संदर्भ:
हाल ही में, केंद्रीय मंत्रिमंडल ने वर्ष 2026–27 से 2033–34 की अवधि के लिए 1,856.67 करोड़ रुपये के कुल वित्तीय परिव्यय के साथ खेलो इंडिया खेल सामग्री विनिर्माण योजना को मंजूरी दी है। इस योजना का उद्देश्य निवेश, नवाचार, कौशल विकास, गुणवत्ता प्रमाणन और निर्यात को बढ़ावा देकर भारत में विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धी खेल सामग्री विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र का विकास करना है। यह योजना मेक इन इंडिया, आत्मनिर्भर भारत, खेलो भारत नीति 2025 और विकसित भारत@2047 के दृष्टिकोण के उद्देश्यों के अनुरूप है।
पृष्ठभूमि:
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- भारत में खेल सामग्री का एक बड़ा घरेलू बाजार है। इसके साथ ही, देश में स्थापित विनिर्माण केंद्र और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (MSMEs) भी मौजूद हैं। हालाँकि, वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने के लिए उत्पादों की गुणवत्ता में सुधार, उन्नत विनिर्माण तकनीक, अनुसंधान क्षमताओं, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त प्रमाणन और मजबूत निर्यात नेटवर्क की आवश्यकता है।
- इस योजना का उद्देश्य पारंपरिक विनिर्माण से आगे बढ़कर एक एकीकृत पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करना है, जिसमें डिजाइन, अनुसंधान, उत्पादन, परीक्षण, कौशल विकास और अंतरराष्ट्रीय विपणन शामिल हों।
- भारत में खेल सामग्री का एक बड़ा घरेलू बाजार है। इसके साथ ही, देश में स्थापित विनिर्माण केंद्र और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (MSMEs) भी मौजूद हैं। हालाँकि, वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने के लिए उत्पादों की गुणवत्ता में सुधार, उन्नत विनिर्माण तकनीक, अनुसंधान क्षमताओं, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त प्रमाणन और मजबूत निर्यात नेटवर्क की आवश्यकता है।
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प्रमुख विशेषताएँ और वित्तीय आवंटन:
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- इस योजना के दो प्रमुख घटक हैं: विनिर्माण प्रोत्साहन और पारिस्थितिकी तंत्र का विकास। एंकर निवेश सहायता (Anchor Investment Support) और टर्नओवर-आधारित सहायता (Turnover Linked Support) के लिए कुल 1,130 करोड़ रुपये निर्धारित किए गए हैं।
- कम-से-कम 100 करोड़ रुपये का निवेश करने वाले एंकर निवेशकों को पूंजीगत व्यय पर 20% तक सहायता मिल सकती है, जबकि कम-से-कम 10 करोड़ रुपये का निवेश करने वाले पात्र विनिर्माताओं को टर्नओवर-आधारित 15% तक प्रोत्साहन मिल सकता है। अंतरराष्ट्रीय खेल महासंघों से प्रमाणन प्राप्त करने और उसका नवीनीकरण कराने के लिए अतिरिक्त 105 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं।
- इस योजना के दो प्रमुख घटक हैं: विनिर्माण प्रोत्साहन और पारिस्थितिकी तंत्र का विकास। एंकर निवेश सहायता (Anchor Investment Support) और टर्नओवर-आधारित सहायता (Turnover Linked Support) के लिए कुल 1,130 करोड़ रुपये निर्धारित किए गए हैं।
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खेल सामग्री विनिर्माण क्षेत्रों का विकास:
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- इस योजना के अंतर्गत समर्पित खेल सामग्री विनिर्माण क्षेत्र (SGMZs) विकसित करने की परिकल्पना की गई है। इसके तहत संभावित रूप से 300 एकड़ से अधिक क्षेत्रफल वाले चार एकीकृत विनिर्माण क्षेत्र विकसित किए जा सकते हैं। इन क्षेत्रों में विनिर्माताओं, आपूर्तिकर्ताओं, परीक्षण प्रयोगशालाओं, डिजाइन केंद्रों और सहायक उद्यमों को एक साथ लाया जाएगा।
- इनका विकास भाव्या योजना (BHAVYA Scheme) और राष्ट्रीय औद्योगिक गलियारा विकास निगम (NICDC) के औद्योगिक पार्कों के साथ समन्वय के माध्यम से किया जाएगा। इससे बुनियादी ढाँचे से जुड़ी बाधाएँ कम होंगी और आपूर्ति शृंखलाएँ मजबूत होंगी।
- इस योजना के अंतर्गत समर्पित खेल सामग्री विनिर्माण क्षेत्र (SGMZs) विकसित करने की परिकल्पना की गई है। इसके तहत संभावित रूप से 300 एकड़ से अधिक क्षेत्रफल वाले चार एकीकृत विनिर्माण क्षेत्र विकसित किए जा सकते हैं। इन क्षेत्रों में विनिर्माताओं, आपूर्तिकर्ताओं, परीक्षण प्रयोगशालाओं, डिजाइन केंद्रों और सहायक उद्यमों को एक साथ लाया जाएगा।
