सन्दर्भ:
आर्द्रभूमियाँ केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं हैं बल्कि शांति, सुरक्षा, आजीविका, जल और भोजन से जुड़े राष्ट्रीय हितों का मूल आधार हैं। हाल ही में 2 फ़रवरी 2026 (विश्व आर्द्रभूमि दिवस) को पटना बर्ड सैंक्चुअरी (उत्तर प्रदेश) और छरी-धांड (गुजरात) को रामसर कन्वेंशन के तहत अंतर्राष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमियाँ के रूप में नामित किया है, जिससे देश के रामसर स्थलों की संख्या अब 98 तक पहुंच गई है। यह मान्यता भारत की पर्यावरणीय प्रतिबद्धता और संरक्षण की रणनीतिक सोच का संकेत है।
आर्द्रभूमि:
आर्द्रभूमियाँ जिनमें दलदल, झीलें, नदी के किनारों के बड़े तालाब, तटीय मैंग्रोव्स, गहरी और उथली जल संरचनाएँ शामिल हैं, ये केवल स्थिर जल के भंडार नहीं हैं, ये जटिल पारिस्थितिक तंत्र हैं जो जैव विविधता, जल चक्र, मिट्टी संरचना, जलाशय भंडारण, और प्राकृतिक आपदा सीमांकन (फ्लड कंट्रोल) जैसी कई समग्र सेवाएं प्रदान करते हैं।
रामसर कन्वेंशन के अनुसार “आर्द्रभूमियाँ वे क्षेत्र हैं जो प्राकृतिक या कृत्रिम रूप से, स्थायी या अस्थायी रूप से, जल से आच्छादित या संतृप्त रहते हैं, जिनमें स्थिर या प्रवाहित, मीठा, खारा या लवणीय जल शामिल हो सकता है और जिनकी गहराई निम्न ज्वार (Low Tide) के समय छह मीटर से अधिक न हो।”
आर्द्रभूमियों के प्रकार
1. मीठे पानी की आर्द्रभूमि – झीलें, तालाब, नदी तटीय क्षेत्र
2. दलदली क्षेत्र
3. तटीय आर्द्रभूमियाँ – मैंग्रोव, लैगून
4. कृत्रिम आर्द्रभूमियाँ – जलाशय, सिंचाई तालाब, मछली पालन क्षेत्र
आर्द्रभूमि की अवधारणा व्यापक है और यह प्राकृतिक एवं मानव-निर्मित दोनों संरचनाओं को समाहित करती है।
आर्द्रभूमि का महत्त्व
1. पारिस्थितिक महत्त्व
(क) जैव विविधता का संरक्षण
आर्द्रभूमियाँ अनेक प्रवासी पक्षियों, मछलियों, उभयचरों और वन्यजीवों का निवास स्थान हैं। उदाहरण के लिए, चिलिका झील एशिया की सबसे बड़ी खारे पानी की झीलों में से एक है और प्रवासी पक्षियों का प्रमुख आश्रय स्थल है।
(ख) जल चक्र में योगदान
आर्द्रभूमियाँ वर्षा जल को संचित कर भूजल पुनर्भरण (Groundwater Recharge) में सहायक होती हैं।
(ग) जल शुद्धिकरण
ये प्राकृतिक फिल्टर की तरह कार्य करती हैं और जल से प्रदूषक तत्वों को अवशोषित करती हैं।
2. आर्थिक महत्त्व
· मत्स्य पालन से आय
· पर्यटन और पक्षी अवलोकन
· कृषि के लिए जल उपलब्धता
· प्राकृतिक आपदाओं से बचाई गई लागत
स्वस्थ आर्द्रभूमियाँ स्थानीय अर्थव्यवस्था को स्थिरता प्रदान करती हैं।
3. सामाजिक और सांस्कृतिक महत्त्व
· स्थानीय समुदायों की आजीविका का आधार
· पारंपरिक ज्ञान और जीवन-शैली से जुड़ाव
· धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व
उदाहरणस्वरूप, अनेक झीलें और सरोवर धार्मिक आयोजनों से जुड़े होते हैं।
4. आपदा प्रबंधन में भूमिका
· बाढ़ नियंत्रण
· चक्रवात से सुरक्षा (विशेषकर तटीय मैंग्रोव)
· सूखे की स्थिति में जल भंडारण
इस प्रकार आर्द्रभूमियाँ प्राकृतिक आपदा-नियंत्रण तंत्र के रूप में कार्य करती हैं।
5. जलवायु परिवर्तन में योगदान
· कार्बन अवशोषण
· तापमान संतुलन
· पारिस्थितिक स्थिरता
आर्द्रभूमियाँ जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
भारत में रामसर स्थल का नामांकन:
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- भारत ने 1 फ़रवरी 1982 को रामसर कन्वेंशन पर हस्ताक्षर किया। भारत में आर्द्रभूमियों के संरक्षण हेतु आर्द्रभूमि (संरक्षण और प्रबंधन) नियम लागू हैं। इन नियमों के अंतर्गत राज्य स्तरीय प्राधिकरणों का गठन किया गया है, जो आर्द्रभूमियों की पहचान, संरक्षण और प्रबंधन सुनिश्चित करते हैं।
