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Blog / 01 Sep 2026

भारत–ईरान संबंध: संवाद, संपर्क-सुविधा और रणनीतिक स्वायत्तता

संदर्भ:

हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किर्गिस्तान के बिश्केक में आयोजित शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन के दौरान ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियन से मुलाकात की। यह बैठक अमेरिका और ईरान के बीच बढ़े सैन्य तनाव तथा पश्चिम एशिया में अस्थिरता को लेकर हुई।

पश्चिम एशिया पर भारत का रुख:

भारत ने निम्नलिखित बिंदुओं पर जोर दिया:

      • संघर्षों का समाधान संवाद और कूटनीति के माध्यम से किया जाना चाहिए।
      • स्थायी शांति और क्षेत्रीय स्थिरता सुनिश्चित की जानी चाहिए।
      • नागरिकों और नागरिक बुनियादी ढाँचे की सुरक्षा की जानी चाहिए।
      • नौवहन और वाणिज्य की स्वतंत्रता सुनिश्चित की जानी चाहिए।
      • व्यावसायिक जहाजों और नाविकों की सुरक्षा की जानी चाहिए।
      • भारत का यह रुख उसकी रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) की नीति तथा सभी पक्षों के साथ रचनात्मक संवाद और संबंध बनाए रखने की प्राथमिकता को दर्शाता है।

What makes this SCO summit different for India is Iran

भारत के लिए ईरान का रणनीतिक महत्व:

      • ईरान एक महत्वपूर्ण भौगोलिक स्थिति में स्थित है, जो दक्षिण एशिया को पश्चिम एशिया और मध्य एशिया से जोड़ता है।
      • भारत के लिए ईरान का महत्व पारंपरिक ऊर्जा संबंधों से आगे बढ़कर संपर्क-सुविधा, व्यापार और क्षेत्रीय कूटनीति तक फैला हुआ है।
      • चाबहार बंदरगाह:
        • चाबहार बंदरगाह भारत और ईरान के बीच संपर्क-सुविधा साझेदारी की आधारशिला है।
        • यह भारत को अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुँचने के लिए एक वैकल्पिक मार्ग प्रदान करता है, जिससे पाकिस्तान के रास्तों पर निर्भरता कम होती है।
        • यह बंदरगाह यूरेशियाई क्षेत्र के साथ भारत के व्यापार को बढ़ाने के लिए एक महत्वपूर्ण प्रवेश-द्वार भी बन सकता है।
      • अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा:
        • ईरान अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे (INSTC) का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसका उद्देश्य एक बहु-माध्यम परिवहन नेटवर्क के माध्यम से भारत को रूस और यूरोप से जोड़ना है।
        • इस गलियारे का अधिक प्रभावी संचालन परिवहन समय को कम कर सकता है तथा मध्य एशिया और रूस के साथ भारत के आर्थिक संबंधों को मजबूत कर सकता है।
      • होर्मुज़ जलडमरूमध्य और भारत की ऊर्जा सुरक्षा:
      • होर्मुज़ जलडमरूमध्य एक प्रमुख वैश्विक ऊर्जा-मार्ग है, जो फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी से जोड़ता है।
        • नौवहन में किसी भी प्रकार का व्यवधान कच्चे तेल की कीमतों, शिपिंग लागत और बीमा प्रीमियम में वृद्धि कर सकता है।
        • चूँकि भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए आयात पर काफी हद तक निर्भर है, इसलिए होर्मुज़ के आसपास अस्थिरता का भारत की महँगाई, चालू खाते और समग्र आर्थिक स्थिरता पर सीधा प्रभाव पड़ सकता है।
        • इसलिए, नौवहन की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने की भारत की अपील का रणनीतिक और आर्थिक, दोनों दृष्टियों से महत्व है।

प्रमुख चुनौतियाँ:

भारतईरान संबंधों के सामने कई बाधाएँ हैं:

      • अमेरिकी प्रतिबंध बैंकिंग, निवेश, शिपिंग और ऊर्जा व्यापार को जटिल बनाते हैं।
      • पश्चिम एशिया में संघर्ष भारत के आर्थिक और सुरक्षा हितों के लिए जोखिम पैदा करते हैं।
      • अमेरिका, इज़राइल और खाड़ी देशों के साथ भारत के बढ़ते संबंधों के कारण सावधानीपूर्वक कूटनीतिक संतुलन बनाए रखना आवश्यक है।
      • ईरान के साथ चीन का बढ़ता रणनीतिक सहयोग अतिरिक्त भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा पैदा करता है।
      • चाबहार जैसी संपर्क-सुविधा परियोजनाओं के लिए निरंतर निवेश और राजनीतिक स्थिरता आवश्यक है।

आगे की राह:

भारत को संतुलित सहभागिता के माध्यम से रणनीतिक स्वायत्तता की नीति को आगे बढ़ाना चाहिए।

इसके लिए भारत को:

      • चाबहार बंदरगाह और INSTC को मजबूत करना चाहिए।
      • द्विपक्षीय व्यापार को हाइड्रोकार्बन से आगे विविधीकृत करना चाहिए।
      • विश्वसनीय और कानूनी रूप से अनुपालक भुगतान तंत्र विकसित करना चाहिए।
      • शांति और समुद्री सुरक्षा के लिए कूटनीतिक प्रयास जारी रखने चाहिए।

निष्कर्ष:

भारतईरान संबंध एक अस्थिर भू-राजनीतिक वातावरण में रणनीतिक स्वायत्तता के व्यावहारिक महत्व को दर्शाते हैं। भारत को ईरान के साथ रचनात्मक संबंध बनाए रखने के साथ-साथ अमेरिका, इज़राइल और खाड़ी देशों के साथ भी सक्रिय रूप से जुड़ना चाहिए। एक स्थिर ईरान और सुरक्षित समुद्री मार्ग भारत की ऊर्जा सुरक्षा, संपर्क-सुविधा और आर्थिक हितों के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।

 

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