संदर्भ:
हाल के समय में, अस्थायी अमेरिकी प्रतिबंध छूट (Sanctions Waiver) की अवधि समाप्त होने के बावजूद जून 2026 में रूस से भारत का कच्चे तेल (Crude Oil) आयात अब तक के सर्वाधिक स्तर पर पहुँचने की संभावना है।
पृष्ठभूमि:
भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक है और अपनी कच्चे तेल की आवश्यकताओं का 85% से अधिक आयात करता है। वर्ष 2022 के बाद से रूस भारत का सबसे बड़ा कच्चे तेल आपूर्तिकर्ता बनकर उभरा है। जून 2026 में रूस से तेल आयात रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गया, जो भारत के कुल कच्चे तेल आयात का आधे से अधिक हिस्सा था। यह भारत की ऊर्जा टोकरी (Energy Basket) में रूसी कच्चे तेल के बढ़ते महत्व को दर्शाता है।
प्रमुख बिंदु:
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- रूस से रिकॉर्ड आयात
- जून 2026 के दौरान भारत का रूसी कच्चे तेल का आयात औसतन लगभग 26 लाख बैरल प्रतिदिन (bpd) रहा।
- इस अवधि में भारत के कुल कच्चे तेल आयात में रूसी तेल की हिस्सेदारी 53.5% रही।
- पूरे महीने का आयात 23.5 लाख बैरल प्रतिदिन से अधिक रहने का अनुमान है, जो मई 2023 में दर्ज 22 लाख बैरल प्रतिदिन के पिछले रिकॉर्ड को पार कर सकता है।
- जून 2026 के दौरान भारत का रूसी कच्चे तेल का आयात औसतन लगभग 26 लाख बैरल प्रतिदिन (bpd) रहा।
- रूस से रिकॉर्ड आयात
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रूसी कच्चे तेल पर भारत की बढ़ती निर्भरता के कारण:
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- आकर्षक मूल्य छूट (Attractive Price Discounts): यूक्रेन संघर्ष के बाद रूस पर पश्चिमी प्रतिबंध लगाए जाने के पश्चात मॉस्को ने अपने कच्चे तेल पर पर्याप्त छूट प्रदान की। भारतीय रिफाइनरियों ने इन कम कीमतों का लाभ उठाते हुए आयात लागत को कम किया तथा रिफाइनिंग मार्जिन में सुधार किया। वर्ष 2026 में भी रियायती रूसी तेल अन्य वैश्विक मानकों (Benchmarks) की तुलना में आर्थिक रूप से प्रतिस्पर्धी बना हुआ है।
- ऊर्जा सुरक्षा और आपूर्ति की विश्वसनीयता: भारत की प्रमुख चिंता निर्बाध ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित करना है। रूसी कच्चा तेल एक विश्वसनीय "बेस-लोड" स्रोत के रूप में उभरा है, जो विशेषकर वैश्विक अनिश्चितता के दौर में बड़े पैमाने पर मांग को लगातार पूरा करने में सक्षम है।
- पश्चिम एशियाई आपूर्ति में व्यवधान: वर्ष 2026 में पश्चिम एशिया में संघर्ष तथा होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के आसपास उत्पन्न व्यवधानों ने इराक जैसे पारंपरिक आपूर्तिकर्ताओं से तेल आपूर्ति को प्रभावित किया। चूँकि भारत के तेल आयात का एक बड़ा हिस्सा सामान्यतः होर्मुज़ मार्ग से होकर आता है, इसलिए भारतीय रिफाइनरियों ने आपूर्ति जोखिम कम करने के लिए रूस तथा अन्य गैर-होर्मुज़ स्रोतों की ओर रुख किया।
- रिफाइनरी अनुकूलता और स्थापित व्यापार नेटवर्क: भारतीय रिफाइनरियों ने रूसी कच्चे तेल के प्रसंस्करण के लिए अपने बुनियादी ढाँचे और खरीद प्रणालियों को अनुकूलित कर लिया है। दीर्घकालिक अनुबंधों, स्थापित शिपिंग व्यवस्थाओं और भुगतान तंत्रों ने इस संबंध को और मजबूत बनाया है।
- आयात स्रोतों का विविधीकरण: भारत रूसी कच्चे तेल को व्यापक विविधीकरण रणनीति का हिस्सा मानता है। रूस से खरीद बढ़ाने के साथ-साथ उसने संयुक्त अरब अमीरात (UAE), वेनेज़ुएला, अफ्रीका और अमेरिका महाद्वीप से भी आयात बढ़ाया है, ताकि किसी एक क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता से बचा जा सके।
- आकर्षक मूल्य छूट (Attractive Price Discounts): यूक्रेन संघर्ष के बाद रूस पर पश्चिमी प्रतिबंध लगाए जाने के पश्चात मॉस्को ने अपने कच्चे तेल पर पर्याप्त छूट प्रदान की। भारतीय रिफाइनरियों ने इन कम कीमतों का लाभ उठाते हुए आयात लागत को कम किया तथा रिफाइनिंग मार्जिन में सुधार किया। वर्ष 2026 में भी रियायती रूसी तेल अन्य वैश्विक मानकों (Benchmarks) की तुलना में आर्थिक रूप से प्रतिस्पर्धी बना हुआ है।
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चुनौतियाँ:
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- रूस पर पश्चिमी प्रतिबंधों के और कठोर होने की संभावना।
- संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोपीय साझेदारों का कूटनीतिक दबाव।
- सीमित संख्या में आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भरता।
- वैश्विक शिपिंग और बीमा बाजारों में अस्थिरता।
- पूर्वी यूरोप और पश्चिम एशिया दोनों क्षेत्रों में भू-राजनीतिक जोखिम।
- रूस पर पश्चिमी प्रतिबंधों के और कठोर होने की संभावना।
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निष्कर्ष:
रूसी कच्चे तेल पर भारत की बढ़ती निर्भरता यह दर्शाती है कि उसकी प्राथमिकता सस्ती और सुरक्षित ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित करना है। हालांकि, ऊर्जा सुरक्षा और भू-राजनीतिक दबावों के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए आयात स्रोतों का निरंतर विविधीकरण, रणनीतिक पेट्रोलियम भंडारों का विस्तार तथा नवीकरणीय ऊर्जा में अधिक निवेश आवश्यक होगा।
