ICJ की जलवायु संबंधी राय पर आधारित यूएनजीए प्रस्ताव पर भारत ने मतदान से दूरी बनाई
संदर्भ:
हाल ही में, भारत ने जलवायु परिवर्तन संबंधी दायित्वों पर अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) की सलाहकारी राय के आधार पर संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के एक प्रस्ताव पर मतदान से दूरी बनाई। यह प्रस्ताव वानुआतु द्वारा प्रस्तुत किया गया था और इसे 141 देशों के समर्थन, 8 विरोध तथा भारत सहित 28 देशों के मतदान से दूर रहने के साथ पारित किया गया।
प्रस्ताव के बारे में:
इस प्रस्ताव में देशों से आग्रह किया गया कि वे जलवायु परिवर्तन पर ICJ की सलाहकारी राय के अनुरूप अपने जलवायु दायित्वों का पालन करें।
जलवायु परिवर्तन पर ICJ की सलाहकारी राय:
अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने कहा कि:
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- देशों पर मानव-जनित जलवायु परिवर्तन से निपटने का कानूनी दायित्व है।
- राज्यों को वर्तमान और भविष्य की पीढ़ियों के लिए पर्यावरण की रक्षा करनी चाहिए।
- राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDCs) में “सर्वोच्च संभव महत्वाकांक्षा” दिखाई देनी चाहिए।
- जलवायु प्रतिबद्धताएँ “ड्यू डिलिजेंस” (Due Diligence) के सिद्धांत के अंतर्गत आती हैं, जिसके तहत उनका कड़ाई से पालन और क्रियान्वयन आवश्यक है।
- हालाँकि ICJ की सलाहकारी राय कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं होती, फिर भी उनका नैतिक और कानूनी प्रभाव काफी महत्वपूर्ण होता है तथा वे भविष्य के अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण कानून और जलवायु मुकदमों को प्रभावित कर सकती हैं।
- देशों पर मानव-जनित जलवायु परिवर्तन से निपटने का कानूनी दायित्व है।
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भारत के मतदान से दूरी बनाने के प्रमुख कारण:
यूनाइटेड नेशंस फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज ढाँचे की सुरक्षा
भारत का तर्क था कि जलवायु संबंधी दायित्व केवल निम्नलिखित अंतरराष्ट्रीय समझौतों के तहत हुई वार्ताओं से उत्पन्न होने चाहिए:
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- संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन रूपरेखा अभिसमय (UNFCCC)
- पेरिस समझौता (Paris Agreement)
- भारत ने ICJ की गैर-बाध्यकारी राय को अर्ध-बाध्यकारी (quasi-binding) दर्जा देने का विरोध किया।
- संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन रूपरेखा अभिसमय (UNFCCC)
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NDCs को लेकर चिंताएँ
भारत ने कहा कि यह प्रस्ताव:
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- पेरिस समझौते की राष्ट्रीय रूप से निर्धारित संरचना को कमजोर कर सकता है।
- घरेलू जलवायु लक्ष्यों (NDCs) को अंतरराष्ट्रीय न्यायिक समीक्षा के दायरे में ला सकता है।
- विकासशील देशों पर बाहरी उत्सर्जन-नियंत्रण मानक थोप सकता है।
- पेरिस समझौते की राष्ट्रीय रूप से निर्धारित संरचना को कमजोर कर सकता है।
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जलवायु वित्त (Climate Finance) की अनदेखी
भारत ने प्रस्ताव में “क्लाइमेट फाइनेंस” का उल्लेख न होने की कड़ी आलोचना की।
भारत ने जोर देकर कहा कि:
विकसित देशों की उत्सर्जन के लिए ऐतिहासिक जिम्मेदारी है।
उन्हें निम्नलिखित सहायता प्रदान करनी चाहिए:
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- वित्तीय सहायता
- प्रौद्योगिकी हस्तांतरण
- क्षमता निर्माण सहयोग
- भारत ने इस चूक को “गंभीर चिंता” बताया।
- वित्तीय सहायता
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CBDR-RC सिद्धांत का कमजोर होना
भारत ने “सामान्य लेकिन विभेदित जिम्मेदारियाँ और संबंधित क्षमताएँ” (CBDR-RC) के सिद्धांत को दोहराया।
भारत का कहना था कि:
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- ऐतिहासिक रूप से अधिक प्रदूषण फैलाने वाले देशों और विकासशील देशों पर समान बोझ नहीं डाला जा सकता।
- ऐतिहासिक रूप से अधिक प्रदूषण फैलाने वाले देशों और विकासशील देशों पर समान बोझ नहीं डाला जा सकता।
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ऊर्जा परिवर्तन होना चाहिए:
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- न्यायसंगत
- समानतापूर्ण
- विकास-उन्मुख
- न्यायसंगत
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अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) के बारे में:
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स्थापना:
- संयुक्त राष्ट्र का प्रमुख न्यायिक अंग।
- वर्ष 1945 में स्थापित।
- मुख्यालय: हेग, नीदरलैंड।
- संयुक्त राष्ट्र का प्रमुख न्यायिक अंग।
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ICJ के कार्य:
- विवादास्पद मामले (Contentious Cases): संप्रभु राज्यों के बीच कानूनी विवादों का निपटारा करता है।
- परामर्शात्मक राय (Advisory Opinions): संयुक्त राष्ट्र के अंगों और एजेंसियों को कानूनी राय प्रदान करता है।
- विवादास्पद मामले (Contentious Cases): संप्रभु राज्यों के बीच कानूनी विवादों का निपटारा करता है।
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प्रमुख विशेषताएँ:
15 न्यायाधीशों से मिलकर बना है, जिनका कार्यकाल 9 वर्ष का होता है।
संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्य देश ICJ की संविधि के पक्षकार हैं।
निर्णय निम्न आधारों पर दिए जाते हैं:
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- अंतर्राष्ट्रीय संधियाँ
- प्रथाएँ/रीतियाँ
- कानून के सामान्य सिद्धांत
- अंतर्राष्ट्रीय संधियाँ
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अधिकार-क्षेत्र और प्रवर्तन:
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- ICJ का अधिकार-क्षेत्र राज्यों की सहमति पर निर्भर करता है।
- ICJ के निर्णय कानूनी रूप से बाध्यकारी होते हैं।
- यदि कोई राज्य निर्णय का पालन नहीं करता, तो प्रवर्तन में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की भूमिका हो सकती है।
- ICJ का अधिकार-क्षेत्र राज्यों की सहमति पर निर्भर करता है।
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निष्कर्ष:
संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के प्रस्ताव पर भारत का मतदान से विरत रहना (abstention) जलवायु शासन में न्यायिक निगरानी के विस्तार के प्रति उसके सतर्क दृष्टिकोण को दर्शाता है। जलवायु कार्रवाई और संवेदनशील देशों के समर्थन के साथ-साथ भारत लगातार जलवायु समानता, विकासात्मक न्याय और UNFCCC ढाँचे पर बल देता रहा है।
