संदर्भ:
हाल ही में प्रकाशित लैंसेट आयोग की रिपोर्ट में भारत की स्वास्थ्य प्रणाली का व्यापक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार अब सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज – UHC) को प्राप्त करना संभव हो गया है, किंतु शासन व्यवस्था, स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता, समानता और जवाबदेही से संबंधित कई गंभीर कमियाँ अब भी बनी हुई हैं। यह रिपोर्ट नागरिकों के अधिकारों पर आधारित तथा नागरिक-केंद्रित दृष्टिकोण अपनाते हुए एक ऐसा मार्ग प्रस्तुत करती है, जिससे प्रत्येक भारतीय को सुलभ, किफायती और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएँ सुनिश्चित की जा सकें।
सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (यूएचसी) के बारे में:
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- सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (UHC) का तात्पर्य है कि सभी व्यक्ति और समुदाय बिना किसी आर्थिक कठिनाई के आवश्यक स्वास्थ्य सेवाएँ प्राप्त कर सकें। इसमें रोगों की रोकथाम, स्वास्थ्य संवर्धन, उपचार, पुनर्वास तथा जीवन के अंतिम चरण की देखभाल जैसी सभी सेवाएँ शामिल हैं। सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज समानता, गुणवत्ता, वहन-योग्यता और उपलब्धता पर विशेष जोर देता है, ताकि कोई भी व्यक्ति इलाज से वंचित न रहे और स्वास्थ्य व्यय के कारण गरीबी की ओर न चला जाए।
- सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज, सतत विकास लक्ष्य (एसडीजी) 3.8 का एक प्रमुख लक्ष्य है, जो “सबके लिए स्वास्थ्य” की वैश्विक प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
- भारत में सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज से संबंधित प्रमुख पहलों में आयुष्मान भारत–प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना, स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्र तथा ई-संजीवनी जैसे डिजिटल मंच शामिल हैं।
- सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (UHC) का तात्पर्य है कि सभी व्यक्ति और समुदाय बिना किसी आर्थिक कठिनाई के आवश्यक स्वास्थ्य सेवाएँ प्राप्त कर सकें। इसमें रोगों की रोकथाम, स्वास्थ्य संवर्धन, उपचार, पुनर्वास तथा जीवन के अंतिम चरण की देखभाल जैसी सभी सेवाएँ शामिल हैं। सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज समानता, गुणवत्ता, वहन-योग्यता और उपलब्धता पर विशेष जोर देता है, ताकि कोई भी व्यक्ति इलाज से वंचित न रहे और स्वास्थ्य व्यय के कारण गरीबी की ओर न चला जाए।
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रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष:
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- बाधाओं में परिवर्तन: पहले सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज की राह में अपर्याप्त वित्तीय संसाधन, राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी और कमजोर स्वास्थ्य अवसंरचना जैसी समस्याएँ प्रमुख थीं। वर्तमान में रिपोर्ट यह इंगित करती है कि मुख्य चुनौतियाँ असमान स्वास्थ्य गुणवत्ता, खंडित सेवा वितरण, संसाधनों का अप्रभावी उपयोग तथा कमजोर शासन तंत्र से जुड़ी हैं।
- अधिकार-आधारित और नागरिक-केंद्रित दृष्टिकोण: आयोग के अनुसार स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच को एक मौलिक नागरिक अधिकार के रूप में देखा जाना चाहिए। इसके अंतर्गत योजना निर्माण, सेवा वितरण और निगरानी में समुदाय की सक्रिय भागीदारी पर बल दिया गया है। साथ ही, स्वास्थ्य प्रणाली के प्रदर्शन से संबंधित आँकड़ों को सार्वजनिक करने की आवश्यकता बताई गई है, जिससे पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित हो सके।
- प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा की केंद्रीय भूमिका: रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज की आधारशिला मजबूत और व्यापक प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं पर टिकी होनी चाहिए। इससे महंगी तृतीयक स्वास्थ्य सेवाओं पर निर्भरता घटेगी तथा मधुमेह और मानसिक रोग जैसी दीर्घकालिक बीमारियों का बेहतर प्रबंधन संभव हो सकेगा।
