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Blog / 29 Nov 2025

भारत–रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन

सन्दर्भ:

हाल ही में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन 4–5 दिसंबर 2025 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निमंत्रण पर भारत की आधिकारिक यात्रा करेंगे। यह उनकी 2021 के बाद पहली भारत यात्रा है और ऐसे समय में हो रही है जब वैश्विक भू-राजनीतिक परिस्थितियाँ तेजी से बदल रही हैं। यह शिखर सम्मेलन दोनों देशों को अपने "विशेष एवं विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी" की समीक्षा करने तथा रक्षा, ऊर्जा, व्यापार और वैश्विक मुद्दों पर आगे के सहयोग का खाका तय करने का अवसर देगा।

यात्रा का महत्व:

1. रणनीतिक एवं कूटनीतिक महत्व:

        • वैश्विक व्यवधानों के बाद यह पहली उच्च-स्तरीय द्विपक्षीय बैठक होगी।
        • भारत की स्वतंत्र, संतुलित और बहुध्रुवीय विदेश नीति को मजबूती देती है।
        • यह संकेत देता है कि भारत प्रमुख वैश्विक शक्तियों के साथ समान रूप से संवाद बनाए रख सकता है।

2. रक्षा सहयोग:

        • अतिरिक्त S-400 स्क्वॉड्रन और लंबित रक्षा डिलीवरी पर चर्चा संभव हो सकेगी।
        • संयुक्त उत्पादन, कल-पुर्जों की उपलब्धता और दीर्घकालीन रख-रखाव  पर सहयोग।
        • ब्रह्मोस, सुखोई, और टैंक उत्पादन जैसे क्षेत्रों में प्रगति पर समीक्षा।

3. ऊर्जा एवं आर्थिक सहयोग:

        • तेल, गैस, परमाणु ऊर्जा और नवीकरणीय ऊर्जा साझेदारी के विस्तार पर विचार।
        • व्यापार विविधीकरण, श्रमिक/कौशल गतिशीलता समझौतों पर चर्चा।
        • उर्वरकों और रियायती कच्चे तेल से जुड़ी आपूर्ति श्रृंखला की स्थिरता पर ध्यान।

4. भू-राजनीतिक संदर्भ:

        • यूक्रेन संघर्ष, इंडो-पैसिफिक, यूरेशिया सुरक्षा और बहुध्रुवीय व्यवस्था पर दृष्टिकोण साझा करना।
        • चीनरूस बढ़ते समीकरण के बीच भारत की चिंताओं का संतुलन बनाना।

India–Russia Annual Summit

शिखर सम्मेलन की प्रमुख चुनौतियाँ:

      • भारतरूस निकटता पर पश्चिमी देशों की प्रतिक्रियाओं का प्रबंधन।
      • रक्षा आयात पर अधिक निर्भरता को संतुलित कर विविधीकरण बनाए रखना।
      • रूसचीन साझेदारी के बीच भारत के रणनीतिक हितों की रक्षा।
      • व्यापार असंतुलन और संपर्क परियोजनाओं  की कठिनाइयाँ।

भारतरूस संबंध:

भारतरूस संबंध ऐतिहासिक, रणनीतिक और बहुआयामी हैं। रक्षा, ऊर्जा, व्यापार, विज्ञान-प्रौद्योगिकी और वैश्विक कूटनीति, सभी क्षेत्रों में दोनों देशों का घनिष्ठ सहयोग रहा है। वर्ष 2010 में इस साझेदारी को ‘विशेष और विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी’ (Special and Privileged Strategic Partnership) का दर्जा दिया गया।

मुख्य सहयोग क्षेत्र:

1. रक्षा (Defence)

        • रूस भारत का सबसे बड़ा रक्षा आपूर्तिकर्ता है।
        • प्रमुख प्लेटफॉर्म: S-400, ब्रह्मोस, सुखोई-30 MKI, T-90 टैंक।
        • संयुक्त उत्पादन, तकनीक हस्तांतरण और दीर्घकालीन लॉजिस्टिक सहयोग।

2. ऊर्जा:

        • रियायती रूसी कच्चा तेल और उर्वरकों की आपूर्ति।
        • परमाणु ऊर्जा में साझेदारी: कुडनकुलम परियोजना।
        • LNG, आर्कटिक ऊर्जा और नवीकरणीय ऊर्जा में भविष्य की संभावनाएँ।

3. व्यापार एवं संपर्क:

        • द्विपक्षीय व्यापार USD 65 बिलियन से अधिक।
        • चेन्नईव्लादिवोस्तोक समुद्री गलियारा, INSTC जैसे प्रोजेक्ट सहयोग बढ़ाते हैं।
        • लक्ष्य: 2030 तक व्यापार को USD 100 बिलियन तक पहुँचाना।

4. विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी 

        • अंतरिक्ष, परमाणु ऊर्जा और उभरती तकनीकों में सहयोग।

5. भू-राजनीति :

        • BRICS, SCO, G20 जैसे मंचों पर बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था का समर्थन।
        • यूरेशियन और वैश्विक मुद्दों पर सामरिक समन्वय।

चुनौतियाँ:

      • व्यापार असंतुलन
      • प्रतिबंधों के कारण रक्षा आपूर्ति में अनिश्चितता
      • पश्चिमी दबावों का संतुलन
      • बदलती वैश्विक परिस्थितियों में अत्यधिक निर्भरता का जोखिम

रणनीतिक महत्व:

      • भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को मजबूत करता है।
      • रक्षा और ऊर्जा सुरक्षा में योगदान।
      • कनेक्टिविटी, व्यापार और बहुध्रुवीय कूटनीति को बढ़ावा देता है।

आगे की राह:

      • रक्षा और व्यापार में विविधीकरण बढ़ाना।
      • उभरते क्षेत्रों, ग्रीन एनर्जी, डिजिटल टेक, आर्कटिक में सहयोग बढ़ाना।
      • स्थिर संस्थागत तंत्र विकसित करना और समन्वित कूटनीति बनाए रखना।

निष्कर्ष:

राष्ट्रपति पुतिन की दिसंबर 2025 यात्रा तेजी से बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारतरूस रणनीतिक साझेदारी को मजबूती देने का महत्वपूर्ण अवसर है। रक्षा सहयोग, ऊर्जा सुरक्षा, आर्थिक विविधीकरण और भूराजनीतिक समन्वय इस संबंध के मुख्य आधार हैं। भारत के लिए यह शिखर सम्मेलन रणनीतिक स्वायत्तता को सुदृढ़ करने, राष्ट्रीय क्षमताएँ बढ़ाने और सभी महाशक्तियों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने का मंच है। यदि दोनों देश बदलती परिस्थितियों के अनुरूप खुद को ढालते हैं, तो भारतरूस साझेदारी भविष्य में भी उतनी ही प्रासंगिक और मजबूत बनी रहेगी।