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Blog / 19 May 2026

भारत ने सिंधु जल संधि (IWT) पर मध्यस्थता न्यायाधिकरण के निर्णय को अस्वीकार किया

भारत ने सिंधु जल संधि (IWT) पर मध्यस्थता न्यायाधिकरण के निर्णय को अस्वीकार किया

सन्दर्भ:

भारत ने हाल ही में सिंधु जलसंधि के अंतर्गत गठित मध्यस्थता न्यायाधिकरण द्वारा दिए गए निर्णय को अस्वीकार कर दिया है। भारत ने इस न्यायाधिकरण को अवैध रूप से गठितबताया तथा इसके निर्णयों को निरस्त एवं शून्यघोषित किया है। भारत ने यह भी दोहराया कि 2025 के पहलगाम आतंकी हमले के पश्चात यह संधि स्थगित है।

जलविद्युत परियोजनाओं से संबंधित विवाद क्या है?

यह विवाद जम्मू और कश्मीर में स्थित भारत की दो जलविद्युत परियोजनाओं से संबंधित है-

किशनगंगा परियोजना

      • 330 मेगावाट की नदी-प्रवाह आधारित (run-of-the-river) परियोजना
      • किशनगंगा नदी पर स्थित, जो झेलम की सहायक नदी है

रतले परियोजना

      • 850 मेगावाट की जलविद्युत परियोजना
      • चिनाब नदी पर स्थित

पाकिस्तान का पक्ष:

पाकिस्तान का कहना है कि इन परियोजनाओं के डिज़ाइन, विशेषकर जल भंडारण क्षमता और निकासी मार्ग (spillways), संधि के प्रावधानों का उल्लंघन करते हैं तथा इससे पाकिस्तान की ओर जाने वाले जल प्रवाह में कमी आ सकती है।

भारत का पक्ष:

भारत का कहना है कि दोनों परियोजनाएँ पूरी तरह से संधि के तकनीकी मानकों के अनुरूप हैं और ये केवल नदी-प्रवाह आधारित जलविद्युत परियोजनाएँ हैं।

      • पाकिस्तान ने एक साथ तटस्थ विशेषज्ञ और न्यायाधिकरण, दोनों के पास जाकर संधि प्रक्रिया का उल्लंघन किया
      • मध्यस्थता न्यायाधिकरण का अधिकार-क्षेत्र वैध नहीं है
      • तकनीकी विवाद पहले तटस्थ विशेषज्ञ के माध्यम से सुलझाए जाने चाहिए
      • इसी कारण भारत ने मध्यस्थता कार्यवाही का बहिष्कार किया है

सिंधु जल संधि (IWT) के बारे में:

सिंधु जलसंधि पर भारत और पाकिस्तान के बीच 19 सितंबर 1960 को वर्ल्ड बैंक की मध्यस्थता में हस्ताक्षर किए गए थे।

प्रमुख प्रावधान:

पूर्वी नदियाँ- भारत को आवंटित

      • रावी
      • ब्यास
      • सतलुज

भारत को इन नदियों के जल पर पूर्ण अधिकार प्राप्त है।

पश्चिमी नदियाँ- पाकिस्तान को आवंटित

      • सिंधु
      • झेलम
      • चिनाब

भारत को इन नदियों पर सीमित अधिकार प्राप्त हैं, जैसे-

      • जलविद्युत उत्पादन
      • गैर-उपभोगात्मक उपयोग
      • निर्धारित शर्तों के अंतर्गत सिंचाई उपयोग

विवाद निवारण तंत्र  के बारे में:

इस संधि के अंतर्गत तीन-स्तरीय प्रणाली निर्धारित है-

स्थायी सिंधु आयोग (Permanent Indus Commission)

      • विवाद समाधान का प्रथम स्तर
      • दोनों देशों के आयुक्त तकनीकी मुद्दों पर चर्चा करते हैं

तटस्थ विशेषज्ञ (Neutral Expert)

      • तकनीकी एवं अभियांत्रिक विवादों का समाधान करता है
      • इसका निर्णय दोनों पक्षों पर बाध्यकारी होता है

मध्यस्थता न्यायाधिकरण (Court of Arbitration)

      • कानूनी विवादों और संधि की व्याख्या से जुड़े मामलों को देखता है
      • हेग में गठित सात सदस्यीय न्यायाधिकरण

प्रमुख मुद्दे:

संधि का निलंबन

यह प्रश्न उठता है कि क्या कोई द्विपक्षीय संधि राष्ट्रीय सुरक्षा के आधार पर एकतरफा स्थगित की जा सकती है।

संप्रभुता बनाम मध्यस्थता

भारत का मत है कि संप्रभुता और सुरक्षा संबंधी चिंताओं को संधि दायित्वों से अलग नहीं किया जा सकता।

जलवायु परिवर्तन

यह संधि हिमनदों के पिघलने और बदलते जल प्रवाह जैसी आधुनिक चुनौतियों को पर्याप्त रूप से संबोधित नहीं करती।

स्थायी मध्यस्थता न्यायालय (PCA) के बारे में:

Permanent Court of Arbitration की स्थापना 1899 में हेग शांति सम्मेलन के दौरान राज्यों के बीच शांतिपूर्ण विवाद समाधान हेतु की गई थी।

      • मुख्यालय: हेग, नीदरलैंड्स
      • स्थापना: 1899 हेग सम्मेलन
      • प्रकृति: स्वतंत्र अंतर-सरकारी संगठन
      • 1993 में संयुक्त राष्ट्र महासभा में स्थायी पर्यवेक्षक का दर्जा

निष्कर्ष:

भारत द्वारा मध्यस्थता निर्णय को अस्वीकार करना आतंकवाद, संप्रभुता और रणनीतिक सुरक्षा से जुड़े व्यापक तनावों को दर्शाता है। सिंधु बेसिन की स्थिरता का भविष्य भारत और पाकिस्तान के बीच निरंतर कूटनीति, संस्थागत संवाद और सहयोगात्मक जल प्रबंधन पर निर्भर करेगा।

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