संदर्भ:
हाल ही में ट्रांसयूनियन सिबिल की रिपोर्ट "अनलॉकिंग एक्सेस: जर्नी ऑफ क्रेडिट एक्सपैंशन इन इंडिया" के अनुसार बढ़ता उपभोक्ता ऋण, उधारकर्ताओं की वृद्धि की धीमी गति तथा पहली बार ऋण लेने वालों की घटती संख्या, सतत ऋण वृद्धि के समक्ष चुनौतियाँ प्रस्तुत करती हैं।
औपचारिक ऋण क्या है?
औपचारिक ऋण से आशय उन ऋणों से है, जो भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) के पर्यवेक्षण में कार्य करने वाले विनियमित वित्तीय संस्थानों, जैसे बैंक, गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियाँ (एनबीएफसी), सहकारी बैंक तथा सूक्ष्म वित्त संस्थानों द्वारा प्रदान किए जाते हैं। इसकी प्रमुख विशेषताएँ हैं-
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- पारदर्शी ब्याज दरें तथा विधिक संरक्षण।
- सिबिल एवं अन्य ऋण सूचना संस्थाओं के माध्यम से ऋण इतिहास का निर्माण।
- उपभोक्ताओं को बेहतर संरक्षण तथा अधिक एवं किफायती ऋण की उपलब्धता।
- अत्यधिक ब्याज वसूलने वाले अनौपचारिक साहूकारों पर निर्भरता में कमी।
- पारदर्शी ब्याज दरें तथा विधिक संरक्षण।
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प्रमुख निष्कर्ष:
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- बढ़ता ऋण भार: अत्यधिक ऋणग्रस्त उधारकर्ताओं की संख्या वित्त वर्ष 2017 में 5% से बढ़कर वित्त वर्ष 2024 में 18% हो गई, जो वित्त वर्ष 2026 में घटकर 15% रह गई। इसका सर्वाधिक प्रभाव युवा उपभोक्ताओं पर देखा गया।
- उधारकर्ताओं की वृद्धि में मंदी: ऋण लेने वाले सक्रिय उपभोक्ताओं की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर 2017–19 के 14% से घटकर 2024–26 में 9% रह गई, जिससे संकेत मिलता है कि वित्तीय समावेशन की प्रारंभिक उपलब्धियाँ अब स्थिर होने लगी हैं।
- पहली बार ऋण लेने वालों में कमी: नए ऋणधारकों का अनुपात 2017 में 32% से घटकर 2026 में 13% रह गया, जिससे स्पष्ट होता है कि ऋणदाता अब बार-बार ऋण लेने वाले ग्राहकों पर अधिक निर्भर हो रहे हैं।
- ऋण लेने की प्रवृत्ति में परिवर्तन: व्यक्तिगत ऋण एवं क्रेडिट कार्ड सहित उपभोग संबंधी ऋण का अनुपात 34% से बढ़कर 51% हो गया, जो परिसंपत्ति-आधारित ऋण से जीवनशैली-आधारित ऋण की ओर परिवर्तन को दर्शाता है।
- वाणिज्यिक ऋण संबंधी चिंता: वाणिज्यिक ऋण में भागीदारी में कमी आई है, जिससे संकेत मिलता है कि अनेक सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम अब भी औपचारिक ऋण व्यवस्था से बाहर हैं।
- क्षेत्रीय विस्तार: उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश तथा बिहार जैसे राज्यों में ऋण वृद्धि की गति महाराष्ट्र और तमिलनाडु जैसे पारंपरिक अग्रणी राज्यों की तुलना में अधिक रही है।
- बढ़ता ऋण भार: अत्यधिक ऋणग्रस्त उधारकर्ताओं की संख्या वित्त वर्ष 2017 में 5% से बढ़कर वित्त वर्ष 2024 में 18% हो गई, जो वित्त वर्ष 2026 में घटकर 15% रह गई। इसका सर्वाधिक प्रभाव युवा उपभोक्ताओं पर देखा गया।
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चुनौतियाँ:
घरेलू ऋण एवं ऋण चूक के जोखिम में वृद्धि।
वित्तीय समावेशन की गति में कमी।
सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों के लिए औपचारिक ऋण तक सीमित पहुँच।
असुरक्षित उपभोक्ता ऋण पर बढ़ती निर्भरता।
औपचारिक ऋण के विस्तार के कारण:
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- डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना: आधार, यूपीआई, इंडिया स्टैक तथा ई-केवाईसी ने ग्राहकों के पंजीकरण की प्रक्रिया को सरल बनाया।
- वित्तीय समावेशन: प्रधानमंत्री जन धन योजना ने बैंकिंग सेवाओं तक पहुँच का विस्तार किया।
- वित्तीय प्रौद्योगिकी का विकास: डिजिटल ऋण मंचों ने ऋण की उपलब्धता को आसान बनाया।
- सरकारी योजनाएँ: मुद्रा, स्टैंड-अप इंडिया तथा सीजीटीएमएसई ने उद्यमियों एवं सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों के लिए ऋण को बढ़ावा दिया।
- बेहतर ऋण सूचना प्रणाली: ऋण सूचना संस्थाओं तथा अकाउंट एग्रीगेटर व्यवस्था ने जोखिम मूल्यांकन को अधिक प्रभावी बनाया।
- डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना: आधार, यूपीआई, इंडिया स्टैक तथा ई-केवाईसी ने ग्राहकों के पंजीकरण की प्रक्रिया को सरल बनाया।
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आगे की राह:
भारत को उत्तरदायी ऋण वितरण को बढ़ावा देना चाहिए, ऋण मूल्यांकन को सुदृढ़ बनाना चाहिए, वित्तीय साक्षरता में सुधार करना चाहिए, पहली बार ऋण लेने वालों एवं सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों तक औपचारिक ऋण का विस्तार करना चाहिए तथा समावेशी ऋण वृद्धि को बनाए रखते हुए वित्तीय स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी नियामकीय निगरानी स्थापित करनी चाहिए।
निष्कर्ष:
भारत में ऋण विस्तार के अगले चरण का उद्देश्य केवल उधारकर्ताओं की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि उत्तरदायी, समावेशी तथा सतत ऋण वृद्धि सुनिश्चित करना होना चाहिए, जिससे वित्तीय समावेशन और विवेकपूर्ण जोखिम प्रबंधन के बीच संतुलन बना रहे।
