यता रद्द किए जाने सहित दंडात्मक कार्रवाई की जा सकती है।

महत्त्व:

      • लैंगिक न्याय और सार्वजनिक स्वास्थ्य: यह निर्णय मासिक धर्म स्वास्थ्य को बहुआयामी अधिकार के रूप में मान्यता देता है, जिसमें स्वास्थ्य, शिक्षा, गरिमा, निजता और लैंगिक समानता शामिल हैं।
      • वर्जनाओं को तोड़ना: जागरूकता और शिक्षा को अनिवार्य बनाकर यह निर्णय मासिक धर्म से जुड़ी गहरी सामाजिक वर्जनाओं को चुनौती देता है और अधिक समावेशी विद्यालयी वातावरण को बढ़ावा देता है।
      • शिक्षा में समानता: पर्याप्त मासिक धर्म स्वच्छता सुविधाओं की उपलब्धता से छात्राओं की अनुपस्थिति और ड्रॉपआउट दर में कमी आती है, जिससे शिक्षा में सहभागिता और निरंतरता बढ़ती है।

नीतिगत प्रभाव:

      • यह निर्णय समग्र शिक्षा, स्वच्छ भारत मिशन तथा विद्यालय जाने वाली बालिकाओं के लिए मासिक धर्म स्वच्छता नीति जैसी मौजूदा योजनाओं को संवैधानिक दायित्व के रूप में सुदृढ़ करता है।
      • भारतीय चिकित्सा संघ (IMA) ने सरकार से न्यायालय के निर्देशों के कड़े निगरानी और प्रभावी क्रियान्वयन का आग्रह किया है।

निष्कर्ष:

विद्यालयों में मासिक धर्म स्वास्थ्य को जीवन के अधिकार का अभिन्न अंग घोषित करने वाला सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय एक प्रगतिशील और परिवर्तनकारी कदम है। गरिमा, स्वास्थ्य, शिक्षा और समानता को मौलिक अधिकारों के ढाँचे में दृढ़ता से स्थापित कर यह निर्णय सार्वजनिक स्वास्थ्य, लैंगिक समानता और शिक्षा तक पहुँच से जुड़ी दीर्घकालिक कमियों को दूर करने का प्रयास करता है।