- रामसर स्थल का नामांकन राज्य सरकारों द्वारा पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) को प्रस्तावित करने से शुरू होता है। प्रस्तावों को 9 मानदंडों के तहत जांचा जाता है और स्वीकृत प्रस्तावों को रामसर साइट्स इंफॉर्मेशन सर्विस (RSIS) के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय रामसर सचिवालय को भेजा जाता है, जो 1982 से भारत के स्थलों को सूचीबद्ध करता है।
- भारत ने 1 फ़रवरी 1982 को रामसर कन्वेंशन पर हस्ताक्षर किया। भारत में आर्द्रभूमियों के संरक्षण हेतु आर्द्रभूमि (संरक्षण और प्रबंधन) नियम लागू हैं। इन नियमों के अंतर्गत राज्य स्तरीय प्राधिकरणों का गठन किया गया है, जो आर्द्रभूमियों की पहचान, संरक्षण और प्रबंधन सुनिश्चित करते हैं।
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नामांकन प्रक्रिया के मुख्य चरण:
· स्थानीय पहचान: राज्य वेटलैंड अथॉरिटी या संबंधित संस्थाएं विशिष्ट जैविक, पारिस्थितिक या जैव विविधता मानदंडों को पूरा करने वाली आर्द्रभूमि (wetland) की पहचान करती हैं।
· प्रस्ताव तैयार करना: राज्य सरकार एक विस्तृत प्रस्ताव (Ramsar Information Sheet - RIS) तैयार करती है।
· केन्द्रीय स्वीकृति: यह प्रस्ताव MoEFCC को भेजा जाता है, जहाँ एक विशेषज्ञ समिति इसकी जांच करती है।
· अंतरराष्ट्रीय नामांकन: केंद्रीय मंत्रालय के अनुमोदन के बाद, प्रस्ताव को स्विट्जरलैंड स्थित रामसर सचिवालय को भेजा जाता है।
· सूची में शामिल: रामसर सचिवालय द्वारा सत्यापन के बाद, स्थल को अंतरराष्ट्रीय रामसर स्थल की सूची में शामिल कर लिया जाता है।
महत्वपूर्ण मानदंड:
रामसर स्थल के रूप में चयन के लिए, वेटलैंड को अंतरराष्ट्रीय महत्व का होना चाहिए, जैसे कि:
· दुर्लभ या अनूठे पारिस्थितिक तंत्र होना।
· संकटग्रस्त प्रजातियों या जैविक विविधता का समर्थन करना।
· जलपक्षी (Waterfowl) की बड़ी आबादी को आश्रय देना।
प्रारंभ में रामसर स्थलों की संख्या बहुत कम थी, लेकिन 2014 से 2026 के बीच रामसर स्थलों की संख्या 26 से बढ़कर 98 हो गई है, जो संरक्षण प्रयासों में उल्लेखनीय वृद्धि का संकेत है।
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- नए शामिल किए गए स्थल-
पटना बर्ड सैंक्चुअरी (उत्तर प्रदेश): यह लगभग 108 हेक्टेयर में फैला एक मध्यम आकार का तालाब है जो हर सर्दी में सैंकड़ों प्रवासी और स्थानीय पक्षियों का आश्रय बनता है।
छरी-धांड (गुजरात): यह एक मौसमी दलदली क्षेत्र है जो कच्छ के शुष्क परिदृश्य में जैव विविधता का जीवंत केंद्र है, जिसमें कई प्रवासी पक्षी और वन्यजीव पाए जाते हैं। - इन दोनों रामसर स्थलों का चयन यह स्पष्ट करता है कि आर्द्रभूमियाँ केवल बड़े या स्थायी जलाशयों तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि छोटे, मौसमी और मानव-परिस्थितिक संदर्भ वाले तंत्र भी वैश्विक मान्यता के योग्य हैं।
- नए शामिल किए गए स्थल-
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भारत की आर्द्रभूमि संरक्षण नीतियां:
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- आर्द्रभूमि (संरक्षण और प्रबंधन) नियम,2017 : आर्द्रभूमि संरक्षण में राज्य स्तरीय आर्द्रभूमि प्राधिकरणों और सामुदायिक भागीदारी को अनिवार्य बनाया गया है।
- राष्ट्रीय जलीय पारितंत्र संरक्षण योजना (एनपीसीए),2015 : जलीय पारिस्थितिकी तंत्रों की रक्षा के लिए राष्ट्रीय आर्द्रभूमि संरक्षण कार्यक्रम (एनडब्ल्यूसीपी) और राष्ट्रीय झील संरक्षण योजना (एनएलसीपी) को मिलाकर एक एकीकृत योजना।
- अमृत धरोहर क्षमता निर्माण योजना, 2023 : टिकाऊ प्रथाओं और पारंपरिक ज्ञान का उपयोग करके आर्द्रभूमि प्रबंधन को बढ़ाने के लिए सरकारी अधिकारियों, संरक्षणवादियों और स्थानीय समुदायों को प्रशिक्षित करती है ।
