संदर्भ:
हाल ही में, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब तक भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 63 में दिए गए अपवाद (Exception) को असंवैधानिक घोषित नहीं कर दिया जाता, तब तक पतियों के खिलाफ बलात्कार का मुकदमा चलाने में गंभीर कानूनी दुविधा है। अदालत ने इस संवेदनशील मुद्दे पर तीन सप्ताह बाद अंतिम सुनवाई (Final Hearing) तय की है।
वैवाहिक बलात्कार क्या है?
वैवाहिक बलात्कार से तात्पर्य पति द्वारा अपनी पत्नी के साथ उसकी सहमति के बिना यौन संबंध बनाने से है। मुख्य कानूनी विवाद यह है कि क्या विवाह यौन संबंधों में सहमति की आवश्यकता के लिए एक अपवाद हो सकता है।
यह मुद्दा एक ओर व्यक्तिगत शारीरिक स्वायत्तता और गरिमा तथा दूसरी ओर वैवाहिक संबंधों की रक्षा करने वाले मौजूदा वैधानिक ढाँचे के बीच संघर्ष से जुड़ा है।
भारत में कानूनी स्थिति:
पूर्ववर्ती भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 375 के तहत, अपवाद 2 में यह प्रावधान था कि किसी पुरुष द्वारा अपनी पत्नी के साथ किया गया यौन संबंध या यौन कृत्य, जहाँ पत्नी की आयु 15 वर्ष से कम नहीं थी, बलात्कार नहीं माना जाता था।
IPC के स्थान पर लागू हुई भारतीय न्याय संहिता (BNS) ने धारा 63 के तहत वैवाहिक बलात्कार के अपवाद को बरकरार रखा है, जबकि संबंधित आयु सीमा को 15 से बढ़ाकर 18 वर्ष कर दिया गया है।
इस प्रकार, वर्तमान कानून के तहत, किसी वयस्क पति द्वारा अपनी वयस्क पत्नी के साथ उसकी सहमति के बिना किया गया यौन संबंध सामान्यतः बलात्कार के अपराध के रूप में वर्गीकृत नहीं किया जाता है।
मामले में तर्क:
अपराधीकरण के पक्ष में तर्क:
वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने तर्क दिया कि मौजूदा कानून की पर्याप्त व्यापक व्याख्या की जा सकती है, जिससे विवाह के भीतर यौन हिंसा होने पर अभियोजन को उचित ठहराया जा सके। उन्होंने जोर दिया कि विवाह से महिलाओं की शारीरिक स्वायत्तता और सहमति का अधिकार समाप्त नहीं होना चाहिए।
सरकार का पक्ष:
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने तर्क दिया कि वैवाहिक बलात्कार के अपवाद को तब तक जारी रखा जाना चाहिए, जब तक सर्वोच्च न्यायालय इसकी संवैधानिक वैधता का निर्धारण नहीं कर देता।
केंद्र ने पहले तर्क दिया था कि वैवाहिक बलात्कार को अपराध घोषित करने से विवाह की संस्था प्रभावित हो सकती है और वैवाहिक संबंधों में गंभीर व्यवधान उत्पन्न हो सकते हैं।
न्यायिक पृष्ठभूमि:
कर्नाटक उच्च न्यायालय ने 2022 में एक पति को बलात्कार के आरोपों का सामना करने की अनुमति दी थी, जिस पर अपनी पत्नी के साथ जबरन यौन संबंध बनाने का आरोप था। न्यायालय ने कहा था कि विवाह यौन हिंसा करने के लिए पूर्ण लाइसेंस प्रदान नहीं कर सकता।
दिल्ली उच्च न्यायालय ने इससे पहले वैवाहिक बलात्कार के अपवाद की संवैधानिक वैधता पर विभाजित फैसला दिया था।
सर्वोच्च न्यायालय ने पहले कर्नाटक मामले की सुनवाई करने और उसके बाद अपवाद की संवैधानिकता को सीधे चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करने का निर्णय लिया है।
निष्कर्ष:
वैवाहिक बलात्कार पर बहस महिलाओं के अधिकारों, व्यक्तिगत स्वायत्तता, आपराधिक कानून और संवैधानिक शासन के एक जटिल संगम को दर्शाती है। सर्वोच्च न्यायालय की हालिया टिप्पणियाँ इस बात को रेखांकित करती हैं कि किसी कृत्य को हानिकारक मानना और किसी आपराधिक अपराध का निर्माण या उसका विस्तार करना अलग-अलग बातें हैं। अंतिम समाधान के लिए संवैधानिक अधिकारों, विधायी अधिकार-क्षेत्र, व्यक्तिगत गरिमा और विवाह की संस्था की सुरक्षा के बीच सावधानीपूर्वक संतुलन की आवश्यकता होगी।
