संदर्भ:
29 जुलाई को अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस मनाया गया। यह दिवस वर्ष 2010 के सेंट पीटर्सबर्ग टाइगर शिखर सम्मेलन की स्मृति में मनाया जाता है, जहाँ 13 बाघ-आवास वाले देशों ने वर्ष 2022 तक विश्व के जंगली बाघों की संख्या दोगुनी करने के Tx2 लक्ष्य को अपनाया था। भारत, बाघ संरक्षण के क्षेत्र में वैश्विक अग्रणी के रूप में उभरा है, जहाँ विश्व के लगभग 70% जंगली बाघ पाए जाते हैं। यह वैज्ञानिक आधारित संरक्षण और मजबूत संस्थागत समर्थन की सफलता को दर्शाता है।
भारत में बाघ संरक्षण:
भारत की बाघ संरक्षण यात्रा को विश्व की सबसे महान वन्यजीव पुनर्प्राप्ति (Wildlife Recovery) कहानियों में से एक माना जाता है। ऑल इंडिया टाइगर एस्टीमेशन (AITE) 2022 के अनुसार, भारत में 3,682 जंगली बाघ हैं, जो वर्ष 2006 की तुलना में उनकी संख्या के दोगुने से भी अधिक हैं। इस सर्वेक्षण में 20 राज्यों और 6.41 लाख वर्ग किमी से अधिक क्षेत्र का सर्वेक्षण किया गया, जिससे यह विश्व का सबसे बड़ा वन्यजीव आकलन बन गया। यह सफलता निरंतर नीतिगत समर्थन, आवास संरक्षण, वैज्ञानिक निगरानी और समुदाय की सक्रिय भागीदारी का परिणाम है।
संस्थागत ढाँचा:
प्रोजेक्ट टाइगर:
वर्ष 1973 में प्रारंभ किया गया प्रोजेक्ट टाइगर, पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) की एक प्रमुख केंद्रीय प्रायोजित योजना है। यह बाघ-आवास वाले राज्यों को आवास संरक्षण, शिकार-रोधी उपायों तथा वैज्ञानिक प्रबंधन के लिए वित्तीय और तकनीकी सहायता प्रदान करता है। वर्तमान में भारत में 18 राज्यों में फैले 58 टाइगर रिजर्व हैं, जिनका कुल क्षेत्रफल लगभग 84,500 वर्ग किमी (भारत के भौगोलिक क्षेत्रफल का 2.56%) है।
राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण:
वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 (वर्ष 2006 के संशोधन द्वारा) के अंतर्गत स्थापित NTCA, प्रोजेक्ट टाइगर की देखरेख करता है, बाघ संरक्षण योजनाओं को स्वीकृति देता है, तकनीकी मार्गदर्शन प्रदान करता है तथा टाइगर रिजर्वों के प्रबंधन की निगरानी करता है। प्रत्येक टाइगर रिजर्व में संरक्षण और सतत आजीविका के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए कोर (महत्वपूर्ण बाघ आवास) तथा बफर क्षेत्र होना अनिवार्य है।
प्रौद्योगिकी आधारित संरक्षण:
भारत ने एक मजबूत वैज्ञानिक निगरानी प्रणाली विकसित की है। ऑल इंडिया टाइगर एस्टीमेशन (AITE), जिसे प्रत्येक चार वर्ष में NTCA और भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) द्वारा आयोजित किया जाता है, विश्व का सबसे बड़ा जैव विविधता सर्वेक्षण है। M-STrIPES, कैमरा ट्रैप, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence) तथा ExtractCompare जैसी तकनीकें बाघों की विशिष्ट धारियों के आधार पर उनकी पहचान कर निगरानी को अधिक प्रभावी बनाती हैं। मैनेजमेंट इफेक्टिवनेस इवैल्यूएशन (MEE) ढाँचा टाइगर रिजर्वों के प्रदर्शन का मूल्यांकन भी करता है।
वैश्विक नेतृत्व:
भारत इंटरनेशनल बिग कैट एलायंस (IBCA), जिसे वर्ष 2024 में स्वीकृति मिली, तथा ग्लोबल टाइगर फोरम (GTF), जो विश्व का एकमात्र अंतर-सरकारी संगठन है जो विशेष रूप से बाघ संरक्षण के लिए समर्पित है, के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देता है। भारत नेपाल और भूटान जैसे पड़ोसी देशों के साथ सीमापार संरक्षण (Transboundary Conservation) में भी सहयोग करता है तथा IUCN के इंटीग्रेटेड टाइगर हैबिटेट कंजर्वेशन प्रोग्राम (ITHCP) में भाग लेता है।
महत्त्व:
बाघ एक शीर्ष शिकारी (Apex Predator) तथा अम्ब्रेला प्रजाति (Umbrella Species) है, इसलिए यह पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने में अत्यंत महत्वपूर्ण है। बाघों के आवास का संरक्षण वनों, नदियों, जैव विविधता तथा पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं की सुरक्षा करता है और साथ ही जलवायु अनुकूलन, जल सुरक्षा तथा सतत विकास में भी योगदान देता है।
चुनौतियाँ:
उल्लेखनीय प्रगति के बावजूद, आवास विखंडन, मानव-वन्यजीव संघर्ष, अवैध शिकार, जलवायु परिवर्तन तथा आधारभूत संरचना के विस्तार जैसी चुनौतियाँ अभी भी बाघों की आबादी के लिए खतरा बनी हुई हैं। वन्यजीव गलियारों (Wildlife Corridors) के माध्यम से आवासीय संपर्क सुनिश्चित करना तथा समुदाय की भागीदारी को मजबूत बनाना प्रमुख प्राथमिकताएँ हैं।
निष्कर्ष:
भारत की बाघ संरक्षण में सफलता वैज्ञानिक आधारित नीतियों, मजबूत संस्थानों और समुदाय की भागीदारी की प्रभावशीलता को दर्शाती है। तकनीकी नवाचार और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को अपनाकर भारत बाघों तथा जैव विविधता के सुरक्षित भविष्य के लिए वैश्विक प्रयासों का नेतृत्व करता रहेगा।