- राष्ट्रीय आर्द्रभूमि संरक्षण कार्यक्रम (एनडब्ल्यूसीपी), 1987 : राज्य स्तर पर आर्द्रभूमि के संरक्षण और पुनरुद्धार के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करता है।
- आर्द्रभूमि (संरक्षण और प्रबंधन) नियम,2017 : आर्द्रभूमि संरक्षण में राज्य स्तरीय आर्द्रभूमि प्राधिकरणों और सामुदायिक भागीदारी को अनिवार्य बनाया गया है।
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चुनौतियाँ:
हालाँकि रामसर नामांकनों की संख्या बढ़ रही है, फिर भी भारतीय पारिस्थितिक परिदृश्य में आर्द्रभूमियाँ कई गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही हैं:
1. तेजी से घटती आर्द्रभूमियाँ
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- पिछले तीन दशकों में भारत की लगभग 40% प्राकृतिक आर्द्रभूमियाँ नष्ट हो चुकी हैं।
- शेष आर्द्रभूमियों के लगभग आधे हिस्से में पारिस्थितिक गिरावट स्पष्ट रूप से दिखाई देती है, जो प्रदूषण, अविकसित भूमि उपयोग और जलवायु परिवर्तन के परिणाम हैं।
- पिछले तीन दशकों में भारत की लगभग 40% प्राकृतिक आर्द्रभूमियाँ नष्ट हो चुकी हैं।
2. प्रदूषण और अविकसित प्रवाह
अनुपचारित सीवेज, कृषि अपशिष्ट और औद्योगिक प्रदूषण आर्द्रभूमियों की स्वच्छता, जैव विविधता और जल-गुण को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहे हैं।
3. विकास दबाव और भूमि परिवर्तन
शहरी विस्तार, अवैध अतिक्रमण, अविकसित अवसंरचना जैसे मार्ग, बांध और फ्लड कंट्रोल संरचनाएँ प्राकृतिक जल प्रवाह को बाधित कर रही हैं, जिससे आर्द्रभूमियाँ अपने मूल कार्य नहीं कर पा रही हैं।
इन चुनौतियों के बीच रामसर नामांकन केवल एक औपचारिक मान्यता है लेकिन सतत संरक्षण और संवर्धन के लिए यह पर्याप्त नहीं है। नियंत्रण, निगरानी और सामुदायिक भागीदारी जैसे अनेक नियमों को प्रभावी रूप से कार्यान्वित करना आवश्यक है।
आगे की राह:
भारत में रामसर नामांकन के बावजूद संरक्षण के लिए अभी कई व्यवस्थित सुधारों की आवश्यकता है, जैसे:
1. स्पष्ट मानचित्रण और सार्वजनिक डेटा
आर्द्रभूमियों की सीमाएँ स्पष्ट रूप से मानचित्रित होनी चाहिए और यह जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध होनी चाहिए ताकि किसी भी अवैध भूमि परिवर्तन को रोका जा सके।
2. सामुदायिक भागीदारी और पारंपरिक ज्ञान की भूमिका
स्थानीय समुदायों, किसानों, मछुआरों और पारंपरिक प्रथाओं को संरक्षण में जोड़ा जाना चाहिए। इससे स्थानीय निगरानी, नवाचार और दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित होगी।
3. विज्ञान-आधारित प्रबंधन और अनुसंधान
जीव विविधता, जल-गुणवत्ता और जल स्तर जैसी नियमित निगरानी आवश्यक है ताकि तंत्र की स्वास्थ्य स्थिति का वस्तुनिष्ठ आंकलन हो सके।
निष्कर्ष
भारत में आर्द्रभूमियों के रामसर नामांकन जैसी उपलब्धियाँ महत्त्वपूर्ण हैं। आर्द्रभूमियों की रक्षा करना केवल पर्यावरण संरक्षण का हिस्सा नहीं, बल्कि भारत की जल सुरक्षा, सामाजिक स्थिरता और आर्थिक विकास की नींव है। ये देश की वैश्विक प्रतिबद्धता और पारिस्थितिक जागरूकता को दर्शाती हैं।
आर्द्रभूमियों के संरक्षण की चुनौती केवल नामांकन तक सीमित नहीं है। यह एक दूरदर्शी, वैज्ञानिक, समन्वित और समाज-आधारित नीति-योजना की मांग करती है, जिसमें आर्द्रभूमियों को राष्ट्रीय सार्वजनिक संपदा के रूप में पुनर्परिभाषित किया जाना अनिवार्य है।
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UPSC/PCS मुख्य परीक्षा: भारत में आर्द्रभूमियों के बढ़ते रामसर नामांकन के बावजूद संरक्षण की चुनौतियाँ बनी हुई हैं। पारिस्थितिकी, राष्ट्रीय सुरक्षा और सतत विकास के संदर्भ में आर्द्रभूमि शासन (wetland governance) का समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिए। |

