सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या बढ़कर 38
संदर्भ:
हाल ही में, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने 'सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन अध्यादेश, 2026' को मंजूरी दी। इसके तहत देश की शीर्ष अदालत में न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या को 34 से बढ़ाकर 38 (37 अन्य न्यायाधीश + 1 मुख्य न्यायाधीश) कर दिया गया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के अनुरोध और कैबिनेट की सिफारिश पर यह कदम उठाया गया है।
उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने हेतु विधिक ढाँचा:
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- सुप्रीम कोर्ट की न्यायाधीश संख्या का निर्धारण सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) अधिनियम, 1956 के तहत होता है, जिसे संसद अपने विधायी अधिकारों के अंतर्गत संशोधित कर सकती है। प्रारंभ में 1950 में सुप्रीम कोर्ट ने 8 न्यायाधीशों (एक मुख्य न्यायाधीश और सात न्यायाधीश) के साथ कार्य शुरू किया था। समय के साथ न्यायिक कार्यभार बढ़ने के कारण स्वीकृत संख्या में लगातार वृद्धि की गई।
- यह अध्यादेश 'सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) अधिनियम, 1956' की धारा 2 में संशोधन करता है। आगामी मानसून सत्र में इसे बदलने के लिए विधेयक लाया जाएगा।
- भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124(1) के तहत संसद को सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की संख्या तय करने का अधिकार प्राप्त है। इसी लचीलापन के कारण समय-समय पर संशोधन किए गए—1956 में 11 न्यायाधीश, 1960 में 14, 1978 में 18, 1986 में 26, 2008 में 31 और 2019 में 34 (मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर) तक संख्या बढ़ाई गई। नवीनतम प्रस्तावित संशोधन में इस संख्या को बढ़ाकर 37 न्यायाधीश और मुख्य न्यायाधीश सहित कुल 38 करने का प्रावधान है।
- सुप्रीम कोर्ट की न्यायाधीश संख्या का निर्धारण सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) अधिनियम, 1956 के तहत होता है, जिसे संसद अपने विधायी अधिकारों के अंतर्गत संशोधित कर सकती है। प्रारंभ में 1950 में सुप्रीम कोर्ट ने 8 न्यायाधीशों (एक मुख्य न्यायाधीश और सात न्यायाधीश) के साथ कार्य शुरू किया था। समय के साथ न्यायिक कार्यभार बढ़ने के कारण स्वीकृत संख्या में लगातार वृद्धि की गई।
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संख्या बढ़ाने की आवश्यकता क्यों पड़ी?
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- मुकदमों का भारी बोझ: अप्रैल 2026 तक सर्वोच्च न्यायालय में लंबित मामलों की संख्या रिकॉर्ड 92,823 तक पहुंच चुकी है। न्यायाधीशों की कमी के कारण मामलों के निपटारे की दर (Clearance Rate) धीमी थी।
- संवैधानिक पीठों का गठन: अनुच्छेद 145(3) के अनुसार, संविधान की व्याख्या से जुड़े मामलों के लिए कम से कम 5 न्यायाधीशों की पीठ जरूरी है। न्यायाधीशों की संख्या बढ़ने से बड़ी और नियमित संवैधानिक पीठों का गठन आसान होगा।
- न्यायिक कार्यकुशलता और तनाव: वर्तमान में शीर्ष अदालत के न्यायाधीशों पर प्रतिदिन दर्जनों मामलों की सुनवाई का दबाव रहता है। संख्या बढ़ने से न्यायाधीशों को मामलों के गहन अध्ययन और गुणवत्तापूर्ण निर्णय लिखने का पर्याप्त समय मिलेगा।
- मुकदमों का भारी बोझ: अप्रैल 2026 तक सर्वोच्च न्यायालय में लंबित मामलों की संख्या रिकॉर्ड 92,823 तक पहुंच चुकी है। न्यायाधीशों की कमी के कारण मामलों के निपटारे की दर (Clearance Rate) धीमी थी।
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आगे की राह:
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- रिक्तियों को शीघ्र भरना: संख्या बढ़ाकर 38 करने के बाद वर्तमान में कार्यबल 32 है, यानी 6 पद खाली हैं। कॉलेजियम व्यवस्था को बिना किसी देरी के इन पदों पर नियुक्तियां करनी होंगी ताकि इस सुधार का वास्तविक लाभ मिल सके।
- केवल संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं: विशेषज्ञों का मानना है कि केवल न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाना न्यायिक देरी का एकमात्र समाधान नहीं है। इसके साथ ही:
- न्यायालयों का आधुनिकीकरण: एआई (AI) और डिजिटल केस मैनेजमेंट का उपयोग बढ़ाना होगा।
- अपीलीय क्षेत्राधिकार को सीमित करना: सर्वोच्च न्यायालय को मुख्य रूप से संवैधानिक मामलों की अदालत बनाना चाहिए। इसके लिए 'राष्ट्रीय अपील न्यायालय' (Court of Appeal) के गठन पर विचार किया जा सकता है।
- निचली अदालतों का सुदृढ़ीकरण: देश में लंबित मुकदमों का बड़ा हिस्सा जिला और अधीनस्थ न्यायालयों में है। बुनियादी सुधार वहां से शुरू होने चाहिए।
- न्यायालयों का आधुनिकीकरण: एआई (AI) और डिजिटल केस मैनेजमेंट का उपयोग बढ़ाना होगा।
- रिक्तियों को शीघ्र भरना: संख्या बढ़ाकर 38 करने के बाद वर्तमान में कार्यबल 32 है, यानी 6 पद खाली हैं। कॉलेजियम व्यवस्था को बिना किसी देरी के इन पदों पर नियुक्तियां करनी होंगी ताकि इस सुधार का वास्तविक लाभ मिल सके।
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निष्कर्ष:
न्यायाधीशों की संख्या को 38 करना 'त्वरित न्याय' (Speedy Justice) के अधिकार को सुनिश्चित करने की दिशा में एक प्रगतिशील कदम है। हालांकि, भारतीय न्यायपालिका को पूरी तरह प्रभावी बनाने के लिए प्रक्रियात्मक सुधारों, बुनियादी ढांचे के विकास और कॉलेजियम प्रणाली में पारदर्शिता लाने की निरंतर आवश्यकता बनी रहेगी।
