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Blog / 07 Feb 2026

मुक्त व्यापार समझौते को लेकर टर्म्स ऑफ रेफरेंस' पर हस्ताक्षर

संदर्भ:

आर्थिक संबंधों को और अधिक प्रगाढ़ बनाने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए,भारत और खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) ने मुक्त व्यापार समझौते (FTA) पर वार्ता शुरू करने के लिए 'टर्म्स ऑफ रेफरेंस' (ToR) पर हस्ताक्षर किए हैं। यह ToR असल में मुख्य समझौते से पहले की एक अनिवार्य प्रक्रिया है, जो भविष्य में होने वाली वार्ताओं के दायरे, मुख्य उद्देश्यों और चर्चा के तौर-तरीकों को आधिकारिक रूप से परिभाषित करती है।

महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि बहरीन, कुवैत, ओमान, कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) जैसे जीसीसी देश सामूहिक रूप से भारत के सबसे बड़े व्यापारिक साझेदार बन चुके हैं। इन देशों के साथ भारत का व्यापारिक लेनदेन अब यूरोपीय संघ और अमेरिका के साथ होने वाले व्यापार की मात्रा को भी पार कर गया है।

प्रमुख द्विपक्षीय लाभ:

व्यापार एवं निवेश में सुगमता: इस संभावित मुक्त व्यापार समझौते (FTA) के माध्यम से सीमा शुल्क (टैरिफ) और अन्य व्यापारिक बाधाओं को कम या समाप्त किए जाने की योजना है। इससे न केवल वस्तुओं और सेवाओं का आदान-प्रदान सरल होगा, बल्कि दोनों पक्षों के बीच व्यापारिक प्रवाह को भी एक नई गति मिलेगी।

ऊर्जा सुरक्षा और विविधीकरण: जीसीसी (GCC) देशों के पास उपलब्ध ऊर्जा के विशाल भंडार भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। यह साझेदारी भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने और आपूर्ति के स्रोतों में विविधता लाने के लक्ष्यों को सशक्त बनाएगी।

रोजगार के नए अवसर: व्यापार, सेवाओं और निवेश में होने वाली वृद्धि का सीधा लाभ भारतीय कार्यबल को मिलेगा। यह लाभ न केवल खाड़ी देशों में कार्यरत प्रवासी भारतीयों के लिए होगा, बल्कि भारत के भीतर भी रोजगार के नए और बेहतर अवसर सृजित करेगा।

निवेश प्रवाह में वृद्धि: FTA के लागू होने से जीसीसी देशों से आने वाले निवेश के दायरे में विस्तार होने की प्रबल संभावना है। यह निवेश मुख्य रूप से भारत के बुनियादी ढांचे (Infrastructure), औद्योगिक विकास और सेवा क्षेत्र को नई मजबूती प्रदान करेगा, जिससे देश की आर्थिक प्रगति को बल मिलेगा।

मुक्त व्यापार समझौते (FTA) की अवधारणा

मुक्त व्यापार समझौते (FTA) दो या दो से अधिक देशों के बीच होने वाली ऐसी संधियाँ हैं, जिनका मुख्य उद्देश्य सीमा शुल्क (टैरिफ) और व्यापारिक कोटा जैसी बाधाओं को कम करना या पूरी तरह समाप्त करना है। इससे 'तरजीही व्यापार क्षेत्र' (Preferential Trade Areas) विकसित होते हैं। वर्तमान समय के आधुनिक FTA केवल वस्तुओं और सेवाओं तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनमें निवेश, बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR) और डिजिटल व्यापार जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों को भी शामिल किया जाता है। जहाँ एक ओर FTA बाजार तक पहुँच को आसान बनाकर उपभोक्ताओं के लिए लागत कम करते हैं, वहीं दूसरी ओर ये रोजगार विस्थापन और पर्यावरणीय प्रभाव जैसी चुनौतियाँ भी पेश कर सकते हैं।

खाड़ी सहयोग परिषद (GCC)-

      सदस्य राष्ट्र: बहरीन, कुवैत, ओमान, कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात।

      स्थापना: 25 मई 1981, रियाद (सऊदी अरब)

      प्रमुख उद्देश्य: सदस्य देशों के बीच आर्थिक, सामाजिक और सुरक्षा समन्वय स्थापित करना; व्यापार एवं सीमा शुल्क का एकीकरण करना तथा तकनीकी प्रगति को प्रोत्साहन देना।

      महत्व: जीसीसी (GCC) दुनिया का एक अत्यंत प्रभावशाली आर्थिक ब्लॉक है, जिसके पास प्रचुर मात्रा में तेल और गैस के भंडार हैं। भारत के लिए इसका महत्व वहाँ रहने वाली विशाल प्रवासी भारतीय आबादी के कारण और भी बढ़ जाता है।

      क्षेत्रीय स्थिरता: यह परिषद मध्य पूर्व में शांति और स्थिरता बनाए रखने, आर्थिक विकास को गति देने और वैश्विक निवेश के प्रवाह को सुगम बनाने में एक निर्णायक भूमिका निभाती है।

निष्कर्ष:

​'टर्म्स ऑफ रेफरेंस' (ToR) पर हस्ताक्षर करना मध्य पूर्व के साथ अपने आर्थिक संबंधों को नई गहराई देने की भारत की प्रतिबद्धता का स्पष्ट प्रमाण है। यदि भविष्य में यह वार्ता सफल रहती है, तो भारत-जीसीसी FTA एक ऐतिहासिक उपलब्धि के रूप में उभरेगा। यह न केवल व्यापार, निवेश और रोजगार के नए अवसरों का सृजन करेगा, बल्कि इस भू-राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र के साथ भारत की रणनीतिक और आर्थिक साझेदारी को भी अभूतपूर्व मजबूती प्रदान करेगा।