संदर्भ:
हाल ही में, केंद्रीय मंत्रिमंडल ने वर्ष 2026–27 से 2030–31 की अवधि के दौरान बड़े पैमाने पर ग्रिड-स्तरीय ऊर्जा भंडारण प्रणालियों (Energy Storage Systems–ESS) को बढ़ावा देने के लिए व्यवहार्यता अंतर वित्तपोषण (Viability Gap Funding–VGF) योजना को मंजूरी दी है। इस योजना का उद्देश्य 92 GWh की ऊर्जा भंडारण क्षमता विकसित करना है, जिससे ग्रिड की स्थिरता में सुधार, नवीकरणीय ऊर्जा का एकीकरण तथा भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत किया जा सके।
योजना की प्रमुख विशेषताएँ:
इस योजना के तहत कुल 92 GWh ऊर्जा भंडारण क्षमता विकसित करने का लक्ष्य रखा गया है, जिसमें 30 GWh बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणाली (BESS), 60 GWh पंप्ड हाइड्रो स्टोरेज (PHS) और 2 GWh उभरती हुई भंडारण प्रौद्योगिकियाँ शामिल हैं। इस योजना का घोषित वित्तीय परिव्यय ₹17,500 करोड़ है, जबकि अनुमानित व्यवहार्यता अंतर वित्तपोषण (VGF) सहायता ₹14,500 करोड़ है। इसके लिए कुल लगभग ₹97,600 करोड़ के निवेश की आवश्यकता होगी। यह योजना निजी क्षेत्र की भागीदारी और घरेलू विनिर्माण को प्रोत्साहित करेगी।
ग्रिड-स्तरीय ऊर्जा भंडारण प्रणालियाँ क्या हैं?
ग्रिड-स्तरीय ऊर्जा भंडारण प्रणालियाँ बड़े आकार की ऐसी स्थापनाएँ हैं, जिन्हें विद्युत पारेषण या वितरण नेटवर्क से जोड़ा जाता है। ये अतिरिक्त बिजली को संग्रहित करती हैं और उच्च मांग या नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन में कमी के दौरान इसे पुनः उपलब्ध कराती हैं। इनकी प्रमुख प्रौद्योगिकियों में बैटरी भंडारण, पंप्ड हाइड्रो स्टोरेज, फ्लो बैटरियाँ और सॉलिड-स्टेट बैटरियाँ शामिल हैं। ये प्रणालियाँ बिजली उत्पादन और खपत के बीच संतुलन बनाए रखने में सहायता करती हैं।
बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणाली (BESS) के बारे में:
BESS विद्युत-रासायनिक प्रक्रियाओं के माध्यम से बिजली का भंडारण करती है और आवश्यकता पड़ने पर इसे पुनः उपलब्ध कराती है। अतिरिक्त सौर एवं पवन ऊर्जा का भंडारण करके यह नवीकरणीय ऊर्जा के एकीकरण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसके अतिरिक्त, यह अधिकतम बिजली मांग के प्रबंधन, ग्रिड संतुलन, आवृत्ति विनियमन और ऊर्जा आर्बिट्रेज (कम कीमत पर बिजली संग्रहित करके अधिक कीमत के समय उपयोग या बिक्री) में भी सहायता करती है। लिथियम आयरन फॉस्फेट (LFP) बैटरियों को उनकी बेहतर तापीय स्थिरता, लंबी चार्ज-डिस्चार्ज क्षमता (Cycle Life) तथा निकेल और कोबाल्ट पर कम निर्भरता के कारण बड़े पैमाने पर ऊर्जा भंडारण के लिए तेजी से प्राथमिकता दी जा रही है।
पंप्ड स्टोरेज हाइड्रोपावर (PSP) के बारे में:
पंप्ड स्टोरेज हाइड्रोपावर गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा (Gravitational Potential Energy) के माध्यम से ऊर्जा का भंडारण करता है। जब बिजली का अतिरिक्त उत्पादन होता है, तब पानी को निचले जलाशय से पंप करके ऊपरी जलाशय में पहुँचाया जाता है। अधिकतम बिजली मांग के समय संग्रहित पानी को टर्बाइनों के माध्यम से छोड़ा जाता है, जिससे बिजली का उत्पादन होता है। यह लंबे समय तक ऊर्जा भंडारण, लंबी परिचालन अवधि और बड़े पैमाने पर ग्रिड संतुलन की क्षमता प्रदान करता है।
व्यवहार्यता अंतर वित्तपोषण (VGF) क्या है?
व्यवहार्यता अंतर वित्तपोषण (VGF) सरकार द्वारा उन बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं को प्रदान की जाने वाली वित्तीय सहायता है, जो आर्थिक एवं सामाजिक दृष्टि से उपयोगी होती हैं, लेकिन केवल व्यावसायिक आधार पर वित्तीय रूप से व्यवहार्य नहीं होतीं। यह प्रारंभिक पूंजीगत लागत को कम करता है, परियोजनाओं की वित्तीय व्यवहार्यता में सुधार करता है तथा सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPPs) के माध्यम से निजी निवेश को प्रोत्साहित करता है।
भारत के लिए महत्त्व:
यह योजना नवीकरणीय ऊर्जा के व्यापक एकीकरण को सुगम बनाएगी तथा जीवाश्म ईंधन आधारित बिजली उत्पादन पर निर्भरता को कम करेगी। इससे बिजली आपूर्ति की विश्वसनीयता में सुधार होगा, निजी निवेश आकर्षित होगा, रोजगार के अवसर पैदा होंगे तथा आत्मनिर्भर भारत पहल के तहत स्वदेशी बैटरी विनिर्माण को बढ़ावा मिलेगा। इसके अतिरिक्त, यह भारत की जलवायु प्रतिबद्धताओं और वर्ष 2070 तक शुद्ध-शून्य उत्सर्जन (Net-Zero Emissions) प्राप्त करने के लक्ष्य को पूरा करने में भी सहायता करेगी।
भारत का ऊर्जा भंडारण लक्ष्य:
केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA) के अनुसार, भारत को वर्ष 2031–32 तक लगभग 411.4 GWh ऊर्जा भंडारण क्षमता की आवश्यकता होगी, जिसमें 236.22 GWh बैटरी भंडारण और 175.18 GWh पंप्ड स्टोरेज शामिल है। भारत की बढ़ती नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता को समर्थन देने के लिए इस विस्तार की आवश्यकता है।
निष्कर्ष:
भारत के विद्युत क्षेत्र को एक विश्वसनीय, लचीली और नवीकरणीय ऊर्जा आधारित प्रणाली में परिवर्तित करने के लिए ऊर्जा भंडारण प्रणालियाँ आवश्यक हैं। प्रस्तावित योजना नवीकरणीय ऊर्जा के एकीकरण को गति देने, घरेलू विनिर्माण को मजबूत करने और ऊर्जा सुरक्षा में सुधार करने में सहायक हो सकती है। भारत के स्वच्छ ऊर्जा परिवर्तन और जलवायु प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के लिए योजना का प्रभावी कार्यान्वयन, तकनीकी नवाचार तथा संसाधनों का सतत प्रबंधन महत्त्वपूर्ण होगा।
