सन्दर्भ:
हाल ही में मध्य प्रदेश की चार जनजातीय फसलों, सिताही कुटकी, नागदमन कुटकी, बैगानी अरहर (डिंडोरी) और महाकोशल छत्रिया चावल (जबलपुर-कटनी) को भौगोलिक संकेतक (GI) टैग प्रदान किया गया। यह उपलब्धि सतत कृषि, जनजातीय आजीविका और जैव विविधता संरक्षण को बढ़ावा देने में GI संरक्षण की महत्त्वपूर्ण भूमिका को दर्शाती है।
भौगोलिक संकेतक (GI) टैग क्या है?
भौगोलिक संकेतक (Geographical Indication - GI) एक बौद्धिक संपदा अधिकार (Intellectual Property Right) है, जिसका उपयोग उन उत्पादों की पहचान के लिए किया जाता है जिनकी विशेष गुणवत्ता, प्रतिष्ठा या विशिष्ट विशेषताएँ उनके भौगोलिक क्षेत्र से जुड़ी होती हैं।
कानूनी ढाँचा
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- भौगोलिक संकेतक वस्तु (पंजीकरण एवं संरक्षण) अधिनियम, 1999 के अंतर्गत संचालित।
- यह अधिनियम वर्ष 2003 में लागू हुआ।
- इसका प्रशासन जीआई रजिस्ट्री, चेन्नई द्वारा किया जाता है।
- GI टैग की वैधता 10 वर्ष होती है, जिसे समय-समय पर नवीनीकृत (Renew) किया जा सकता है।
- भौगोलिक संकेतक वस्तु (पंजीकरण एवं संरक्षण) अधिनियम, 1999 के अंतर्गत संचालित।
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उद्देश्य
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- पारंपरिक ज्ञान का संरक्षण।
- अनधिकृत उपयोग को रोकना।
- ग्रामीण आजीविका को बढ़ावा देना।
- निर्यात क्षमता में वृद्धि करना।
- सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण।
- पारंपरिक ज्ञान का संरक्षण।
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मध्य प्रदेश की नई GI-टैग प्राप्त जनजातीय फसलें:
सिताही कुटकी एवं नागदमन कुटकी के बारे में:
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- ये लघु बाजरा (Little Millet) की पारंपरिक किस्में हैं।
- मुख्यतः डिंडोरी जिले में बैगा एवं गोंड जनजातियों द्वारा उगाई जाती हैं।
- प्राकृतिक रूप से जैविक (ऑर्गेनिक), सूखा-प्रतिरोधी तथा वर्षा आधारित कृषि के लिए उपयुक्त हैं।
- जलवायु परिवर्तन के प्रति अधिक अनुकूल (Climate Resilient) फसलें हैं।
- इनमें आहार रेशा (Dietary Fibre), जटिल कार्बोहाइड्रेट, लौह (Iron), पोटैशियम, मैग्नीशियम तथा एंटीऑक्सीडेंट प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं।
- इनका ग्लाइसेमिक इंडेक्स कम होता है, जिससे रक्त शर्करा नियंत्रण, पाचन तंत्र के स्वास्थ्य तथा पोषण सुरक्षा में लाभ मिलता है।
- ये लघु बाजरा (Little Millet) की पारंपरिक किस्में हैं।
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बैगानी अरहर के बारे में:
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- यह डिंडोरी की पारंपरिक अरहर (Pigeon Pea) की किस्म है।
- इसका गहरा संबंध बैगा जनजाति से है।
- इसकी खेती पूरी तरह पारंपरिक जनजातीय जैविक खेती पद्धति से की जाती है।
- यह 5–6 माह में तैयार हो जाती है।
- इसमें सामान्य व्यावसायिक किस्मों की तुलना में अधिक प्रोटीन, आहार रेशा, लौह, कैल्शियम तथा विटामिन-B कॉम्प्लेक्स पाए जाते हैं।
- इसका स्वाद प्राकृतिक रूप से मीठा होता है, जल्दी पकती है तथा पकने के बाद अधिक पोषक तत्व सुरक्षित रहते हैं।
- यह डिंडोरी की पारंपरिक अरहर (Pigeon Pea) की किस्म है।
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महाकोशल छत्रिया चावल बारे में:
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- यह पारंपरिक धान की किस्म महाकोशल क्षेत्र के जबलपुर एवं कटनी के उपजाऊ आर्द्र क्षेत्रों में उगाई जाती है।
