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Blog / 16 Jun 2026

भारतीय प्रधानमंत्री की स्लोवाकिया यात्रा

चर्चा में क्यों?
हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 जून 2026 को स्लोवाक गणराज्य की राजकीय यात्रा की। यह 1993 में स्लोवाकिया की स्वतंत्रता के बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री की पहली यात्रा थी। इस यात्रा के दौरान दोनों देशों ने अपने द्विपक्षीय संबंधों को उन्नत करते हुए उन्हें "व्यापक साझेदारी (Comprehensive Partnership)" के स्तर तक पहुंचाया।

यात्रा के प्रमुख परिणाम :

भारत और स्लोवाकिया ने अपने द्विपक्षीय संबंधों को व्यापक साझेदारी में परिवर्तित किया, जिसका उद्देश्य राजनीतिक, आर्थिक, रक्षा, तकनीकी, शैक्षिक, सांस्कृतिक तथा बहुपक्षीय क्षेत्रों में सहयोग को और गहरा करना है।

  • दोनों देशों ने श्रम प्रवासन, रक्षा सहयोग, डिजिटल प्रौद्योगिकी, उच्च शिक्षा एवं अनुसंधान, ऑडियो-विजुअल सृजन, क्वांटम संचार, महत्वपूर्ण अवसंरचना सुरक्षा, पर्यटन, वैज्ञानिक सहयोग तथा कांसुलर मामलों से संबंधित 11 समझौतों/एमओयू (MoUs) पर हस्ताक्षर किए।
  • दोनों पक्षों ने कोसिसे तकनीकी विश्वविद्यालय (Technical University of Kosice) में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence) पर पहला ICCR चेयर स्थापित करने का निर्णय लिया तथा आईआईटी दिल्ली (IIT Delhi) और स्लोवाक तकनीकी विश्वविद्यालय के बीच शैक्षणिक सहयोग को बढ़ावा दिया।
  • राजनीतिक एवं सुरक्षा क्षेत्र में स्लोवाकिया ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में सुधार के बाद भारत की स्थायी सदस्यता तथा न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप (NSG) में भारत की सदस्यता का समर्थन दोहराया।
  • दोनों देशों ने आतंकवाद-रोधी सहयोग को मजबूत करने हेतु संयुक्त कार्य समूह (Joint Working Group on Counter-Terrorism) के माध्यम से सहयोग बढ़ाने पर सहमति व्यक्त की तथा अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद पर व्यापक अभिसमय (Comprehensive Convention on International Terrorism - CCIT) को शीघ्र अपनाने का समर्थन किया।
  • दोनों पक्षों ने व्यापार, निवेश, ऊर्जा, संपर्क (Connectivity), उभरती प्रौद्योगिकियों, अंतरिक्ष, स्वास्थ्य सेवा, जल प्रबंधन तथा आपदा सहनशीलता के क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई।
  • विशेष रूप से कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), सेमीकंडक्टर, 5G/6G प्रौद्योगिकी, हरित ऊर्जा, ऑटोमोबाइल एवं रेलवे क्षेत्रों में सहयोग पर बल दिया गया। साथ ही पर्यटन, सांस्कृतिक आदान-प्रदान तथा लोगों के बीच संपर्क को बढ़ावा देने का भी निर्णय लिया गया।

भारत के लिए महत्व:

1. रणनीतिक महत्व

  • मध्य एवं पूर्वी यूरोप (Central and Eastern Europe) में भारत की भागीदारी को और मजबूत करेगा।
  • वैश्विक शासन संस्थाओं में भारत की आकांक्षाओं के लिए समर्थन का विस्तार करेगा।

2. आर्थिक महत्व

  • स्लोवाकिया के उन्नत औद्योगिक एवं ऑटोमोबाइल तंत्र तक भारत की पहुंच बढ़ेगी।
  • व्यापार, विनिर्माण तथा निवेश के नए अवसर उत्पन्न होंगे।

3. तकनीकी महत्व

  • कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्वांटम प्रौद्योगिकी, साइबर सुरक्षा, सेमीकंडक्टर तथा डिजिटल नवाचार के क्षेत्रों में सहयोग को मजबूती मिलेगी।

4. सुरक्षा महत्व

  • रक्षा सहयोग तथा आतंकवाद-रोधी साझेदारी को सुदृढ़ करेगा।

भारतस्लोवाकिया द्विपक्षीय संबंध-

  • स्लोवाकिया की स्वतंत्रता के बाद वर्ष 1993 में भारत और स्लोवाकिया के बीच राजनयिक संबंध स्थापित हुए।
  • दोनों देशों के संबंध मैत्रीपूर्ण रहे हैं और इन्हें नियमित विदेश कार्यालय परामर्श (Foreign Office Consultations - FOC), उच्च स्तरीय यात्राओं तथा बढ़ती राजनीतिक सहभागिता का समर्थन प्राप्त है।
  • राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु की वर्ष 2025 की यात्रा तथा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ऐतिहासिक वर्ष 2026 की यात्रा ने द्विपक्षीय संबंधों को और सशक्त बनाया है।
  • वर्ष 2024 में दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार 1.28 अरब यूरो से अधिक रहा। इसके प्रमुख क्षेत्र ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, औषधि तथा इंजीनियरिंग उत्पाद रहे हैं।
  • दोनों देश संयुक्त आर्थिक समिति (Joint Economic Committee - JEC) के माध्यम से सहयोग करते हैं तथा निवेश के क्षेत्र में भी प्रगति हुई है। भारतीय कंपनियाँ जैसे जगुआर लैंड रोवर (टाटा मोटर्स) और टीसीएस (TCS) स्लोवाकिया में सक्रिय हैं।
  • भारत और स्लोवाकिया के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान कार्यक्रम (2023–26) के अंतर्गत सक्रिय सांस्कृतिक सहयोग जारी है। योग, आयुर्वेद, भारतीय त्योहारों तथा उपनिषदों के स्लोवाक भाषा में अनुवाद ने सांस्कृतिक संबंधों को और मजबूत बनाया है।

निष्कर्ष:

भारतस्लोवाकिया व्यापक साझेदारी द्विपक्षीय संबंधों में एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। रक्षा, प्रौद्योगिकी, शिक्षा, व्यापार, नवाचार तथा जन-से-जन संपर्क के क्षेत्रों में सहयोग के माध्यम से यह साझेदारी मध्य यूरोप में भारत की भागीदारी के एक नए अध्याय की शुरुआत करती है तथा यूरोप में भारत की रणनीतिक उपस्थिति को और सुदृढ़ बनाती है।

 

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