संदर्भ:
हाल ही में, केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री ने वैश्विक औषधि कंपनियों को भारत के विस्तृत होते स्वास्थ्य-परिसर में निवेश करने के लिए आमंत्रित किया। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि भारत का औषधि उद्योग आगामी पाँच वर्षों में अपने वर्तमान लगभग 60 अरब डॉलर के मूल्य को दोगुना करने का लक्ष्य रखा है।
भारत के औषधि क्षेत्र के बारे में:
भारत का औषधि उद्योग, जिसे “विश्व की औषधशाला” भी कहा जाता है, राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था तथा वैश्विक स्वास्थ्य प्रणाली का एक अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह क्षेत्र सस्ती जेनेरिक दवाओं, टीकों, सक्रिय औषधीय अवयवों (एपीआई), जैव-समान (बायोसिमिलर) तथा विशेष औषधियों के उत्पादन में विशेषज्ञता रखता है और घरेलू एवं अंतरराष्ट्रीय दोनों बाजारों की उपलब्ध होता है।
मुख्य आँकड़े एवं तथ्य:
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- भारतीय औषधि बाजार का वर्तमान मूल्य लगभग 60 अरब डॉलर है।
- भारत विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की वैश्विक टीका आवश्यकताओं का लगभग 65–70% आपूर्ति करता है।
- विश्व की 25 सबसे बड़ी जेनेरिक औषधि कंपनियों में से 10 भारत में स्थित हैं।
- अमेरिका के बाहर भारत में अमेरिकी FDA-मान्यताप्राप्त औषधि निर्माण संयंत्रों की संख्या सर्वाधिक है।
- औषधि निर्यात 2013–14 के 15.07 अरब डॉलर से बढ़कर हाल के वर्षों में लगभग 27.85 अरब डॉलर तक पहुँच गया है।
- यह क्षेत्र रोजगार सृजन, स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता तथा विदेशी मुद्रा अर्जन में महत्वपूर्ण योगदान देता है।
- भारतीय औषधि बाजार का वर्तमान मूल्य लगभग 60 अरब डॉलर है।
औषधि वितरण एवं खंड विभाजन:
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- पारंपरिक छोटी-अणु (स्मॉल-मॉलिक्यूल) औषधियाँ लगभग 76% बाजार राजस्व प्रदान करती हैं।
- जैविक औषधियाँ एवं जैव-समान दवाएँ सबसे तीव्र गति से बढ़ने वाला क्षेत्र हैं (वार्षिक वृद्धि दर 15.8%)।
- प्रमुख उपचार क्षेत्र: संक्रामक रोग-रोधी दवाएँ, हृदय रोग तथा मधुमेह की दवाएँ।
- खुदरा फार्मेसी लगभग 65% घरेलू बिक्री का योगदान देती हैं, जबकि ई-फार्मेसी तेजी से विस्तार कर रही हैं।
- गुजरात और महाराष्ट्र प्रमुख निर्माण केंद्र हैं, इसके बाद दक्षिण भारत का स्थान आता है।
- पारंपरिक छोटी-अणु (स्मॉल-मॉलिक्यूल) औषधियाँ लगभग 76% बाजार राजस्व प्रदान करती हैं।
औषधि क्षेत्र का महत्व:
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- वैश्विक स्तर पर सस्ती स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करता है।
- वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा में भारत की भूमिका को मजबूत करता है।
- निर्यात आय और आर्थिक वृद्धि को बढ़ावा देता है।
- आत्मनिर्भर भारत की संकल्पना को सुदृढ़ करता है।
- रोजगार सृजन एवं तकनीकी विकास में महत्वपूर्ण योगदान देता है।
- वैश्विक स्तर पर सस्ती स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करता है।
प्रमुख चुनौतियाँ:
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- सक्रिय औषधीय अवयवों (एपीआई) के लिए आयात पर निर्भरता।
- अनुसंधान एवं विकास में कम निवेश (7–8%)।
- बढ़ती नियामकीय अनुपालन लागत।
- मूल्य नियंत्रण एवं वैश्विक प्रतिस्पर्धा।
- विभिन्न देशों की अलग-अलग नियामकीय आवश्यकताएँ।
- सक्रिय औषधीय अवयवों (एपीआई) के लिए आयात पर निर्भरता।
आगे की राह:
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- जैविक औषधियों, जैव-समान दवाओं एवं उन्नत उपचारों को बढ़ावा देना।
- एपीआई में आत्मनिर्भरता हेतु उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन (PLI) योजना को सुदृढ़ करना।
- अनुसंधान एवं नवाचार में निवेश बढ़ाना।
- संशोधित अनुसूची M के माध्यम से वैश्विक GMP मानकों के अनुरूप निर्माण सुनिश्चित करना।
- दक्षता एवं अनुपालन के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता एवं डिजिटल तकनीकों को अपनाना।
- जैविक औषधियों, जैव-समान दवाओं एवं उन्नत उपचारों को बढ़ावा देना।
निष्कर्ष:
भारत का औषधि क्षेत्र लागत-प्रभावी उत्पादन और बड़े पैमाने की निर्माण क्षमता के कारण वैश्विक नेतृत्वकर्ता के रूप में उभरा है। यद्यपि आयात निर्भरता और नियामकीय चुनौतियाँ मौजूद हैं, परंतु सरकारी समर्थन, बढ़ती स्वास्थ्य आवश्यकताएँ तथा अनुसंधान एवं जैव-प्रौद्योगिकी में बढ़ता निवेश इस क्षेत्र को सतत विकास और वैश्विक स्वास्थ्य में अधिक सशक्त भूमिका की ओर अग्रसर कर रहा है।