- यह स्थानीय पर्यावरणीय परिस्थितियों के अनुकूल तथा मजबूत (Hardy) किस्म है।
- पॉलिश किए गए चावल के विपरीत इसमें पोषक तत्वों से भरपूर चोकर (Bran) सुरक्षित रहता है।
- इसमें विटामिन B1 (थायमिन), आवश्यक खनिज, स्वस्थ वसा तथा संतुलित अमीनो अम्ल पाए जाते हैं।
- यह आसानी से पचने वाला तथा अत्यधिक पौष्टिक खाद्यान्न है।
- यह पारंपरिक धान की किस्म महाकोशल क्षेत्र के जबलपुर एवं कटनी के उपजाऊ आर्द्र क्षेत्रों में उगाई जाती है।
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जनजातीय समुदायों के लिए GI टैग का महत्त्व:
आर्थिक लाभ
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- उत्पादों को प्रीमियम मूल्य प्राप्त होगा।
- बेहतर ब्रांडिंग होगी।
- निर्यात के नए अवसर मिलेंगे।
- किसानों की आय में वृद्धि होगी।
- उत्पादों को प्रीमियम मूल्य प्राप्त होगा।
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सामाजिक लाभ
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- जनजातीय पारंपरिक ज्ञान को मान्यता मिलेगी।
- स्वदेशी कृषि पद्धतियों का संरक्षण होगा।
- स्थानीय पहचान और सांस्कृतिक गौरव को बढ़ावा मिलेगा।
- जनजातीय पारंपरिक ज्ञान को मान्यता मिलेगी।
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कृषि संबंधी लाभ
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- देशी बीजों का संरक्षण होगा।
- जैविक खेती को प्रोत्साहन मिलेगा।
- जलवायु-अनुकूल कृषि को बढ़ावा मिलेगा।
- कृषि जैव विविधता का संरक्षण होगा।
- देशी बीजों का संरक्षण होगा।
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भारत के लिए महत्त्व:
मिलेट मिशन को समर्थन
यह GI मान्यता भारत के निम्न प्रयासों को मजबूत करती है—
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- पोषक अनाज (Nutri-Cereals) का प्रचार।
- जलवायु-स्मार्ट कृषि।
- सतत खाद्य प्रणाली का विकास।
- पोषक अनाज (Nutri-Cereals) का प्रचार।
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जनजातीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा
GI टैग से जनजातीय समुदायों द्वारा पारंपरिक रूप से उगाई जाने वाली फसलों को बेहतर बाजार उपलब्ध होगा।
पारंपरिक ज्ञान का संरक्षण
यह निम्न के संरक्षण को प्रोत्साहित करता है-
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- स्वदेशी बीज।
- पारंपरिक कृषि तकनीकें।
- सांस्कृतिक विरासत।
- स्वदेशी बीज।
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निर्यात क्षमता में वृद्धि
GI ब्रांडिंग से उपभोक्ताओं का विश्वास बढ़ता है तथा प्रामाणिक क्षेत्रीय उत्पादों की अंतरराष्ट्रीय मांग में वृद्धि होती है।
मध्य प्रदेश के अन्य प्रमुख GI-टैग प्राप्त उत्पाद:
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- कड़कनाथ चिकन
- रतलामी सेव
- शरबती गेहूँ
- चंदेरी वस्त्र (फैब्रिक)
- बाघ प्रिंट्स
- महेश्वरी साड़ी
- कड़कनाथ चिकन
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निष्कर्ष:
GI टैग केवल बौद्धिक संपदा अधिकार का संरक्षण नहीं है, बल्कि यह पारंपरिक कृषि विरासत के संरक्षण, जनजातीय समुदायों के सशक्तीकरण, जैव विविधता के संरक्षण तथा समावेशी ग्रामीण विकास का प्रभावी माध्यम भी है। मध्य प्रदेश की इन स्वदेशी जनजातीय फसलों को GI टैग मिलना इस बात का उत्कृष्ट उदाहरण है कि कानूनी संरक्षण किस प्रकार सतत आर्थिक विकास और सांस्कृतिक संरक्षण का सशक्त आधार बन सकता है।
