संदर्भ:
हाल ही में भारतीय प्राणी सर्वेक्षण (ZSI) के वैज्ञानिकों ने पूर्वी हिमालय क्षेत्र में डिप्लूरा (Diplura) की एक नई प्रजाति की खोज की है। यह भारतीय कीटविज्ञान (Entomology) के इतिहास में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा रही है। इस नई प्रजाति का नाम लेपिडोकैम्पा सिक्कीमेंसिस (Lepidocampa sikkimensis) रखा गया है। यह पहली बार है जब भारत में डिप्लूरा की किसी प्रजाति का वर्णन भारतीय शोध दल द्वारा किया गया है। यह प्रजाति 50 वर्षों से अधिक समय से रुके डिप्लूरा अनुसंधान को आगे बढ़ाती है और पारिस्थितिकी तंत्र की समझ के लिए महत्वपूर्ण है।
डिप्लूरा, जिन्हें सामान्यतः दो-प्रोंग वाले ब्रिसलटेल कहा जाता है, नेत्रहीन, पंखहीन और मिट्टी में रहने वाले षट्पाद (hexapod) आर्थ्रोपोड होते हैं। ये पोषक तत्त्वों के पुनर्चक्रण तथा मिट्टी की संरचना को सुरक्षित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
लेपिडोकैम्पा सिक्कीमेंसिस के बारे में
लेपिडोकैम्पा सिक्कीमेंसिस डिप्लूरा की एक नई खोजी गई प्रजाति है, जो सिक्किम के रावंगला (Ravangla) क्षेत्र के निकट पाई गई। यह एक आदिम षट्पाद (primitive hexapod) समूह से संबंधित है। इससे पहले भारत में डिप्लूरा की 17 प्रजातियाँ दर्ज की गई थीं, जिनका वर्णन विदेशी शोधकर्ताओं द्वारा किया गया था।
प्रमुख विशेषताएँ:
- रूपात्मक विशिष्टता (Morphological Distinctiveness):
इस प्रजाति की पहचान शरीर पर उपस्थित शल्कों (scales) की विशिष्ट व्यवस्था, ब्रिसल (chaetotaxy) के अनोखे पैटर्न तथा विशेष प्रकार के उपांगों (appendages) के आधार पर की गई है। ये विशेषताएँ इसे अन्य डिप्लूरा प्रजातियों से अलग करती हैं। - पारिस्थितिक भूमिका (Ecological Role):
अंधे एवं मिट्टी में रहने वाले षट्पाद होने के कारण डिप्लूरा मिट्टी के स्वास्थ्य को बनाए रखने में सहायक होते हैं। ये जैविक पदार्थों के अपघटन और पोषक तत्त्वों के पुनर्चक्रण में योगदान देते हैं तथा मिट्टी की संरचना को सुरक्षित रखते हैं।
भारतीय प्राणी सर्वेक्षण के बारे में:
1916 में स्थापित और कोलकाता में मुख्यालय स्थित भारतीय प्राणी सर्वेक्षण, पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अधीन एक प्रमुख संस्था है।
प्रमुख उद्देश्य:
- वर्गिकी अनुसंधान (Taxonomic Research):
प्रजातियों का वर्गीकरण एवं राष्ट्रीय प्राणी संग्रह का संरक्षण। - स्थिति सर्वेक्षण (Status Surveys):
लुप्तप्राय एवं संकटग्रस्त प्रजातियों की निगरानी। - पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA):
पारिस्थितिक तंत्रों एवं जैव विविधता प्रबंधन से संबंधित अध्ययन।
भारतीय प्राणी सर्वेक्षण, देशभर में 16 क्षेत्रीय केंद्र संचालित करता है और अपने अनुसंधान में डीएनए बारकोडिंग, GIS तथा स्कैनिंग इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी जैसी आधुनिक तकनीकों का उपयोग करता है। इसकी प्रमुख प्रकाशन श्रृंखला फौना ऑफ इंडिया तथा विभिन्न राज्य-स्तरीय जीव-जंतु रिपोर्टें हैं।
निष्कर्ष
यह खोज भारत में मृदा जीव (soil fauna) के अध्ययन को समृद्ध करती है, कम ज्ञात सूक्ष्म आर्थ्रोपोड के पारिस्थितिक महत्व को रेखांकित करती है तथा हिमालयी क्षेत्र में जैव विविधता संरक्षण की आधारशिला को और सुदृढ़ बनाती है।