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MSMEs और मौजूदा विनिर्माण केंद्रों को मजबूत बनाना:
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- प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB) की पृष्ठभूमि सामग्री के अनुसार, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (MSMEs) खेल सामग्री के कुल उत्पादन में लगभग 90% योगदान देते हैं। पंजाब में जालंधर और उत्तर प्रदेश में मेरठ जैसे स्थापित विनिर्माण केंद्र इस क्षेत्र को पहले से ही औद्योगिक आधार प्रदान करते हैं।
- इस योजना के अंतर्गत उत्पादकता बढ़ाने और छोटे उद्यमों को समर्थन देने के लिए विनिर्माण केंद्रों का उन्नयन, साझा सुविधाओं का विकास और सामूहिक बुनियादी ढाँचे में सुधार प्रस्तावित है।
- प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB) की पृष्ठभूमि सामग्री के अनुसार, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (MSMEs) खेल सामग्री के कुल उत्पादन में लगभग 90% योगदान देते हैं। पंजाब में जालंधर और उत्तर प्रदेश में मेरठ जैसे स्थापित विनिर्माण केंद्र इस क्षेत्र को पहले से ही औद्योगिक आधार प्रदान करते हैं।
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अनुसंधान, नवाचार और कौशल विकास:
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- यह योजना प्रमुख शैक्षणिक एवं अनुसंधान संस्थानों में उत्कृष्टता केंद्र (Centres of Excellence) स्थापित करने को बढ़ावा देती है। इन केंद्रों में खेल उपकरणों, पदार्थ विज्ञान, सुरक्षा उपकरणों और उन्नत विनिर्माण तकनीकों से संबंधित अनुसंधान किया जाएगा। अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन (Anusandhan National Research Foundation) के माध्यम से अनुसंधान सहयोग को भी प्रोत्साहित किया जाएगा।
- DPIIT में पंजीकृत पात्र खेल स्टार्टअप को नवाचारी उत्पादों के विकास, परीक्षण और व्यावसायीकरण के लिए 20 लाख रुपये तक का अनुदान मिल सकता है। कौशल विकास संबंधी गतिविधियाँ कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय तथा उद्योग जगत के हितधारकों के सहयोग से संचालित की जाएँगी।
- यह योजना प्रमुख शैक्षणिक एवं अनुसंधान संस्थानों में उत्कृष्टता केंद्र (Centres of Excellence) स्थापित करने को बढ़ावा देती है। इन केंद्रों में खेल उपकरणों, पदार्थ विज्ञान, सुरक्षा उपकरणों और उन्नत विनिर्माण तकनीकों से संबंधित अनुसंधान किया जाएगा। अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन (Anusandhan National Research Foundation) के माध्यम से अनुसंधान सहयोग को भी प्रोत्साहित किया जाएगा।
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महत्त्व:
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- यह योजना घरेलू मूल्य संवर्धन बढ़ाकर, आयात पर निर्भरता कम करके और निजी निवेश आकर्षित करके मेक इन इंडिया तथा आत्मनिर्भर भारत के उद्देश्यों को आगे बढ़ा सकती है। इससे विशेष रूप से MSME केंद्रों में विनिर्माण, लॉजिस्टिक्स, डिजाइन और परीक्षण जैसे क्षेत्रों में रोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं।
- यह योजना गुणवत्तापूर्ण खेल उपकरणों तक पहुँच बढ़ाने और भारत के खेल पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने के लिए खेलो इंडिया, फिट इंडिया और खेलो भारत नीति 2025 की भी पूरक होगी।
- यह योजना घरेलू मूल्य संवर्धन बढ़ाकर, आयात पर निर्भरता कम करके और निजी निवेश आकर्षित करके मेक इन इंडिया तथा आत्मनिर्भर भारत के उद्देश्यों को आगे बढ़ा सकती है। इससे विशेष रूप से MSME केंद्रों में विनिर्माण, लॉजिस्टिक्स, डिजाइन और परीक्षण जैसे क्षेत्रों में रोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं।
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निष्कर्ष:
खेलो इंडिया खेल सामग्री विनिर्माण योजना का उद्देश्य खेल विकास को विनिर्माण-आधारित आर्थिक विकास से जोड़ना है। निवेश, अनुसंधान, कौशल, गुणवत्ता आश्वासन और निर्यात संवर्धन को एकीकृत करके यह योजना भारत में प्रतिस्पर्धी खेल सामग्री उद्योग विकसित करने तथा आत्मनिर्भर भारत और विकसित भारत@2047 के व्यापक उद्देश्यों को आगे बढ़ाने में मदद कर सकती है। इसकी सफलता प्रभावी कार्यान्वयन, नवाचार और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भारतीय विनिर्माताओं की प्रतिस्पर्धा करने की क्षमता पर निर्भर करेगी।

