संदर्भ:
मंगोलिया के उलानबटार में हाल ही में चल रहे मरुस्थलीकरण से निपटने के लिए संयुक्त राष्ट्र अभिसमय (UNCCD) के पक्षकारों के 17वें सम्मेलन (COP17) में भारत ने चारागाहों के सामुदायिक नेतृत्व और विज्ञान-आधारित पुनर्स्थापन का आह्वान किया।
चारागाह क्या हैं?
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- चारागाह प्राकृतिक या अर्ध-प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र होते हैं, जैसे घासभूमि, झाड़ीभूमि, सवाना और खुले वन क्षेत्र, जिनमें मुख्य रूप से पालतू पशु और जंगली जानवर चरते हैं। गहन कृषि भूमि के विपरीत, इनका प्रबंधन सामान्यतः गहन खेती के बजाय चराई की पद्धतियों के माध्यम से किया जाता है।
- चारागाह पशुपालक समुदायों की आजीविका, जैव विविधता संरक्षण, कार्बन भंडारण, मृदा स्वास्थ्य और जल विनियमन के लिए महत्वपूर्ण हैं। वैश्विक स्तर पर वे पृथ्वी की आधी से अधिक भूमि की सतह पर फैले हुए हैं और लाखों पशुपालकों तथा पशुधन पर निर्भर समुदायों को सहायता प्रदान करते हैं।
- भारत में चारागाह विभिन्न प्रकार के भू-दृश्यों में पाए जाते हैं, थार मरुस्थल और कच्छ से लेकर हिमालयी चरागाहों, मध्य भारतीय सवाना और दक्षिणी शोला वनों तक। भारत के स्थायी चरागाह और चराई की भूमि लगभग 1 करोड़ हेक्टेयर में फैली हुई है।
- चारागाह प्राकृतिक या अर्ध-प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र होते हैं, जैसे घासभूमि, झाड़ीभूमि, सवाना और खुले वन क्षेत्र, जिनमें मुख्य रूप से पालतू पशु और जंगली जानवर चरते हैं। गहन कृषि भूमि के विपरीत, इनका प्रबंधन सामान्यतः गहन खेती के बजाय चराई की पद्धतियों के माध्यम से किया जाता है।
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चारागाह पुनर्स्थापन के प्रति भारत का दृष्टिकोण:
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- सम्मेलन में भारत ने एक समन्वित दृष्टिकोण पर जोर दिया, जिसमें भू-दृश्य प्रबंधन, जलसंभर विकास, टिकाऊ चराई, चारा विकास और आजीविका सहायता को सम्मिलित किया गया। सफल पुनर्स्थापन के लिए सामुदायिक भागीदारी और सुरक्षित भूमि-अधिकार को आवश्यक माना गया।
- भारत ने इस बात पर जोर दिया कि पशुपालकों को पुनर्स्थापन कार्यक्रमों में केवल लाभार्थियों के रूप में नहीं, बल्कि संरक्षकों के रूप में देखा जाना चाहिए। उनके पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक वैज्ञानिक विधियों के साथ जोड़ने से पुनर्स्थापन को पारिस्थितिक रूप से टिकाऊ और सामाजिक रूप से समावेशी बनाया जा सकता है।
- चराई के अधिकारों और सामुदायिक वन संसाधन अधिकारों की मान्यता सामुदायिक भागीदारी को और मजबूत कर सकती है।
- राजस्थान के ओरान (पवित्र उपवन) का उदाहरण भारत की पारंपरिक सामुदायिक संरक्षण पद्धतियों को दर्शाता है। लगभग 25,000 समुदाय-संरक्षित पवित्र उपवन, जो लगभग 6 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में फैले हुए हैं, संरक्षण और सांस्कृतिक परंपराओं तथा पशुपालक भूमि-अधिकारों के बीच संबंध के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किए गए।
- सम्मेलन में भारत ने एक समन्वित दृष्टिकोण पर जोर दिया, जिसमें भू-दृश्य प्रबंधन, जलसंभर विकास, टिकाऊ चराई, चारा विकास और आजीविका सहायता को सम्मिलित किया गया। सफल पुनर्स्थापन के लिए सामुदायिक भागीदारी और सुरक्षित भूमि-अधिकार को आवश्यक माना गया।
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UNCCD COP17 के बारे में:
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- UNCCD COP17 का आयोजन 17–28 अगस्त 2026 तक उलानबटार, मंगोलिया में किया जा रहा है। इसका विषय “भूमि का पुनर्स्थापन, आशा का पुनर्स्थापन” है।
- सम्मेलन का मुख्य ध्यान भूमि-पुनर्स्थापन से संबंधित प्रतिबद्धताओं को ठोस कार्रवाई और वित्तीय सहायता में बदलने पर है।
- यह सम्मेलन इसलिए भी विशेष महत्व रखता है क्योंकि 2026 को चारागाहों और पशुपालकों का अंतरराष्ट्रीय वर्ष (IYRP) घोषित किया गया है।
- UNCCD COP17 का आयोजन 17–28 अगस्त 2026 तक उलानबटार, मंगोलिया में किया जा रहा है। इसका विषय “भूमि का पुनर्स्थापन, आशा का पुनर्स्थापन” है।
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UNCCD के बारे में:
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- मरुस्थलीकरण से निपटने के लिए संयुक्त राष्ट्र अभिसमय (UNCCD) की स्थापना 1994 में हुई थी और यह तीन रियो अभिसमयों में से एक है। इसके साथ जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र रूपरेखा अभिसमय (UNFCCC) और जैव विविधता अभिसमय (CBD) अन्य दो रियो अभिसमय हैं।
- इसका मुख्य उद्देश्य विशेष रूप से शुष्क क्षेत्रों में मरुस्थलीकरण, भूमि क्षरण और सूखे से निपटना है।
- एक प्रमुख वैश्विक उद्देश्य भूमि क्षरण तटस्थता (LDN) है, जो सतत विकास लक्ष्य 15.3 के अंतर्गत है। इसका उद्देश्य वर्ष 2030 तक ऐसी दुनिया प्राप्त करना है जहाँ भूमि क्षरण की स्थिति तटस्थ हो।
- भारत ने वर्ष 2030 तक 2.6 करोड़ हेक्टेयर क्षरित भूमि को पुनर्स्थापित करने की प्रतिबद्धता जताई है। भारत ने बताया कि 2011–2020 के दौरान लगभग 2.176 करोड़ हेक्टेयर भूमि का पुनर्स्थापन किया गया।
- मरुस्थलीकरण से निपटने के लिए संयुक्त राष्ट्र अभिसमय (UNCCD) की स्थापना 1994 में हुई थी और यह तीन रियो अभिसमयों में से एक है। इसके साथ जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र रूपरेखा अभिसमय (UNFCCC) और जैव विविधता अभिसमय (CBD) अन्य दो रियो अभिसमय हैं।
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निष्कर्ष:
भारत का दृष्टिकोण दर्शाता है कि भूमि का पुनर्स्थापन केवल सरकारी कार्रवाई के माध्यम से सफल नहीं हो सकता। स्थानीय समुदायों को सशक्त बनाना, पशुपालकों के अधिकारों की रक्षा करना तथा पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक विज्ञान के साथ जोड़ना पुनर्स्थापन को पर्यावरणीय रूप से प्रभावी और सामाजिक रूप से टिकाऊ बना सकता है। वैश्विक भूमि-पुनर्स्थापन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए वित्त, प्रौद्योगिकी और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को मजबूत करना महत्वपूर्ण होगा।
