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Blog / 30 Aug 2025

2025 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में भारतीय जीडीपी में वृद्धि

संदर्भ

वित्त वर्ष 2025–26 की पहली तिमाही (अप्रैलजून) में भारत की अर्थव्यवस्था 7.8% की दर से बढ़ी। यह दर भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के अनुमान और बाज़ार की उम्मीदों से भी अधिक रही। यह आँकड़े सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय (MoSPI) द्वारा जारी किए गए।

क्षेत्रवार प्रदर्शन:

·         सेवा क्षेत्र: वित्त वर्ष 2025–26 की पहली तिमाही में भारत की आर्थिक वृद्धि का नेतृत्व सेवा क्षेत्र ने किया। इसमें 9.3% की बढ़ोतरी दर्ज हुई, जो पिछले दो वर्षों में सबसे अधिक है। इसके अंतर्गत व्यापार, होटल, परिवहन और संचार में 8.6% की वृद्धि हुई, वित्तीय, अचल संपत्ति और पेशेवर सेवाओं में 9.5% की वृद्धि रही, जबकि लोक प्रशासन, रक्षा और अन्य सेवाओं में 9.8% की वृद्धि दर्ज की गई। इस क्षेत्र की मजबूत गति को एचएसबीसी सर्विसेज़ PMI से और बल मिला, जो अगस्त 2025 में 65.6 के रिकॉर्ड स्तर पर पहुँचा जो निरंतर आशावाद को दर्शाता है।

·         विनिर्माण और निर्माण क्षेत्र: विनिर्माण और निर्माण ने भी वृद्धि में अहम योगदान दिया। विनिर्माण में 7.7% और निर्माण में 7.6% की वृद्धि दर्ज हुई।

·         कृषि क्षेत्र: कृषि क्षेत्र में 3.7% की वृद्धि दर्ज की गई, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह दर केवल 1.5% थी। हालाँकि, मानसून की अनिश्चितता भविष्य के उत्पादन के लिए अब भी संभावित जोखिम बनी हुई है।

India's GDP Surges 7.8% in Q1 FY 2025-26, Experts React - The Raisina Hills

अन्य क्षेत्र और व्यय रुझान:

व्यय पक्ष पर, निजी अंतिम उपभोग व्यय (पीएफसीई) में 7% की वृद्धि हुई। यह पिछले वर्ष के 8.3% से थोड़ा कम है, लेकिन जनवरीमार्च की 6% की वृद्धि की तुलना में बेहतर है।

         सकल स्थिर पूंजी निर्माण (जीएफसीएफ) में 7.8% की वृद्धि दर्ज की गई, जो निवेश गतिविधियों की मजबूती को दर्शाता है। सरकारी अंतिम उपभोग व्यय (जीएफसीई) में 7.4% की बढ़त हुई, जो पिछली तिमाही में 1.8% की गिरावट से उबरकर आई।

         हालाँकि, भारी वर्षा के कारण खनन क्षेत्र में गिरावट दर्ज की गई और माँग में कमी से बिजली, गैस और जल आपूर्ति क्षेत्र की वृद्धि केवल 0.5% रही।

इस वृद्धि का महत्व:

         भारत की 7.8% जीडीपी वृद्धि दर वैश्विक चुनौतियों, विशेषकर अमेरिकी टैरिफ, के बावजूद मजबूत लचीलापन और व्यापक आर्थिक स्थिरता को दर्शाती है। यह वृद्धि विनिर्माण, सेवाओं और कृषि में अच्छे प्रदर्शन, मज़बूत घरेलू माँग और पूंजी निर्माण से प्रेरित रही।

         इस तेज़ी से घरेलू और विदेशी बाज़ारों में निवेशकों का विश्वास बढ़ा है और यह भारत के लिए सुधारों में तेजी लाने, निर्यात में विविधता लाने तथा दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था के रूप में अपनी स्थिति और मजबूत करने का एक उपयुक्त अवसर प्रस्तुत करता है।

उच्च जीडीपी वृद्धि के बावजूद चुनौतियाँ:

         अमेरिकी टैरिफ (50%)इससे भारतीय निर्यात प्रतिस्पर्धा पर असर पड़ सकता है और व्यापार संतुलन बिगड़ने की संभावना है।

         भूराजनीतिक तनावरूस जैसे देशों के साथ भारत के रणनीतिक संबंध वैश्विक व्यापारिक समीकरणों को प्रभावित कर सकते हैं।

         अनियमित मानसूनकृषि अब भी मानसून पर निर्भर है, बारिश में गड़बड़ी से ग्रामीण आय और खाद्य आपूर्ति प्रभावित हो सकती है।

         पर्यावरणीय जोखिमअत्यधिक मौसम की घटनाएँ खनन, निर्माण और बिजलीपानी जैसे क्षेत्रों को नुकसान पहुँचा सकती हैं।

         सिर्फ 8.8% नाममात्र वृद्धियह दर्शाता है कि महँगाई दर कम है, जिससे सरकारी राजस्व और कंपनियों की कमाई पर दबाव पड़ सकता है।

         खनन और उपयोगिता क्षेत्र की कमजोरीइन क्षेत्रों न्यूनतम वृद्धि देखी गई, जिससे समग्र औद्योगिक प्रदर्शन कमजोर हो रहा है।

         अनौपचारिक क्षेत्र की चुनौतियाँबड़ी संख्या में लोग अब भी कम उत्पादकता वाली नौकरियों पर निर्भर हैं।

         रोज़गार और कौशल असंतुलननए रोज़गार अवसरों और कामगारों के कौशल के बीच तालमेल की कमी बनी हुई है।

निष्कर्ष:

भारत को तेज़ आर्थिक वृद्धि बनाए रखने के लिए सुधारों की गति को निरंतर जारी रखना होगा। निजी निवेश को प्रोत्साहित करना और घरेलू खपत को मज़बूत बनाए रखना इसकी प्राथमिक ज़रूरत है। साथ ही, अमेरिका पर अत्यधिक निर्भरता घटाकर भारत को आसियान, ईएफटीए और अफ्रीकी देशों जैसे नए बाज़ारों के साथ व्यापारिक संबंधों का विस्तार करना चाहिए। भारतीय रिज़र्व बैंक को भी सतर्क रहना होगा ताकि विकास और महँगाई के बीच संतुलन बना रहे और वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच देश की व्यापक आर्थिक स्थिरता सुरक्षित रह सके।

 

 

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