- मानव संसाधन और समानता की खाइयाँ: यद्यपि डॉक्टरों, नर्सों और आशा कार्यकर्ताओं की संख्या में वृद्धि हुई है, फिर भी उनका असमान भौगोलिक वितरण, प्रशिक्षण की गुणवत्ता में अंतर तथा आशा कार्यकर्ताओं का स्वैच्छिक दर्जा प्रभावी सेवा वितरण में बाधा बना हुआ है।
- बाधाओं में परिवर्तन: पहले सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज की राह में अपर्याप्त वित्तीय संसाधन, राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी और कमजोर स्वास्थ्य अवसंरचना जैसी समस्याएँ प्रमुख थीं। वर्तमान में रिपोर्ट यह इंगित करती है कि मुख्य चुनौतियाँ असमान स्वास्थ्य गुणवत्ता, खंडित सेवा वितरण, संसाधनों का अप्रभावी उपयोग तथा कमजोर शासन तंत्र से जुड़ी हैं।
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मुख्य सिफारिशें:
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- सार्वजनिक व्यवस्था और वित्त पोषण को सुदृढ़ करना: सार्वजनिक वित्त पोषित और सार्वजनिक रूप से प्रदान की जाने वाली स्वास्थ्य सेवाओं को सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज की आधार संरचना बनाया जाए।
- एकीकृत सेवा प्रणाली: प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक स्वास्थ्य सेवाओं के बीच समन्वय और निरंतरता सुनिश्चित की जाए।
- समुदाय की भागीदारी: नागरिकों और स्थानीय स्वशासन संस्थाओं को योजना निर्माण तथा जवाबदेही सुनिश्चित करने में सक्रिय भूमिका प्रदान की जाए।
- आँकड़ों की पारदर्शिता: स्वास्थ्य प्रणाली के प्रदर्शन से संबंधित संकेतकों को सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराया जाए।
- मानव संसाधन सुधार: स्वास्थ्य कर्मियों की कमी, उनके असमान वितरण और प्रशिक्षण की गुणवत्ता से जुड़ी समस्याओं का समाधान किया जाए।
- आशा कार्यकर्ताओं को सशक्त बनाना: आशा कार्यकर्ताओं को औपचारिक स्वास्थ्य प्रणाली का अभिन्न अंग मानते हुए उन्हें मान्यता और नियमित दर्जा प्रदान किया जाए।
- सार्वजनिक व्यवस्था और वित्त पोषण को सुदृढ़ करना: सार्वजनिक वित्त पोषित और सार्वजनिक रूप से प्रदान की जाने वाली स्वास्थ्य सेवाओं को सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज की आधार संरचना बनाया जाए।
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महत्त्व:
यह रिपोर्ट भारत को निम्न और मध्यम आय वाले देशों के लिए सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज के एक संभावित आदर्श मॉडल के रूप में प्रस्तुत करती है। रिपोर्ट इस बात पर बल देती है कि सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज केवल एक तकनीकी सुधार नहीं है, बल्कि यह एक गंभीर राजनीतिक और संस्थागत चुनौती भी है, जिसके लिए सशक्त नेतृत्व, मजबूत जवाबदेही तंत्र और निरंतर नागरिक सहभागिता अनिवार्य है।
लैंसेट आयोग के बारे में:
वर्ष 2020 में गठित यह आयोग भारत और विदेशों के प्रमुख विशेषज्ञों को एक मंच पर लाता है, जिनमें हार्वर्ड मेडिकल स्कूल जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों के विद्वान भी शामिल हैं। आयोग के निष्कर्ष 29 राज्यों में 50,000 से अधिक परिवारों के सर्वेक्षण तथा व्यापक द्वितीयक आँकड़ों पर आधारित हैं। इसका उद्देश्य 2047 तक “विकसित भारत” के दृष्टिकोण के अनुरूप सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज को साकार करना है।
निष्कर्ष:
भारत ने स्वास्थ्य कवरेज के विस्तार की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति की है, किंतु स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता, समानता और जवाबदेही से संबंधित चुनौतियों का समाधान अभी शेष है। एक नागरिक-केंद्रित, अधिकार-आधारित और पारदर्शी स्वास्थ्य प्रणाली (जिसे मजबूत शासन व्यवस्था और सशक्त समुदायों का समर्थन प्राप्त हो) ही 2047 तक सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज को वास्तविकता में बदल सकती है।
